नियमों के बावजूद बिना पर्चे बिक रहीं एंटीबायोटिक्स, प्रशासनिक लापरवाही से बढ़ता AMR का खतरा
देश में 50% एंटीबायोटिक्स OTC बिक्री, कमजोर निगरानी तंत्र बना जन स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा
Antibiotics Dangerous: देश में एंटीमाइक्रोबियल रेसिस्टेंस (AMR) का खतरा तेजी से बढ़ रहा है और इसकी मुख्य वजह है प्रशासनिक तंत्र की घोर उदासीनता। कानून और नियम कागजों में मौजूद हैं, लेकिन जमीन पर उनका पालन नहीं हो रहा। एंटीबायोटिक्स की ओवर द काउंटर (OTC) बिक्री पर ढील, डॉक्टरों के लिए गैर-बाध्यकारी दिशानिर्देश, कृषि और पशुपालन में कमजोर नियमन, निगरानी की कमी और एजेंसियों की सीमित क्षमता – ये सभी मिलकर देश में AMR के खतरे को खतरनाक स्तर तक बढ़ा रहे हैं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य विभागों में समन्वय का घोर अभाव है, जो इस समस्या को और गंभीर बना रहा है।
Antibiotics Dangerous: प्रशासनिक उदासीनता की कीमत
यह स्थिति स्पष्ट रूप से बताती है कि भारत में AMR के लगातार बढ़ते खतरे और उस पर नियंत्रण को लेकर हमारा प्रशासनिक तंत्र अपने कर्तव्यों के प्रति किस हद तक उदासीन है। यह महज लापरवाही नहीं, बल्कि जन स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ है।
मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा और बैतूल में जहरीले कफ सिरप से हुई बच्चों की मौतें इस उदासीनता की गंभीरता को स्पष्ट करती हैं। ये घटनाएं बताती हैं कि दवा की गुणवत्ता, उपयोग और निगरानी – तीनों स्तरों पर तंत्र ठीक से काम नहीं कर रहा। जब खतरा साफ दिख रहा है, तो सख्ती और जवाबदेही अब तक क्यों नहीं? यह प्रश्न हर जागरूक नागरिक के मन में उठना स्वाभाविक है।
OTC बिक्री – नियम मौजूद, रोक नदारद
ड्रग्स एंड कॉस्मेटिक्स एक्ट के तहत एंटीबायोटिक्स शेड्यूल-H और H1 श्रेणी में आती हैं। इसका मतलब है कि इन्हें केवल पंजीकृत डॉक्टर की पर्ची पर ही बेचा-खरीदा जाना चाहिए। कानून बिल्कुल स्पष्ट है।
लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। देश में लगभग 50 प्रतिशत एंटीबायोटिक्स बिना किसी पर्चे के बिक रही हैं। यह आंकड़ा केवल अनुमान नहीं है, बल्कि केंद्रीय औषधि मानक नियंत्रण संगठन (CDSCO) और स्वास्थ्य मंत्रालय की रिपोर्टों में दर्ज है।
विभिन्न संसदीय समितियों ने भी इसे स्वीकार किया है कि देश में खुदरा स्तर पर प्रिस्क्रिप्शन की जांच और रिकॉर्डिंग की व्यवस्था बेहद कमजोर है। यानी सरकार खुद मानती है कि व्यवस्था फेल हो रही है, लेकिन सुधार की कोई ठोस कोशिश नहीं हो रही। रेड लाइन कैंपेन चलाया गया, पैकेट पर चेतावनी लिखी गई, लेकिन ये सब केवल दिखावा साबित हुए। OTC बिक्री पर अब तक वास्तविक नियंत्रण नहीं बन पाया है।
Antibiotics Dangerous: डॉक्टरों के लिए दिशानिर्देश, बाध्यता नहीं
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) ने डॉक्टरों के लिए एंटीबायोटिक स्टीवर्डशिप और स्टैंडर्ड ट्रीटमेंट गाइडलाइंस जारी की हैं। ये दिशानिर्देश विस्तृत और वैज्ञानिक हैं। समस्या यह है कि ये कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं हैं। डॉक्टर चाहें तो इनका पालन करें, न चाहें तो न करें। कोई जवाबदेही नहीं, कोई दंड नहीं।
ICMR के अनुसार, वायरल बुखार और सर्दी-जुकाम जैसे मामलों में भी आधे से अधिक मरीजों को एंटीबायोटिक दी जा रही है। यह चिकित्सकीय रूप से गलत है क्योंकि वायरल संक्रमण पर एंटीबायोटिक्स का कोई असर नहीं होता। सरकारी अस्पतालों के बाहर एंटीबायोटिक प्रिस्क्रिप्शन की कोई अनिवार्य ऑडिट व्यवस्था ही नहीं है। निजी अस्पतालों और क्लीनिकों में क्या हो रहा है, इसकी कोई निगरानी नहीं।
नतीजतन, ब्रॉड-स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक्स का अत्यधिक और अनावश्यक उपयोग हो रहा है, जो सीधे AMR को बढ़ा रहा है।
पशुपालन और कृषि – कमजोर नियम, बड़ा खतरा
पशुपालन, पोल्ट्री और मत्स्य पालन क्षेत्र में एंटीबायोटिक्स का उपयोग सबसे बड़ी चिंता है। वास्तव में, इन क्षेत्रों में एंटीबायोटिक्स का सर्वाधिक उपयोग हो रहा है।
केंद्र सरकार ने क्रिटिकल एंटीमाइक्रोबियल्स के पशुओं में उपयोग पर प्रतिबंध लगाया है। कागज पर यह एक अच्छा कदम था। लेकिन पशु-औषधियों की बिक्री और उपयोग की निगरानी नहीं होने से इसका कोई ठोस प्रभाव धरातल पर नजर नहीं आ रहा। राज्यों में पशु-चिकित्सा दवाओं के लिए निरीक्षण ढांचा बेहद कमजोर है। कई राज्यों में तो यह ढांचा नाममात्र का ही है।
सबसे गंभीर बात यह है कि देश में मानव और पशु स्वास्थ्य डेटा की एकीकृत व्यवस्था ही नहीं है। जबकि विभाग और सरकार दोनों मानते हैं कि पशु से मानव में AMR ट्रांसमिशन एक गंभीर जोखिम है। यानी समस्या की पहचान है, लेकिन समाधान की कोशिश नहीं।
Antibiotics Dangerous: दवा गुणवत्ता और निगरानी की विफलता
देश में 10,500 से अधिक दवा निर्माण इकाइयां हैं। वित्त वर्ष 2024-25 में 1.06 लाख से अधिक दवा नमूनों की जांच की गई। इनमें से 3,100 से अधिक दवाएं अधोमानक और 240 से अधिक नकली व मिलावटी पाई गईं। ये आंकड़े भयावह हैं, लेकिन असली सच्चाई और भी डरावनी है। यह आंकड़ा केवल उन दवाओं का है जो जांच तक पहुंचीं। बड़ी मात्रा में दवाएं जांच के दायरे में आईं ही नहीं।
किसी को यह जानकारी ही नहीं है कि देश में हर साल कुल कितनी दवा बनती है। यह बुनियादी जानकारी का अभाव खुद में चौंकाने वाला है। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा और बैतूल में जहरीले कफ सिरप की घटना इसी कमजोर निगरानी का परिणाम थी। दिल्ली, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों से नकली और अधोमानक दवाओं की नियमित बरामदगी होती रहती है।
ये घटनाएं तंत्र की लापरवाही, कर्तव्यों के प्रति उदासीनता और व्यवस्था की सीमाओं को उजागर करने के लिए काफी हैं।
बिखरी जिम्मेदारी, बढ़ता खतरा
ICMR और विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्टों के अनुसार, भारत में हर तीसरा बैक्टीरियल संक्रमण दवा-प्रतिरोधी हो चुका है। यह आंकड़ा खतरे की घंटी है।
AMR से हर साल सीधे तौर पर लगभग तीन लाख और उससे जुड़े मामलों से दस लाख से अधिक मौतें होती हैं। यह संख्या कई गंभीर बीमारियों से होने वाली मौतों से अधिक है। इसके बावजूद, AMR सर्विलांस को लेकर कोई एकीकृत और ठोस व्यवस्था अब तक देश में बनी ही नहीं है। मानव स्वास्थ्य, पशु स्वास्थ्य और पर्यावरणीय निगरानी का डेटा अलग-अलग विभागों में बिखरा हुआ है।
‘वन हेल्थ’ नीति दस्तावेजों में मजबूत दिखती है, लेकिन इसका जमीनी क्रियान्वयन बेहद कमजोर है। यह नीति और व्यवहार के बीच की खाई का स्पष्ट उदाहरण है।
Antibiotics Dangerous: विशेषज्ञों की चेतावनी
डॉ. महेश वर्मा, कुलपति, आईपी विश्वविद्यालय का कहना है, “भारत में एंटीबायोटिक्स के इस्तेमाल को लेकर नियमों का जिस तरह से कड़ाई से पालन होना चाहिए, वैसा हो नहीं रहा है। फार्मेसी से बिना पर्चे दवाओं की बिक्री और कृषि-पशुपालन में एंटीबायोटिक्स का अनियंत्रित प्रयोग जारी है।”
डॉ. रजनीश आतम, ज्वाइंट सेक्रेटरी, इंडियन मेडिकल एसोसिएशन कहते हैं, “मानव, पशु और पर्यावरणीय स्वास्थ्य विभागों के बीच समन्वय और मजबूत AMR सर्विलांस के बिना यह संकट और गहराता जाएगा।” ये चेतावनियां गंभीर हैं और इन पर तुरंत ध्यान देने की जरूरत है।
क्या है समाधान?
AMR के खतरे से निपटने के लिए एंटीबायोटिक्स के उत्पादन से लेकर मरीज तक पहुंचने की पूरी श्रृंखला का निगरानी तंत्र बेहद मजबूत होना चाहिए। तभी हम दवा-गुणवत्ता और AMR पर नियंत्रण का ठोस प्रयास कर सकेंगे। OTC बिक्री, डॉक्टरों के प्रिस्क्रिप्शन और पशु-चिकित्सा उपयोग – तीनों मोर्चों पर ठोस नियम और उनकी सख्त निगरानी के बिना AMR को रोकना संभव नहीं है।
प्रिस्क्रिप्शन को कानूनी रूप से बाध्यकारी बनाना होगा। फार्मेसियों में डिजिटल रिकॉर्डिंग अनिवार्य करनी होगी। हर दवा की बिक्री का डेटा केंद्रीय रूप से संग्रहित होना चाहिए। डॉक्टरों के लिए एंटीबायोटिक प्रिस्क्रिप्शन की ऑडिट व्यवस्था अनिवार्य होनी चाहिए। गैर-जरूरी प्रिस्क्रिप्शन पर दंड का प्रावधान होना चाहिए।
पशु-चिकित्सा क्षेत्र में निगरानी तंत्र को मजबूत करना होगा। मानव और पशु स्वास्थ्य डेटा को एकीकृत करना होगा।
Antibiotics Dangerous: निष्कर्ष
AMR एक मूक महामारी है जो धीरे-धीरे लेकिन निरंतर बढ़ रही है। यदि अभी भी प्रशासनिक तंत्र नहीं जागा, तो वह दिन दूर नहीं जब सामान्य संक्रमण भी जानलेवा हो जाएंगे। कानून तो मौजूद हैं, जरूरत है उन्हें सख्ती से लागू करने की। निगरानी तंत्र को मजबूत करना होगा और सभी हितधारकों को जवाबदेह बनाना होगा। समय रहते यदि ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं।
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