मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव, INDIA ब्लॉक के 180 सांसदों ने किया साइन, SIR विवाद से शुरू हुई लड़ाई पहुंची संवैधानिक संकट तक

SIR विवाद के बाद INDIA ब्लॉक के 180 सांसदों ने किया साइन, संसद में पेश हो सकता है महाभियोग प्रस्ताव

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CEC Gyanesh Kumar: देश की राजनीति में बुधवार को एक ऐसी खबर आई जो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ सकती है। विपक्षी गठबंधन INDIA ब्लॉक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग यानी इंपीचमेंट प्रस्ताव लाने की पूरी तैयारी कर चुका है। सूत्रों के अनुसार लोकसभा में 120 और राज्यसभा में 60 सांसदों समेत कुल 180 सांसदों ने इस महाभियोग नोटिस पर हस्ताक्षर किए हैं। यह प्रस्ताव 12 या 13 मार्च को संसद में पेश किया जा सकता है। अगर ऐसा हुआ तो यह देश के इतिहास में पहली बार होगा जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया जाएगा।

विवाद की शुरुआत – SIR एक्सरसाइज से उठा बवाल

पूरे विवाद की जड़ पश्चिम बंगाल में चुनाव आयोग द्वारा कराई जा रही वोटर लिस्ट की स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR प्रक्रिया है। विपक्षी दलों खासकर तृणमूल कांग्रेस का आरोप है कि इस SIR प्रक्रिया में जानबूझकर बड़े पैमाने पर मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं। TMC का कहना है कि यह प्रक्रिया पक्षपातपूर्ण तरीके से चलाई जा रही है और इसका मकसद विशेष समुदायों के मतदाताओं को वोटिंग अधिकार से वंचित करना है।

TMC ने जब इस मामले में चुनाव आयोग से मिलने का समय मांगा और उनका प्रतिनिधिमंडल CEC ज्ञानेश कुमार से मिलने गया तो वहां कथित तौर पर उनके साथ दुर्व्यवहार किया गया। इसके बाद मामला और तूल पकड़ गया। सुप्रीम कोर्ट ने भी इस SIR मामले में संज्ञान लिया और सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग सहित सभी पक्षों को फटकार लगाई।

CEC Gyanesh Kumar: महाभियोग में क्या-क्या आरोप?

विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव के मसौदे में CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ तीन प्रमुख आधार बताए गए हैं।

  • पहला आरोप है मतदाताओं को उनके वोटिंग अधिकार से वंचित करना। विपक्ष का कहना है कि SIR प्रक्रिया के तहत बड़े पैमाने पर लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए जो संविधान प्रदत्त मतदान के मूल अधिकार का हनन है।
  • दूसरा आरोप है TMC प्रतिनिधिमंडल के साथ दुर्व्यवहार। जब तृणमूल कांग्रेस के नेता अपनी शिकायत लेकर चुनाव आयोग के दफ्तर गए तो वहां उनके साथ अशोभनीय व्यवहार किया गया जो एक संवैधानिक संस्था की गरिमा के विपरीत है।
  • तीसरा और सबसे गंभीर आरोप है संवैधानिक संस्थाओं का दुरुपयोग। विपक्ष का कहना है कि CEC ने अपने पद और चुनाव आयोग की शक्तियों का उपयोग पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण तरीके से किया है जो साबित गलत व्यवहार की श्रेणी में आता है।

महाभियोग की संवैधानिक प्रक्रिया क्या है?

भारत के संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रावधान है। यह प्रावधान सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया जैसा ही है।

महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 सांसदों और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं। INDIA ब्लॉक ने दोनों सदनों में यह संख्या पूरी कर ली है। लोकसभा में 120 और राज्यसभा में 60 सांसदों के हस्ताक्षर हो चुके हैं।

सदन आवश्यक हस्ताक्षर INDIA ब्लॉक के हस्ताक्षर
लोकसभा 100 सांसद 120 सांसद
राज्यसभा 50 सांसद 60 सांसद
कुल 150 सांसद 180 सांसद

प्रस्ताव पेश होने के बाद संसद में इस पर बहस होगी और फिर मतदान होगा। महाभियोग पास होने के लिए दोनों सदनों में विशेष बहुमत की जरूरत होती है। चूंकि सरकार के पास बहुमत है इसलिए यह प्रस्ताव पास होना मुश्किल है लेकिन विपक्ष का कहना है कि यह लड़ाई सिद्धांत और संविधान की रक्षा के लिए है।

CEC Gyanesh Kumar: देश के इतिहास में पहली बार

यह महाभियोग प्रस्ताव अगर संसद में पेश हुआ तो भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में यह पहला मौका होगा जब किसी मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ इस तरह का कदम उठाया गया हो। इससे पहले देश में न्यायाधीशों के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव आ चुके हैं लेकिन CEC के खिलाफ यह पहली बार होगा।

1993 का ऐतिहासिक संदर्भ – जस्टिस रामास्वामी मामला

भारत में इससे पहले 1993 में जस्टिस वी रामास्वामी के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव आया था। यह देश का पहला और अब तक का एकमात्र न्यायिक महाभियोग मामला था। उस समय एक वकील की हैसियत से कपिल सिब्बल ने जस्टिस रामास्वामी की पैरवी करते हुए संसद में करीब 6 घंटे तक बहस की थी। उनकी इस शानदार पैरवी से कांग्रेस के नेता इतने प्रभावित हुए कि उन्हें पार्टी में शामिल करके टिकट दिया गया। हालांकि वह महाभियोग प्रस्ताव अंततः गिर गया था।

CEC Gyanesh Kumar: विपक्ष का पक्ष – संविधान बचाने की लड़ाई

कांग्रेस सांसद इमरान मसूद ने इस मामले पर कहा कि विपक्ष संविधान को बचाने की लड़ाई लड़ रहा है और इसके लिए जो भी जरूरी कदम उठाने होंगे वे उठाए जाएंगे। विपक्षी नेताओं का कहना है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की निष्पक्षता और स्वायत्तता लोकतंत्र की नींव है। अगर यह नींव कमजोर होती है तो पूरा लोकतंत्र खतरे में पड़ जाता है।

TMC का तर्क है कि पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले SIR के बहाने वोटर लिस्ट से नाम हटाने की यह कोशिश एक सुनियोजित राजनीतिक साजिश है। TMC नेताओं ने कहा है कि वे इस अन्याय के खिलाफ हर संवैधानिक मंच पर लड़ेंगे।

सरकार और BJP का रुख

सत्तापक्ष ने विपक्ष के इस कदम को राजनीति से प्रेरित बताया है। BJP नेताओं का कहना है कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र और निष्पक्ष संवैधानिक संस्था है और विपक्ष SIR प्रक्रिया के जरिए फर्जी मतदाताओं को हटाए जाने से बौखलाया हुआ है। सरकार का तर्क है कि वोटर लिस्ट को साफ और सटीक बनाना चुनाव आयोग का संवैधानिक दायित्व है।

CEC Gyanesh Kumar: सुप्रीम कोर्ट की भूमिका

सुप्रीम कोर्ट इस पूरे मामले पर पहले से नजर रख रहा है। SIR मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कड़ी टिप्पणियां कीं और सभी पक्षों को फटकार लगाई। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि न्यायिक अधिकारियों पर संदेह करना स्वीकार्य नहीं है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका आने वाले दिनों में और महत्वपूर्ण हो सकती है।

आने वाले एक-दो दिनों में जब INDIA ब्लॉक यह प्रस्ताव संसद में पेश करेगा तो यह देखना दिलचस्प होगा कि संसद में इस पर क्या बहस होती है और सरकार किस तरह जवाब देती है। यह मामला न सिर्फ पश्चिम बंगाल के चुनाव बल्कि देश में चुनावी लोकतंत्र की विश्वसनीयता से भी जुड़ा है।

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