मिडिल ईस्ट युद्ध के बीच पूर्व RAW प्रमुख अमरजीत सिंह दुलत का बड़ा बयान, कहा- ईरान जीत सकता है जंग, भारत-ईरान संबंधों और रणनीतिक साझेदारी पर खुलासा
पूर्व RAW प्रमुख का बयान, भारत-ईरान रिश्तों और युद्ध पर बड़ा विश्लेषण
Amarjit Singh Dulat statement: मिडिल ईस्ट में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी संघर्ष के बीच भारत की खुफिया एजेंसी RAW के पूर्व प्रमुख अमरजीत सिंह दुलत ने बड़ा बयान दिया है। उन्होंने कहा कि भारत के ईरान के साथ बेहद पुराने और मजबूत रिश्ते रहे हैं और मौजूदा संघर्ष में ईरान की जीत की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। यह बयान ऐसे समय आया है जब वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी उथलपुथल मची हुई है।
Amarjit Singh Dulat statement: पूर्व RAW प्रमुख दुलत ने ईरान के बारे में क्या कहा?
अमरजीत सिंह दुलत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत हमेशा ईरान के साथ रहा है और दोनों देशों के संबंध काफी पुराने हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा हालात में अमेरिका और इजरायल के साथ चल रहे संघर्ष में ईरान की जीत की संभावना बनती है।
हालाँकि दुलत ने इस पूरे घटनाक्रम को दुर्भाग्यपूर्ण बताया और कहा कि जो कुछ भी इस वक्त हो रहा है वह गहरी चिंता का विषय है। उनका यह बयान उस दौर में आया है जब मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव ने पूरी दुनिया को आर्थिक संकट की कगार पर खड़ा कर दिया है।
Amarjit Singh Dulat statement: अमरजीत सिंह दुलत कौन हैं और उनकी बात क्यों मायने रखती है?
अमरजीत सिंह दुलत भारत की प्रमुख खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी RAW के पूर्व प्रमुख रहे हैं। उन्होंने अपने करियर में दशकों तक भारत की आंतरिक और बाहरी सुरक्षा नीतियों को करीब से देखा और उनमें योगदान दिया।
कश्मीर मामलों और पाकिस्तान के साथ संबंधों पर उनकी गहरी समझ उन्हें देश के सबसे अनुभवी सुरक्षा विशेषज्ञों में से एक बनाती है। ऐसे में मिडिल ईस्ट संघर्ष पर उनका नजरिया महज एक राय नहीं बल्कि दशकों की कूटनीतिक समझ का निचोड़ है।
Amarjit Singh Dulat statement: भारत और ईरान के बीच संबंधों की शुरुआत कब और कैसे हुई?
भारत की स्वतंत्रता के बाद से ही दोनों देशों के बीच धीरे-धीरे कूटनीतिक संबंध विकसित होते रहे। 1950 से 1970 के दशक में ईरान का झुकाव अमेरिका की ओर था लेकिन इसके बावजूद उसने भारत के साथ अपने रिश्ते जीवित रखे।
1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति के बाद उसकी विदेश नीति में बड़ा बदलाव आया। इस बदलाव के बाद भी भारत ने अपनी संतुलित कूटनीति बनाए रखी और ईरान के साथ संबंधों को बनाए रखते हुए पश्चिमी देशों से भी अपने नाते कायम रखे।
Amarjit Singh Dulat statement: चाबहार बंदरगाह भारत और ईरान के रिश्तों में क्यों इतना अहम है?
चाबहार बंदरगाह भारत और ईरान के द्विपक्षीय संबंधों की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी है। भारत इस बंदरगाह के विकास में सक्रिय रूप से निवेश और सहयोग कर रहा है।
इस बंदरगाह के जरिए भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक सीधी पहुँच मिलती है और सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें पाकिस्तान को पूरी तरह बायपास किया जा सकता है। यह भारत की कनेक्टिविटी और व्यापार रणनीति का एक बेहद रणनीतिक हिस्सा है।
Amarjit Singh Dulat statement: INSTC क्या है और भारत के लिए यह क्यों जरूरी है?
इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर यानी INSTC एक महत्वाकांक्षी बहुराष्ट्रीय परियोजना है जो भारत, ईरान और रूस को एक साझा व्यापारिक मार्ग से जोड़ती है। इस कॉरिडोर के माध्यम से भारत यूरोप और मध्य एशिया तक बहुत कम समय और लागत में व्यापार कर सकता है।
विदेश नीति विशेषज्ञों के अनुसार, यदि मिडिल ईस्ट संघर्ष लंबा खिंचा तो INSTC भारत के लिए एक वैकल्पिक व्यापार मार्ग के रूप में और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा। यह परियोजना भारत की बहुध्रुवीय विदेश नीति का एक अहम स्तंभ है।
Amarjit Singh Dulat statement: मिडिल ईस्ट युद्ध का भारत पर क्या असर पड़ रहा है?
ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच जारी तनाव का सीधा असर वैश्विक तेल और गैस बाजार पर पड़ रहा है। भारत दुनिया के सबसे बड़े तेल आयातक देशों में से एक है और ऊर्जा कीमतों में किसी भी बड़े उछाल से देश की अर्थव्यवस्था पर गहरा दबाव पड़ सकता है।
इसके अलावा मिडिल ईस्ट में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं और उनकी सुरक्षा तथा वहाँ से आने वाला विप्रेषण धन यानी रेमिटेंस भी भारत की अर्थव्यवस्था के लिए बहुत जरूरी है। युद्ध की स्थिति में इन दोनों पहलुओं पर खतरा मंडरा रहा है।
Amarjit Singh Dulat statement: भारत ईरान पर लगे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों के बावजूद रिश्ते कैसे संभालता रहा है?
भारत ने हमेशा अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के तहत ईरान के साथ संबंध बनाए रखे हैं। जब भी अमेरिका ने ईरान पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए तो भारत ने अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए बीच का रास्ता अपनाया।
कूटनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, भारत की यह संतुलन नीति उसे एक ऐसी वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित करती है जो किसी भी गुट में शामिल हुए बिना अपने हितों की रक्षा करने में सक्षम है। यही वजह है कि भारत मिडिल ईस्ट में एक विश्वसनीय मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है।
निष्कर्ष
मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध एक ऐसे मोड़ पर आ गया है जहाँ भारत को अपनी कूटनीतिक बुद्धिमता का सर्वोत्तम प्रदर्शन करना होगा। पूर्व RAW प्रमुख दुलत का बयान भारत की उस परंपरागत नीति की याद दिलाता है जिसमें राष्ट्रीय हित हमेशा किसी भी गुटबंदी से ऊपर रहे हैं।
चाबहार बंदरगाह, INSTC और ऊर्जा सुरक्षा जैसे अहम मुद्दों को देखते हुए भारत का ईरान के साथ संतुलित और व्यावहारिक रिश्ता बनाए रखना आने वाले समय में और भी जरूरी हो जाएगा। वैश्विक अनिश्चितता के इस दौर में भारत की स्वतंत्र विदेश नीति ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।
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