अहमदाबाद में अष्टमी पर साड़ी पहनकर गरबा करते हैं पुरुष, जानें 200 साल पुरानी परंपरा
सादु माता नी पोल में बरोट समुदाय के पुरुष अष्टमी की रात साड़ी पहनकर गरबा करते हैं।
Ahmedabad Garba Tradition: गुजरात में शारदीय नवरात्रि के पर्व पर गरबा और डांडिया रास की धूम पूरी दुनिया में अपनी सांस्कृतिक पहचान के लिए जानी जाती है। सामान्य तौर पर गरबा पंडालों में महिलाएं और युवतियां पारंपरिक चनिया-चोली में सज-धजकर मां शक्ति की आराधना में थिरकती नजर आती हैं, लेकिन अहमदाबाद के पुराने ऐतिहासिक परकोटे वाले शहर में एक ऐसी रस्म निभाई जाती है, जो आस्था और इतिहास का एक विरला संगम पेश करती है। यहां नवरात्रि की महाअष्टमी की मध्यरात्रि को बरोट समुदाय के पुरुष महिलाओं की तरह पूरी मर्यादा के साथ पारंपरिक साड़ियां पहनकर गरबा करते हैं। यह रस्म सदियों पुरानी एक लोककथा, पश्चाताप और ‘सादु माता’ के प्रति अगाध श्रद्धा पर आधारित है, जिसे स्थानीय लोग करीब 200 वर्षों से अधिक समय से बिना किसी रुकावट के निभाते आ रहे हैं।
सादु माता नी पोल: जहां जीवित है सदियों पुरानी पश्चाताप की परंपरा
यह अनोखा आयोजन अहमदाबाद के पुराने शहर के शाहपुर क्षेत्र में स्थित ‘सादु माता नी पोल’ में संपन्न होता है। गुजरात में ‘पोल’ उन घने, संकरे और पारंपरिक रिहायशी मोहल्लों को कहा जाता है, जहां पीढ़ियों से एक ही समुदाय के लोग मिल-जुलकर रहते हैं। महाअष्टमी की रात इस पोल की संकरी गलियां रोशनी और भक्ति संगीत से सराबोर हो जाती हैं।
इस रात यहां कोई आधुनिक डीजे या लाउड कमर्शियल म्यूजिक नहीं होता, बल्कि ढोलक और पारंपरिक मंजीरों की ताल पर बरोट समुदाय के पुरुष लाल, पीली और बंधेज की साड़ियां पहनकर गोल घेरे में गरबा करते हैं। पुरुषों का यह रूप किसी तमाशे या मनोरंजन के लिए नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों की एक ऐतिहासिक भूल का प्रायश्चित करने और देवी के क्रोध को शांत रखने के लिए धारण किया जाता है। दूर-दराज के इलाकों से लोग इस गंभीर और मर्यादित रस्म के साक्षी बनने के लिए शाहपुर पहुंचते हैं।
सादुबेन की लोककथा: एक असहाय महिला की पुकार और समुदाय की चुप्पी
स्थानीय मान्यताओं और बुजुर्गों द्वारा पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई जाने वाली कथा के अनुसार, लगभग दो शताब्दियों पूर्व इसी मोहल्ले में सादुबेन नाम की एक अत्यंत पतिव्रता और धर्मपरायण महिला निवास करती थीं। उस दौर के एक अत्याचारी और रसूखदार सामंत ने उन पर कुदृष्टि डाली और उनका उत्पीड़न करना शुरू कर दिया। जब उस दुराचारी से सादुबेन का आत्मसम्मान खतरे में पड़ गया, तो वह न्याय और सुरक्षा की गुहार लगाने के लिए अपने मोहल्ले के बरोट समुदाय के पुरुषों के पास पहुंचीं।
किंवदंती है कि उस समय उस दबंग सामंत के रसूख और भय के कारण समुदाय के पुरुषों ने कायरता दिखाई और एक असहाय महिला की रक्षा के लिए अपनी तलवारें या लाठियां नहीं उठाईं। पुरुषों की इस कायरता और बेबसी से आहत होकर सादुबेन ने अपने प्राण त्याग दिए, लेकिन देह त्यागने से पूर्व उन्होंने समुदाय के पुरुषों को यह श्राप दिया कि जिस पौरुष की रक्षा वे एक अबला के सम्मान के लिए नहीं कर सके, वह व्यर्थ है और उनकी आने वाली पीढ़ियां स्त्री के भेष में ही अपनी मुक्ति का मार्ग ढूंढेंगी।
श्राप मुक्ति से लेकर आस्था तक: क्यों साड़ी पहनकर होता है गरबा?
सादुबेन के बलिदान और श्राप के बाद जब समुदाय में कई संकट और परेशानियां आने लगीं, तो बुजुर्गों ने अपनी पूर्वजों की अक्षम्य भूल को स्वीकार किया। समुदाय ने प्रायश्चित के तौर पर उसी पोल में सादुबेन को ‘माता’ का दर्जा देकर उनका एक पवित्र मंदिर स्थापित किया। यह निर्णय लिया गया कि प्रत्येक वर्ष नवरात्रि की आठवीं रात (महाअष्टमी) को पुरुष अपना अहंकार और पुरुषत्व का दंभ त्यागकर विनम्रतापूर्वक महिलाओं की साड़ी पहनेंगे और पूरी रात देवी के सामने गरबा करके क्षमा याचना करेंगे।
समय के चक्र के साथ यह आयोजन मात्र भय या श्राप से मुक्ति का अनुष्ठान न रहकर भक्ति, मातृशक्ति के प्रति सम्मान और गहरी आस्था का प्रतीक बन गया। वर्तमान में समुदाय के बुजुर्गों से लेकर आधुनिक युवा और उच्च पदों पर कार्यरत पेशेवर भी इस रात पूरी निष्ठा के साथ पारंपरिक साड़ी और गहने पहनकर माता के दरबार में शीश नवाते हैं। कई श्रद्धालु किसी गंभीर बीमारी से मुक्ति या संतान प्राप्ति जैसी मन्नतें पूरी होने पर भी इस विशेष गरबा में साड़ी पहनकर शामिल होते हैं।
Ahmedabad Garba Tradition: सादु माता मंदिर का महत्व और अनुष्ठान की मर्यादा
सादु माता नी पोल में स्थित मंदिर इस पूरी परंपरा की धुरी है। अष्टमी की रात मंदिर परिसर में महाआरती का आयोजन होता है, जिसमें सादु माता को चुनरी और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। इसके पश्चात केवल बरोट समुदाय के पुरुष ही चौक में गरबा का घेरा बनाते हैं। अनुष्ठान के दौरान नर्तक बेहद गंभीर, शालीन और नंगे पांव रहकर गरबा की प्राचीन शैलियों का प्रदर्शन करते हैं।
नृत्य के दौरान गाए जाने वाले गीतों में सादु माता के त्याग, भक्ति और पूर्वजों द्वारा मांगी जाने वाली क्षमा का उल्लेख होता है। यह अनुष्ठान इस बात का जीवंत संदेश देता है कि स्त्री सम्मान की रक्षा न करने वाले समाज को युगों-युगों तक अपनी भूल स्वीकार करनी पड़ती है और देवी के सम्मुख अहंकार का कोई स्थान नहीं होता।
Ahmedabad Garba Tradition: आधुनिक दौर में 200 साल पुरानी विरासत का संरक्षण
वैश्वीकरण और आधुनिकता के इस युग में जहां गरबा बड़े मैदानों और महंगे पास वाले व्यावसायिक आयोजनों में बदल चुका है, वहीं अहमदाबाद के शाहपुर की यह पोल अपनी 200 साल पुरानी विरासत को पूरी शुद्धता के साथ संजोए हुए है। समुदाय के युवा पीढ़ी के लोग गर्व से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं, जो भारतीय लोक संस्कृति की विविधता और गहन दार्शनिक पहलुओं को उजागर करती है।
अहमदाबाद का यह आयोजन याद दिलाता है कि भारत के त्योहार केवल उत्सव नहीं, बल्कि समाज को इतिहास के सबक याद दिलाने और नारी शक्ति के सर्वोच्च सम्मान को पुनर्स्थापित करने का माध्यम भी हैं।
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