भाषा पर हमला: मराठी न बोलने पर गुजराती दुकानदार से मारपीट, कहाँ है इंसाफ?
हाल ही में महाराष्ट्र में एक चौंकाने वाली घटना सामने आई है, जिसमें महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के कुछ कार्यकर्ताओं ने एक गुजराती दुकानदार पर सिर्फ इसलिए हमला कर दिया क्योंकि उसने मराठी भाषा में बात नहीं की। यह घटना न केवल कानून व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है, बल्कि हमारे देश की भाषाई विविधता और सहिष्णुता की भावना पर भी गहरी चोट पहुंचाती है।
भाषा पर हमला: इस मामले में महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने तुरंत संज्ञान लेते हुए पुलिस को एफआईआर दर्ज करने और सख्त कार्रवाई के आदेश दिए हैं। यह कार्रवाई सराहनीय है, लेकिन सवाल यह उठता है कि इस तरह की घटनाएं बार-बार क्यों हो रही हैं? और सबसे बड़ी बात – क्या भाषाई पहचान इतनी बड़ी हो गई है कि इसके लिए इंसानियत को कुचल दिया जाए?
चौंकाने वाली बात यह है कि MNS प्रमुख राज ठाकरे और शिवसेना (उद्धव गुट) के नेता उद्धव ठाकरे, दोनों ने इस घटना पर चुप्पी साध रखी है। जो नेता हमेशा “मराठी अस्मिता” की बात करते हैं, वो आज एक निर्दोष व्यक्ति पर हुए हमले पर क्यों मौन हैं?
यह घटना बताती है कि अब धर्म के बाद भाषा भी राजनीति का नया हथियार बनती जा रही है। जो लोग हमेशा “धर्म के नाम पर हिंसा” पर सवाल उठाते हैं, उनकी आवाज इस भाषाई हमले पर कहीं सुनाई नहीं दे रही। क्या यह “चयनात्मक आक्रोश” नहीं है?
भारत एक बहुभाषी देश है जहां संविधान ने हर नागरिक को अपनी भाषा बोलने की आज़ादी दी है। ऐसे में किसी को मजबूर करना कि वह केवल एक ही भाषा बोले, न केवल संविधान के खिलाफ है, बल्कि यह हमारे सामाजिक ताने-बाने को भी नुकसान पहुंचाता है।
भाषाई गुंडागर्दी: मराठी न बोलने पर MNS कार्यकर्ता ने आम नागरिक पर किया हमला
महाराष्ट्र में हाल ही में एक चौंकाने वाली और निंदनीय घटना सामने आई है, जिसमें महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (MNS) के एक सदस्य ने एक आम व्यक्ति पर सिर्फ इसलिए हमला कर दिया क्योंकि वह मराठी भाषा में बात नहीं कर रहा था। यह घटना न केवल संविधान में दिए गए भाषा की स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है, बल्कि देश की सामाजिक एकता पर भी बड़ा हमला है।
भाषा पर हमला: इस घटना ने आम जनता को झकझोर कर रख दिया है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, पीड़ित व्यक्ति एक दुकानदार था जो सामान्य बातचीत में मराठी की बजाय हिंदी या गुजराती भाषा का उपयोग कर रहा था। MNS कार्यकर्ता को यह बात नागवार गुज़री और उसने मारपीट शुरू कर दी।
भाषा नहीं, इंसानियत जरूरी है
भारत एक बहुभाषी और बहुसांस्कृतिक देश है जहाँ हर नागरिक को अपनी पसंद की भाषा बोलने की आज़ादी है। संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) हर व्यक्ति को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। ऐसे में किसी को ज़बरदस्ती किसी भाषा को अपनाने के लिए मजबूर करना सीधा-सीधा संविधान का उल्लंघन है।
निष्कर्ष
यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या आज का आम नागरिक सुरक्षित है? जब भाषा के नाम पर हिंसा की जा रही है, तब मानवता और लोकतंत्र की असली भावना कहाँ है?
अब वक्त आ गया है कि हम “भाषा नहीं, इंसानियत पहले” की भावना को अपनाएं।