Domestic Violence: महिला डर या हिंसा बताए तो आवाज अनसुनी न करें- जस्टिस विक्रम नाथ

जस्टिस विक्रम नाथ ने घरेलू हिंसा पर संवेदनशील रवैया अपनाने और पीड़ित महिलाओं को संस्थागत मदद देने पर जोर दिया

0
Domestic Violence: सर्वोच्च न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीश न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने घरेलू हिंसा और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर एक अत्यंत संवेदनशील और विचारणीय संदेश दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब भी कोई महिला अपने भय, उत्पीड़न या पारिवारिक हिंसा को लेकर पहली बार जुबान खोले, तो उसकी आवाज को अनसुना या खारिज नहीं किया जाना चाहिए। महिलाओं के भीतर यह दृढ़ विश्वास पैदा होना आवश्यक है कि व्यवस्था उनकी व्यथा सुनेगी, कानून उनकी सुरक्षा के लिए तत्परता से आगे आएगा और उन्हें गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए हर आवश्यक संस्थागत संबल मिलेगा। यह अहम विचार उन्होंने राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) द्वारा आयोजित सुरक्षा अधिकारियों के राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन सत्र में व्यक्त किए।

Domestic Violence: राष्ट्रीय महिला आयोग के सम्मेलन में सुरक्षा तंत्र की भूमिका पर जोर

नई दिल्ली में आयोजित इस राष्ट्रीय सम्मेलन में न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने ‘घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005’ के अंतर्गत जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले सुरक्षा अधिकारियों (प्रोटेक्शन ऑफिसर्स) की भूमिका की सराहना की। उन्होंने कहा कि पीड़ित महिला और न्याय प्रणाली के बीच सुरक्षा अधिकारी पहली और सबसे महत्वपूर्ण कड़ी होते हैं, इसलिए उन तक संकटग्रस्त महिलाओं की पहुंच अत्यंत सुगम और त्वरित होनी चाहिए।
न्यायमूर्ति नाथ ने आगाह किया कि महिलाओं की शिकायतों को सामान्य पारिवारिक नोकझोंक मानकर टाल देना स्थिति को और अधिक घातक बना देता है। व्यवस्था और समाज का यह साझा दायित्व है कि वे ऐसा सुरक्षित वातावरण तैयार करें जहां महिलाएं बिना किसी संकोच या सामाजिक भय के अपने ऊपर हो रहे अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठा सकें और सम्मानजनक निर्णय ले सकें।

विवाह बचाने के नाम पर समझौते और चुप्पी का दबाव अस्वीकार्य

घरेलू हिंसा के मामलों में भारतीय समाज की रूढ़िवादी सोच पर प्रहार करते हुए न्यायमूर्ति नाथ ने कहा कि अक्सर महिलाओं को परिवार की कथित प्रतिष्ठा और वैवाहिक बंधन को बचाए रखने के नाम पर चुप रहने के लिए मजबूर किया जाता है। उन्होंने इस मानसिकता पर गहरा सवाल उठाया कि रिश्ते को हर हाल में खींचना केवल महिला के असीमित त्याग और सहनशीलता का पर्याय बना दिया जाए।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब कोई महिला अपने साथ हो रहे दुर्व्यवहार को साझा करती है, तो परिवार और समाज की पहली प्रतिक्रिया उसे सांत्वना देने और स्थिति को समझने की होनी चाहिए। उससे यह सवाल पूछना कि वह और कितना समझौता या सहन कर सकती है, किसी भी समस्या का मानवीय समाधान नहीं हो सकता।

शारीरिक चोट तक सीमित नहीं है हिंसा, भावनात्मक और आर्थिक शोषण भी दायरे में

कानूनी दृष्टि को स्पष्ट करते हुए न्यायमूर्ति विक्रम नाथ ने रेखांकित किया कि घरेलू हिंसा की परिभाषा केवल शारीरिक मारपीट तक सीमित नहीं है। कानून के व्यापक दायरे में मौखिक दुर्व्यवहार, भावनात्मक प्रताड़ना, यौन उत्पीड़न और आर्थिक परतंत्रता जैसे गंभीर पहलू भी शामिल हैं। इसके साथ ही यह कानून केवल पति-पत्नी के रिश्ते तक सीमित नहीं है, बल्कि साझा गृहस्थी में रहने वाली किसी भी घरेलू संबंध की महिला को संरक्षण प्रदान करता है।
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हिंसा का यह दंश केवल अशिक्षित या आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग तक सीमित नहीं है, बल्कि उच्च शिक्षित और आर्थिक रूप से पूरी तरह स्वतंत्र महिलाएं भी बंद दरवाजों के पीछे इस चुप्पी और दबाव का सामना करती हैं।

एनएफएचएस के आंकड़ों में गिरावट सकारात्मक, लेकिन चुनौती अब भी गंभीर

न्यायमूर्ति नाथ ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के ताजा आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि NFHS-6 (2023-24) में दर्ज वैवाहिक हिंसा का प्रतिशत पिछले सर्वेक्षण के 29.2 प्रतिशत से घटकर 22.3 प्रतिशत पर आ गया है। उन्होंने इस गिरावट को सकारात्मक संकेत माना, लेकिन साथ ही यह भी रेखांकित किया कि यह प्रतिशत भी समाज में घरेलू हिंसा की भयावहता को दर्शाने के लिए काफी है।
उन्होंने इस तथ्य की ओर भी ध्यान आकर्षित किया कि ये आंकड़े केवल उन मामलों को दर्शाते हैं जो किसी तरह औपचारिक रूप से दर्ज हो पाए हैं, जबकि सामाजिक लोकलाज और डर के चलते अनगिनत मामले चारदीवारी से बाहर ही नहीं आ पाते।

Domestic Violence: संस्थागत संबल और सामाजिक मानसिकता में बदलाव की आवश्यकता

सत्र के दौरान केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्री अन्नपूर्णा देवी ने इस बात पर बल दिया कि महिलाओं के प्रति सम्मान और लैंगिक समानता के संस्कार बच्चों को प्रारंभिक उम्र से ही दिए जाने चाहिए। वहीं, राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष विजया रहाटकर ने व्यवस्थागत सुधार पर जोर देते हुए कहा कि संकट की घड़ी में पीड़ित महिला को सरकारी दफ्तरों के चक्कर न काटने पड़ें, बल्कि सहायता प्रणाली को स्वयं आगे बढ़कर जरूरतमंद महिला की दहलीज तक पहुंचना चाहिए। न्यायमूर्ति नाथ ने संविधान के तहत महिलाओं को समान नागरिक बताते हुए निष्कर्ष निकाला कि कानूनों की वास्तविक सफलता केवल दर्ज मामलों की संख्या में नहीं, बल्कि जमीन पर महिलाओं को सुरक्षित और गरिमामय जीवन सुनिश्चित कराने में निहित है।

read more here

Thursday Pooja Vidhi: 8 अक्टूबर को गुरु प्रदोष का दुर्लभ संयोग, शिव-विष्णु पूजा से मिलेगा विशेष फल

Gold-Silver Price 8 October 2026: सोने-चांदी के भाव में फिर हलचल, 8 अक्टूबर को खरीदारी से पहले जानें ताजा रेट

अल्जाइमर की शुरुआती पहचान में क्रांति, न्यूरोलॉजिस्ट ने बताया pTAU217 ब्लड टेस्ट से 7 गुना पहले तक खतरे का संकेत संभव, 25 साल के अध्ययन से खुलासा; जानें कैसे कम करें डिमेंशिया का जोखिम

Doomscrolling Effect: सोशल मीडिया पर हर स्क्रॉल के साथ घट रही है आपकी खुशी, वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में हुआ बड़ा खुलासा

आपको यह भी पसंद आ सकता है
Leave A Reply

Your email address will not be published.