भारत की अर्थव्यवस्था में MSMEs का बढ़ता योगदान, 34 करोड़ रोजगार, 12.40 लाख करोड़ निर्यात, भारत बनेगा ‘विश्व की फैक्ट्री’

GVA में 30.1% हिस्सेदारी, कुल निर्यात में 45.73% योगदान, छोटे उद्यमों ने रचा इतिहास

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MSMEs: भारत को विश्व की विनिर्माण केंद्र (Global Manufacturing Hub) बनाने की दिशा में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम (MSMEs) क्षेत्र महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। यह क्षेत्र न केवल रोजगार सृजन में अग्रणी है बल्कि देश के आर्थिक विकास और निर्यात में भी इसका योगदान लगातार बढ़ रहा है। स्टेट बैंक ऑफ इंडिया (SBI) के ग्रुप चीफ इकोनॉमिक एडवाइजर और प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य सौम्य कांति घोष ने बुधवार को एमएसएमई क्षेत्र की उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए कुछ चौंकाने वाले आंकड़े प्रस्तुत किए। उनके अनुसार, एमएसएमई क्षेत्र ने देश में कुल 34 करोड़ रोजगार के अवसर पैदा किए हैं।

यह संख्या भारत की कुल कार्यशील जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा है। इसके साथ ही देश के सकल मूल्य वर्धन (Gross Value Added – GVA) में इस क्षेत्र की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2022-23 में बढ़कर 30.1 प्रतिशत तक पहुंच गई है। निर्यात के मोर्चे पर भी एमएसएमई क्षेत्र ने शानदार प्रदर्शन किया है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत के कुल निर्यात में एमएसएमई से जुड़े उत्पादों का हिस्सा 45.73 प्रतिशत रहा। यह आंकड़ा दर्शाता है कि छोटे उद्यम अब वैश्विक व्यापार में भारत की मजबूत उपस्थिति सुनिश्चित कर रहे हैं। इन आंकड़ों के माध्यम से यह स्पष्ट हो जाता है कि एमएसएमई क्षेत्र भारत की आर्थिक रीढ़ बन चुका है। आइए विस्तार से जानते हैं कि यह क्षेत्र किस प्रकार देश को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने की दिशा में योगदान दे रहा है।

MSMEs: रोजगार सृजन में सबसे आगे

एमएसएमई क्षेत्र भारत में रोजगार सृजन का सबसे बड़ा स्रोत बन गया है। सौम्य कांति घोष के अनुसार, इस क्षेत्र ने कुल 34 करोड़ रोजगार के अवसर उत्पन्न किए हैं। यह एक विशाल संख्या है जो इस क्षेत्र के महत्व को स्पष्ट करती है।

  • भारत की कुल जनसंख्या लगभग 140 करोड़ है और कार्यशील आयु वर्ग की जनसंख्या लगभग 90 करोड़ है। इसमें से 34 करोड़ लोगों को एमएसएमई क्षेत्र रोजगार प्रदान कर रहा है। यह देश की कुल नियोजित जनशक्ति का एक बहुत बड़ा हिस्सा है।

  • एमएसएमई क्षेत्र का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह श्रम-प्रधान है। छोटे उद्यमों में मशीनों की तुलना में अधिक मानव श्रम की आवश्यकता होती है, जिससे अधिक लोगों को काम मिलता है।

  • ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में एमएसएमई रोजगार का प्रमुख स्रोत हैं। जहां बड़े उद्योग नहीं पहुंच पाते, वहां छोटे उद्यम स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर प्रदान करते हैं।

  • महिला उद्यमिता को भी एमएसएमई क्षेत्र ने बढ़ावा दिया है। कई महिलाएं घरेलू उद्योगों और छोटे व्यवसायों के माध्यम से आर्थिक रूप से सशक्त हो रही हैं।

GVA में 30.1% योगदान

सकल मूल्य वर्धन (GVA) किसी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं के उत्पादन का मूल्यांकन करने का एक महत्वपूर्ण संकेतक है। एमएसएमई क्षेत्र का GVA में योगदान वित्त वर्ष 2022-23 में 30.1 प्रतिशत तक पहुंच गया है।

  • यह आंकड़ा दर्शाता है कि भारत की कुल आर्थिक उत्पादकता का लगभग एक-तिहाई हिस्सा छोटे उद्यमों से आता है। यह एमएसएमई क्षेत्र को देश की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ बनाता है।

  • विनिर्माण, सेवा और व्यापार – सभी क्षेत्रों में एमएसएमई सक्रिय हैं। खाद्य प्रसंस्करण, वस्त्र, हस्तशिल्प, इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी सेवाओं में इनका विशेष योगदान है।

  • कृषि आधारित उद्योगों में भी एमएसएमई महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कृषि उत्पादों का प्रसंस्करण और मूल्य वर्धन छोटे उद्यमों द्वारा किया जाता है।

MSMEs: निर्यात में शानदार योगदान

एमएसएमई क्षेत्र ने निर्यात के क्षेत्र में भी अद्भुत प्रदर्शन किया है। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत के कुल निर्यात में एमएसएमई उत्पादों का हिस्सा 45.73 प्रतिशत रहा। यह लगभग आधे निर्यात का प्रतिनिधित्व करता है।

  • निर्यात के मामले में एमएसएमई क्षेत्र की वृद्धि दर बेहद प्रभावशाली रही है। कुछ वर्षों में यह 3.95 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 12.40 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया है।

  • यह तीन गुना से अधिक की वृद्धि है जो दर्शाती है कि भारतीय एमएसएमई अब वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत पकड़ बना रहे हैं।

  • वस्त्र, रत्न और आभूषण, चमड़ा उत्पाद, हस्तशिल्प, इंजीनियरिंग सामान और खाद्य उत्पाद – ये कुछ प्रमुख क्षेत्र हैं जहां एमएसएमई निर्यात में अग्रणी हैं।

वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की दिशा में

सौम्य कांति घोष ने कहा कि ये आंकड़े भारत को ग्लोबल मैन्युफैकिंग हब बनाने में छोटी कंपनियों की भूमिका के महत्व को रेखांकित करते हैं।

  • चीन से विनिर्माण को अन्य देशों में स्थानांतरित करने की वैश्विक प्रवृत्ति (China Plus One Strategy) के संदर्भ में भारत एक आकर्षक विकल्प बन रहा है।

  • सरकार की उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजनाएं भी एमएसएमई को विनिर्माण में बढ़ावा दे रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मास्यूटिकल्स और ऑटो कंपोनेंट्स में खासतौर पर।

  • डिजिटल इंडिया पहल ने छोटे उद्यमों को आधुनिक बनाया है। अब वे ऑनलाइन ऑर्डर ले सकते हैं, डिजिटल भुगतान कर सकते हैं और अपनी पहुंच बढ़ा सकते हैं।

MSMEs: चुनौतियां और समाधान

हालांकि एमएसएमई क्षेत्र ने शानदार प्रदर्शन किया है, फिर भी कुछ चुनौतियां बनी हुई हैं। वित्तपोषण तक पहुंच अभी भी कई छोटे उद्यमों के लिए कठिन है।

  • तकनीकी उन्नयन और आधुनिकीकरण के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है जो सभी एमएसएमई के पास नहीं होती।

  • सरकार इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए मुद्रा योजना, स्टार्टअप इंडिया, और विभिन्न ऋण योजनाएं चला रही है।

  • जीईएम (GeM) पोर्टल सरकारी खरीद में एमएसएमई की भागीदारी बढ़ा रहा है।

निष्कर्ष

एमएसएमई क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की धड़कन बन चुका है। 34 करोड़ रोजगार, GVA में 30.1% हिस्सेदारी और कुल निर्यात में 45.73% योगदान – ये आंकड़े इस क्षेत्र की शक्ति को दर्शाते हैं। भारत को विश्व की विनिर्माण फैक्ट्री बनाने में एमएसएमई की भूमिका निर्णायक है। सरकारी सहयोग, डिजिटलीकरण और वैश्विक अवसरों के साथ यह क्षेत्र और भी ऊंचाइयां छू सकता है।

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