Gangaur Puja 2026 Date: इस साल कब है गणगौर पूजा, शिव-पार्वती के इस पावन पर्व का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और महत्व सब कुछ जानें यहां
गणगौर पूजा 21 मार्च 2026 शनिवार को चैत्र शुक्ल तृतीया; 4 शुभ मुहूर्त, 18 दिन उत्सव (राजस्थान), शिव-पार्वती पूजा, व्रत-कथा, गुने अर्पण, सौभाग्य-वर प्राप्ति का पर्व
Gangaur Puja 2026 Date: होली की मस्ती अभी थमी भी नहीं है और राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और हरियाणा समेत कई राज्यों की महिलाएं एक और खास पर्व की तैयारी में जुट गई हैं। यह पर्व है गणगौर पूजा जो हर साल चैत्र शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इसे गौरी तृतीया के नाम से भी जाना जाता है। इस बार गणगौर पूजा का मुख्य दिन 21 मार्च 2026 यानी शनिवार को है। यह पर्व भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित है। विवाहित महिलाएं इस दिन अखंड सौभाग्य की कामना से व्रत रखती हैं और अविवाहित कन्याएं मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए माता गौरा की पूजा करती हैं।
गणगौर पूजा 2026 की सही तारीख
कई लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा था कि इस बार गणगौर पूजा 20 मार्च को है या 21 मार्च को। तो इसका स्पष्ट उत्तर यह है कि गणगौर पूजा का मुख्य दिन 21 मार्च 2026 शनिवार को है। तृतीया तिथि 21 मार्च 2026 को रात 2 बजकर 30 मिनट पर शुरू होगी और उसी दिन रात 11 बजकर 56 मिनट पर समाप्त होगी। चूंकि उदया तिथि के अनुसार तृतीया तिथि पूरे दिन 21 मार्च को ही विद्यमान रहेगी इसलिए गणगौर पूजा 21 मार्च को ही मनाई जाएगी।
Gangaur Puja 2026 Date का शुभ मुहूर्त
पूजा का सबसे अधिक फल तभी मिलता है जब इसे शुभ मुहूर्त में किया जाए। 21 मार्च 2026 को गणगौर पूजा के लिए चार शुभ मुहूर्त हैं। पहला मुहूर्त सुबह 7 बजकर 55 मिनट से 9 बजकर 26 मिनट तक है जो शुभ और उत्तम श्रेणी का है। दूसरा मुहूर्त दोपहर 2 बजे से 3 बजकर 31 मिनट तक है जो लाभ और उन्नति के लिए उत्तम है। तीसरा मुहूर्त दोपहर 3 बजकर 31 मिनट से शाम 5 बजकर 2 मिनट तक है जो अमृत श्रेणी का सर्वोत्तम मुहूर्त माना जाता है। चौथा मुहूर्त शाम 6 बजकर 33 मिनट से रात 8 बजकर 2 मिनट तक है जो भी लाभ और उन्नति दायक है। जो महिलाएं घर की जिम्मेदारियों के कारण सुबह समय नहीं निकाल पातीं वे दोपहर या शाम के मुहूर्त में पूजा कर सकती हैं।
राजस्थान में 18 दिन का विशेष उत्सव
गणगौर पूजा वैसे तो पूरे उत्तर और मध्य भारत में मनाई जाती है लेकिन राजस्थान में इसकी रौनक और धूमधाम की बात ही अलग है। यहां यह पर्व पूरे 18 दिनों तक मनाया जाता है। राजस्थान में गणगौर की शुरुआत होली के दिन यानी रंग पंचमी से हो जाती है और समापन चैत्र शुक्ल तृतीया यानी 21 मार्च को होता है। इन 18 दिनों तक घर-घर में गणगौर की पूजा होती है, लोकगीत गाए जाते हैं और उत्सव का माहौल बना रहता है। जयपुर, जोधपुर, उदयपुर जैसे शहरों में गणगौर की भव्य शोभायात्राएं निकाली जाती हैं जिन्हें देखने देश-विदेश से पर्यटक आते हैं।
Gangaur Puja 2026 Date: कौन मनाता है यह पर्व?
गणगौर पूजा केवल विवाहित महिलाओं का त्योहार नहीं है। इसमें अविवाहित कन्याएं भी बराबर की भागीदार होती हैं। विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु और अखंड सौभाग्य की कामना से यह व्रत रखती हैं। अविवाहित कन्याएं मनचाहे और योग्य वर की प्राप्ति के लिए माता पार्वती की आराधना करती हैं। इस पर्व में भगवान शिव को ईसर जी और माता पार्वती को गौरा माता के रूप में पूजा जाता है। दोनों की प्रतिमाएं या मूर्तियां बनाकर पूरी श्रद्धा और विधि-विधान से उनकी पूजा की जाती है।
पूजा विधि और परंपराएं
गणगौर पूजा के दिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके व्रत रखती हैं। दिनभर निर्जला या फलाहारी व्रत रखकर शाम को माता गौरा की कथा सुनती हैं। पूजा के बाद नदी, तालाब या सरोवर के पास जाकर बालू से बनाई गई गणगौर की मूर्ति को जल पिलाया जाता है। जिस स्थान पर गणगौर की पूजा की जाती है उसे गणगौर माता का पीहर माना जाता है और जिस स्थान पर विसर्जन होता है उसे उनका ससुराल। यह परंपरा बेटी को ससुराल विदा करने की भावना को प्रतीकात्मक रूप से व्यक्त करती है।
इस दिन एक खास परंपरा यह भी है कि कई महिलाएं माता पार्वती को मैदा, बेसन, आटे और हल्दी से बने विशेष गहने अर्पित करती हैं। इन्हें गुने कहते हैं। मान्यता है कि जितने अधिक गुने माता को अर्पित किए जाएं उतना ही परिवार में धन-वैभव और समृद्धि बढ़ती है।
Gangaur Puja 2026 Date: गणगौर पूजा का आध्यात्मिक महत्व
यह पर्व केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं है बल्कि स्त्री शक्ति, प्रेम और दांपत्य जीवन की मधुरता का उत्सव है। भगवान शिव और माता पार्वती का प्रेम आदर्श दांपत्य का प्रतीक है। उनकी पूजा करके महिलाएं अपने जीवन में भी वैसे ही प्रेम, विश्वास और सामंजस्य की कामना करती हैं। यह पर्व यह संदेश भी देता है कि नारी शक्ति की साधना और भक्ति सबसे बड़ा आभूषण है।
अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित है। इसका कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। पाठकगण इसे आस्था की दृष्टि से लें।
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