Rajasthan High Court Property Case: पितापिता के जीवित रहते पोता दादा की जमीन नहीं बेचने से रोक सकता, हाईकोर्ट

Rajasthan High Court Property Case: राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि दादा की संपत्ति धारा 8 से पिता को मिले तो वह पर्सनल विरासत है। पिता के जिंदा रहते पोता जन्मसिद्ध हक बताकर बिक्री नहीं रोक सकता।

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Rajasthan High Court Property Case: पिता के जीवित रहते क्या पोता दादा की जमीन पर अपना हक जता सकता है, यह सवाल राजस्थान के एक भूमि विवाद में उठा। जैसलमेर की 75 बीघा जमीन को पिता और चाचाओं ने बेच दिया तो पोते ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। उसका दावा था कि दादा की जमीन में उसका भी हिस्सा है और बिना सहमति बिक्री अवैध है। राजस्थान हाईकोर्ट ने 20 अगस्त 2026 को अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि केवल दादा की जमीन होने से पोते को जन्मसिद्ध या पैतृक अधिकार नहीं मिल जाता। बिना वसीयत मृत्यु के बाद हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 की धारा 8 के तहत बेटों को मिली संपत्ति उनकी पर्सनल विरासत मानी जाएगी। ऐसी स्थिति में पिता के जिंदा रहते बेटा यानी पोता बिक्री पर आपत्ति नहीं कर सकता।

Rajasthan High Court Property Case: जैसलमेर की 75 बीघा जमीन का विवाद कैसे शुरू हुआ

सरकार ने यह जमीन चुतरा राम को राजस्थान लैंड रेवेन्यू एक्ट 1956 की धारा 101 के तहत आवंटित की थी। 24 अप्रैल 2004 को चुतरा राम की बिना वसीयत मृत्यु हो गई। इसके बाद जमीन उनके तीन बेटों खेताराम, रामाराम और लच्छूराम को बराबर हिस्से में मिली। करीब 21 वर्ष बाद 17 अप्रैल 2025 को खेताराम ने भाइयों के साथ जमीन मध्य प्रदेश के एक खरीदार को बेच दी। खेताराम के पुत्र देवाराम ने सेल का विरोध किया। उसने कहा कि जमीन में उसका नौवां हिस्सा है और उससे सहमति नहीं ली गई। मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां 20 अगस्त 2026 को उसकी अपील खारिज हुई।

कोर्ट ने पैतृक और पर्सनल विरासत में क्या फर्क बताया

अदालत के सामने मूल प्रश्न यह था कि चुतरा राम की जमीन पोते देवाराम के लिए पैतृक थी या नहीं। कोर्ट ने कहा कि देवाराम यह सिद्ध नहीं कर सका कि संपत्ति हिंदू अविभाजित परिवार यानी एचयूएफ की थी या दादा ने उसे कर्ता के रूप में रखा था। परिवार में जमीन का दादा से बेटे और फिर पोते तक जाना अपने आप उसे पैतृक नहीं बना देता। धारा 8 के तहत बेटे को मिली संपत्ति वह अपनी व्यक्तिगत हैसियत में पाता है। केवल जन्म लेने से पुत्र को उसमें तत्काल अधिकार नहीं मिल जाता। चुतरा राम की मृत्यु के बाद तीन बेटों को एक-तिहाई हिस्सा मिला और खेताराम का हिस्सा उसकी पर्सनल विरासत बना।

नाबालिग होने की दलील क्यों नहीं चली

देवाराम ने यह भी कहा कि दादा की मृत्यु के समय वह नाबालिग था। कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। अदाल त ने स्पष्ट किया कि वारिस का नाबालिग होना उत्तराधिकार खुलने की प्रक्रिया नहीं बदलता। संपत्ति कानूनी रूप से तत्कालीन क्लास-वन उत्तराधिकारियों को चली जाती है। नाबालिग होना बाद में जन्मसिद्ध हक पैदा नहीं कर देता, यदि संपत्ति पहले ही पिता की व्यक्तिगत विरासत बन चुकी हो। इसलिए नाबालिगता के आधार पर बिक्री को रद्द कराने की मांग कमजोर रही। फैसला संपत्ति के स्वरूप पर केंद्रित रहा, न कि पोते की आयु पर।

बिक्री से पहले पोते की मंजूरी क्यों जरूरी नहीं मानी गई

कोर्ट के अनुसार हर वह जमीन जो दादा से पिता तक पहुंची हो, जरूरी नहीं कि पोते की पैतृक संपत्ति हो। अगर दादा की संपत्ति धारा 8 के तहत पिता को मिली और एचयूएफ सिद्ध नहीं हुआ, तो पिता अपने हिस्से का मालिक होता है। पिता के जीवित रहते पोता जन्मसिद्ध हिस्सा बताकर सेल नहीं रोक सकता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के उत्तम बनाम सौभाग सिंह 2016 के सिद्धांतों का सहारा लिया। कृषि भूमि में खतेदारी अधिकार के दावे के लिए राजस्व अदालत की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी गई। देवाराम ने खतेदारी पहले राजस्व अदालत से घोषित नहीं कराई थी, इसलिए सिविल मुकदमे में उसकी स्थिति कमजोर रही।

Rajasthan High Court Property Case: इस फैसले का सामान्य परिवारों पर क्या असर समझा जा रहा है

यह आदेश उन मामलों में दिशा देता है जहां लोग हर पुरानी जमीन को पैतृक मानकर रोक लगाने लगते हैं। कोर्ट ने दोहराया कि उत्तराधिकार का रास्ता और संपत्ति का स्वरूप तय करता है कि हक जन्म से खुलेगा या नहीं। एचयूएफ साबित हो तो स्थिति अलग हो सकती है, लेकिन केवल पारिवारिक वंश से आना पर्याप्त नहीं। कृषि भूमि के अधिकार राजस्व रिकॉर्ड और सक्षम मंच से जुड़ते हैं। इसलिए बिक्री से पहले कागजात और उत्तराधिकार की धारा देखना जरूरी हो जाता है। यह एक मामले का फैसला है, हर विवाद की अपनी तथ्य-स्थिति अलग रहती है। संबंधित पक्ष कानूनी सलाह से अपने दस्तावेज जांच सकते हैं।

राजस्थान हाईकोर्ट ने जैसलमेर की 75 बीघा जमीन के विवाद में पोते की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि दादा की बिना वसीयत संपत्ति धारा 8 से बेटों को मिले तो वह पिता की पर्सनल विरासत बनती है। पिता के जीवित रहते पोता जन्मसिद्ध हक बताकर बिक्री नहीं रोक सकता, जब तक एचयूएफ सिद्ध न हो। नाबालिग होना इस सिद्धांत को नहीं बदलता। खतेदारी का दावा राजस्व अदालत से पहले तय न होने से सिविल चुनौती और कमजोर पड़ी। फैसला संपत्ति के कानूनी स्वरूप पर टिका है। परिवारों के लिए सबक यही है कि पुरानी जमीन का इतिहास और उत्तराधिकार का रास्ता दोनों जांचें।

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