Bikhari Thakur: ‘बिदेसिया’ के रचनाकार भोजपुरी के शेक्सपीयर आज भी अमर, जानें उनकी विरासत और योगदान
'बिदेसिया' के रचनाकार भोजपुरी के शेक्सपीयर आज भी अमर
Bikhari Thakur: देश के मुख्य सामाजिक विनिर्माण क्षेत्र, प्रोग्रेसिव साहित्यिक कूटनीति और क्षेत्रीय लोक संस्कृति बाज़ार के कड़े मंच से इस समय बिहार के करोड़ों वासियों, भोजपुरी भाषियों और लोक कला प्रेमियों के लिए एक बहुत ही बड़ी, कड़क और पावन खबर सामने आ रही है। भोजपुरी लोक नाट्य कला के संप्रभु रीढ़ की हड्डी और जन-मानस की आवाज़ माने जाने वाले महान रचनाकार भिखारी ठाकुर की 109वीं पुण्यतिथि पर समूचे बिहार और वैश्विक भोजपुरी गलियारों के भीतर मुस्तैदी से स्मरण कार्यक्रमों का एक आलीशान सुरक्षा मॉडल लाइव एक्टिव किया जा चुका है। आज के इस बेहद आधुनिक, एआई (AI) और डिजिटल युग की कंप्यूटर स्क्रीन पर जैसे ही उनकी अमर कालजयी कृतियों की कोडिंग रिफ्लेक्ट हुई, वैसे ही नई पीढ़ी के कलाकारों के केबिनों में लोक संस्कृति को संजोने का एक नया प्रोग्रेसिव विज़न शुरू हो गया है, जिसने मंदी की हर एक नकारात्मक अफ़वाह को सिस्टम से पूरी तरह से डिलीट (समाप्त) कर दिया है।
भिखारी ठाकुर का जीवन सॉफ्टवेयर और सारण जिले का कड़ा संघर्ष विनिर्माण क्षेत्र
अगर बहुत ही आसान और सीधे शब्दों में समझा जाए कि इस महान लोक नाट्यकार की वास्तविक जीवन कोडिंग और इसका ऐतिहासिक गणित नियम क्या कहता है, तो भिखारी ठाकुर का जन्म 1887 में बिहार के सारण जिले के एक बेहद गरीब और खुदरा परिवार में हुआ था। गरीबी की मार और कठिन परिस्थितियों के कड़े चक्रव्यूह के बीच पले-बढ़े इस सर्जक ने बचपन से ही लोक संगीत और नौटंकी शैली का एक नया प्रोग्रेसिव सॉफ्टवेयर विनिर्मित करने का पक्का नियम अपनाया। उन्होंने प्रवासी मजदूरों की मंदी और विछोह की कड़वी पीड़ा को खुद नज़दीक से महसूस किया था, जिसके चलते उन्होंने वर्ष 1917 में अपने महापरिनिर्वाण से पहले भोजपुरी लोक नाट्य कला को एक अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान किया, जिसने आजीविका के लिए पलायन करने वाले समाज की वास्तविक रीढ़ की हड्डी को दुनिया के सामने साफ़ तौर पर उजागर किया।
‘बिदेसिया’ मास्टरपीस की इनसाइड कोडिंग और भोजपुरी के शेक्सपीयर का संप्रभु खिताब
इस साहित्यिक विनिर्माण क्षेत्र के सबसे आलीशान सुरक्षा फीचर्स पर गौर करें तो उनका रचित नाटक ‘बिदेसिया’ केवल एक सामान्य मनोरंजन रत्ती भर भी नहीं है, बल्कि यह पारिवारिक विछोह, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक यथार्थ का एक बहुत ही सुंदर व साफ़ डिजिटल सुरक्षा मॉडल है। मानवीय भावनाओं की इतनी कड़क और गहरी कोडिंग करने के कारण ही विद्वानों ने उन्हें ‘भॉलीवूड का जनक’ और ‘भोजपुरी का शेक्सपीयर’ जैसे संप्रभु खिताबों से मुस्तैदी से नवाजा है। उनके अन्य लोकप्रिय नाटकों जैसे ‘बेताबी’, ‘गंगा स्नान’ और ‘गबरघिचोर’ के सॉफ्टवेयर ने समाज में व्याप्त खुदरा कुरीतियों, जातिवाद और अनधिकृत लालच पर करारा कड़क प्रहार किया, जिससे भोजपुरी भाषा को एक नया और आलीशान क्रेडेंशियल दर्जा हासिल हो सका।
Bikhari Thakur: सांस्कृतिक संरक्षण का प्रोग्रेसिव चार्ट और फर्जी सेलर अफ़वाहों से बचने की कड़क प्रिवेंटिव सलाह
सांस्कृतिक नीति विश्लेषकों का कंप्यूटर स्क्रीन पर साफ तौर पर मानना है कि आज के इस आधुनिक युग में भी भिखारी ठाकुर की रचनाएं उतनी ही प्रासंगिक हैं, जिसके चलते पटना सहित पूरे बिहार में विभिन्न नाट्य मंचों और डिजिटल माध्यमों पर उनके नाटकों का प्रोग्रेसिव लाइव री-ऑडिट और मंचन रन किया जा रहा है। कला प्रेमियों को कड़क प्रिवेंटिव सलाह दी गई है कि वे इंटरनेट पर तैरने वाले किसी भी अनधिकृत सेलर के फर्जी ऑडियो-वीडियो लिंक्स या भ्रामक प्रतियों के चक्रव्यूह से खुद को पूरी तरह महफ़ूज़ रखें। केवल राज्य सरकार के संस्कृति विभाग और अधिकृत अकादमियों द्वारा प्रमाणित ऑफिशियल क्रेडेंशियल बुलेटिनों पर ही अपना पूरा व साफ़ विश्वास लॉक करें और किसी भी अनधिकृत स्पैम संदेश को अपने मोबाइल से तुरंत डिलीट (साफ़) कर दें। अपनी लोक कला की जड़ों पर पूरा विश्वास बनाए रखना और कड़े नागरिक अनुशासन का परिचय देना ही हमारे स्वर्णिम कल का सर्वोत्तम सुरक्षा फीचर्स साबित होने जा रहा है।
निष्कर्ष: सुरक्षित लोक नीति, कड़ा सांस्कृतिक अनुशासन और आत्मनिर्भर कला समाज का स्वर्णिम कल
इस प्रकार भिखारी ठाकुर की 109वीं पुण्यतिथि (Bikhari Thakur) पर होने वाला यह कड़ा लोक स्मरण साफ़ दर्शाता है कि हमारी राष्ट्रीय सांस्कृतिक नीतियां, बिहार सरकार के कला नियम और क्षेत्रीय भाषा विनिर्माण का ढांचा आज के इस बेहद आधुनिक, एआई (AI) और डिजिटल युग में भी देश की प्राचीन लोक धरोहरों को अक्षुण्ण रखने के लिए कितनी मुस्तैदी, दूरदर्शी सोच और कड़े संकल्प के साथ काम कर रहे हैं। कला के इन प्राचीन ऋतु चक्रों को समझना, अपनी मिट्टी के प्रति हीनभावना की मंदी को दिमाग से पूरी तरह से डिलीट (साफ़) करना और कड़े व्यक्तिगत व सामाजिक अनुशासन के साथ आगे बढ़ना महज़ एक नाटक देखना रत्ती भर भी नहीं है, बल्कि यह विदेशी कूटनीतिक प्रोपेगैंडा के कड़े जोखिमों को पूरी तरह ध्वस्त करने, फेक व जादुई दावों को समाज से दूर रखने और आत्मनिर्भर भारत के तहत एक ज़िम्मेदार, जागरूक व कानून सम्मत अनुशासित राष्ट्रभक्त नागरिक बनने का एक बहुत ही सुंदर, साफ़ व पारदर्शी राष्ट्रीय संकल्प होता है। हमेशा संस्कृति मंत्रालय द्वारा प्रमाणित ऑफिशियल दैनिक बुलेटिनों, अधिकृत अकादमियों के प्रेस नोटों और प्रामाणिक लोक सूचनाओं पर ही अपना अटूट विश्वास बनाए रखें, क्योंकि यही आपके सुनहरे व महफ़ूज़ कल की सबसे बड़ी रीढ़ की हड्डी साबित होगी।
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