ग्रहण में खाने-पीने की चीजों में तुलसी क्यों डाली जाती है? जानें इसके पीछे का विज्ञान और धार्मिक महत्व

विज्ञान और आस्था से जुड़ी प्राचीन परंपरा: बैक्टीरिया, विकिरण से बचाव, पोषक तत्वों की रक्षा और धार्मिक महत्व

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Chandra Grahan 2026: जैसे ही किसी सूर्य ग्रहण या चंद्र ग्रहण की जानकारी सामने आती है, भारतीय घरों में एक अलग ही हलचल मच जाती है। दादी-नानी और घर के बड़े-बुजुर्ग तुरंत रसोई की ओर दौड़ते हैं और दूध, दही, घी, पानी और पके हुए भोजन में तुलसी के पत्ते डालने लगते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और आज भी हर हिंदू घर में बड़ी श्रद्धा के साथ इसका पालन किया जाता है। बचपन में यह सब देखकर मन में सवाल उठता था कि आखिर एक छोटे से पत्ते में ऐसी क्या ताकत है जो ग्रहण के दौरान खाने को सुरक्षित रख सकती है। इस सवाल का जवाब विज्ञान और अध्यात्म दोनों में छिपा हुआ है।

Chandra Grahan 2026: ग्रहण के दौरान खाना क्यों हो जाता है अशुद्ध

ग्रहण एक खगोलीय घटना है लेकिन इसका प्रभाव केवल आसमान तक सीमित नहीं रहता। वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो ग्रहण के दौरान सूर्य या चंद्रमा से आने वाली किरणें अवरुद्ध हो जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी के वातावरण में हानिकारक पराबैंगनी किरणों यानी अल्ट्रावायलेट रेज का प्रभाव असंतुलित हो जाता है। रोशनी में कमी और तापमान में अचानक बदलाव आने से वातावरण में मौजूद सूक्ष्म जीवाणु और हानिकारक बैक्टीरिया बहुत तेज गति से पनपने लगते हैं। ऐसे परिवेश में खुला रखा पका हुआ भोजन इन बैक्टीरिया की चपेट में आ जाता है और जल्दी दूषित होने लगता है। यही कारण है कि प्राचीन काल से ही ग्रहण के समय भोजन को विशेष सुरक्षा प्रदान करने की परंपरा विकसित हुई और तुलसी इस सुरक्षा का सबसे विश्वसनीय माध्यम बनी।

Chandra Grahan 2026: तुलसी को क्यों कहते हैं जड़ी-बूटियों की रानी

आयुर्वेद में तुलसी को ‘क्वीन ऑफ हर्ब्स’ यानी जड़ी-बूटियों की रानी का दर्जा दिया गया है। यह एकमात्र ऐसा पौधा है जिसे धार्मिक, औषधीय और वैज्ञानिक तीनों दृष्टियों से समान रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। तुलसी के पत्तों में यूजेनॉल, रोजमेरिक एसिड और विभिन्न प्रकार के फ्लेवोनॉइड्स पाए जाते हैं जो इसे एक शक्तिशाली प्राकृतिक एंटीबायोटिक बनाते हैं। इसके अलावा तुलसी में पारे यानी मरकरी के सूक्ष्म अंश और विशेष प्रकार के विद्युत तत्व भी मौजूद होते हैं जो इसे अन्य पौधों से अलग और विशेष बनाते हैं।

Chandra Grahan 2026: तुलसी का एंटी-रेडिएशन गुण

तुलसी की सबसे खास विशेषता यह है कि इसमें एंटी-रेडिएशन गुण होते हैं। वनस्पति विज्ञान के अनुसार तुलसी अपने आसपास के वातावरण में मौजूद हानिकारक किरणों और नकारात्मक तरंगों को सोखने की क्षमता रखती है। ग्रहण के दौरान जब वातावरण में विकिरण का स्तर असामान्य हो जाता है, तब तुलसी का पत्ता खाने के बर्तन में एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है। यह पत्ता हानिकारक विकिरण को भोजन तक पहुंचने से पहले ही अवशोषित कर लेता है, जिससे भोजन की शुद्धता बनी रहती है।

Chandra Grahan 2026: भोजन के पोषक तत्वों की होती है सुरक्षा

ग्रहण के समय भोजन की आणविक संरचना यानी मॉलिक्यूलर स्ट्रक्चर पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि इस दौरान भोजन में मौजूद पोषक तत्व नष्ट होने लगते हैं। ऐसे में तुलसी का पत्ता एक स्टेबलाइजर की भूमिका निभाता है। यह भोजन की आणविक संरचना को स्थिर रखने में मदद करता है और पोषक तत्वों को विघटित होने से बचाता है। यही कारण है कि प्राचीन आयुर्वेदाचार्यों ने ग्रहण के समय भोजन में तुलसी डालने की परंपरा स्थापित की थी जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।

Chandra Grahan 2026: धार्मिक मान्यताओं में तुलसी का स्थान

धार्मिक दृष्टि से तुलसी को भगवान विष्णु की प्रिय मानी जाती है और इसे अत्यंत पवित्र माना गया है। प्राचीन ग्रंथों और पुराणों में तुलसी को साक्षात देवी का दर्जा दिया गया है। यह माना जाता है कि जहां तुलसी का वास होता है वहां नकारात्मक शक्तियां प्रवेश नहीं कर सकतीं। ग्रहण को भारतीय परंपरा में एक कठिन और अशुभ समय माना गया है जब नकारात्मक ऊर्जा का प्रभाव बढ़ जाता है। ऐसे में तुलसी का पत्ता भोजन में डालने से यह माना जाता है कि देवी तुलसी अपनी पवित्र ऊर्जा से भोजन को शुद्ध और सात्विक बनाए रखती हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि तुलसी की उपस्थिति मात्र से किसी भी वस्तु की अशुद्धि दूर हो जाती है।

Chandra Grahan 2026: तुलसी के एंटीबैक्टीरियल गुण करते हैं खाने की रक्षा

तुलसी के पत्तों में प्रचुर मात्रा में एंटीबैक्टीरियल तत्व पाए जाते हैं। जब यह पत्ता भोजन या पानी के संपर्क में आता है तो इसमें मौजूद सक्रिय तत्व वातावरण के हानिकारक बैक्टीरिया को भोजन तक पहुंचने से रोकते हैं। यह ठीक उसी तरह काम करता है जैसे आधुनिक एंटीबायोटिक दवाएं बैक्टीरिया के विरुद्ध काम करती हैं, बस फर्क यह है कि तुलसी एक प्राकृतिक और हानिरहित विकल्प है। ग्रहण के दौरान जब वातावरण में बैक्टीरिया की सक्रियता बढ़ जाती है, तब तुलसी का यह गुण और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।

Chandra Grahan 2026: पानी और दूध में तुलसी डालने का महत्व

ग्रहण के समय केवल पका हुआ भोजन ही नहीं बल्कि पानी और दूध जैसे तरल पदार्थों में भी तुलसी डालने की परंपरा है। इसके पीछे यह तर्क दिया जाता है कि तरल पदार्थ ठोस भोजन की तुलना में वातावरण के प्रभाव को अधिक जल्दी ग्रहण करते हैं। पानी और दूध में बैक्टीरिया अत्यंत तेजी से पनपते हैं। ऐसे में तुलसी का पत्ता डालने से इन तरल पदार्थों में बैक्टीरिया का प्रसार रुकता है और ये स्वास्थ्य के लिए सुरक्षित बने रहते हैं।

Chandra Grahan 2026: आधुनिक युग में भी प्रासंगिक है यह परंपरा

आज के वैज्ञानिक युग में जहां हर परंपरा को तर्क की कसौटी पर कसा जाता है, वहां तुलसी की यह परंपरा पूरी तरह खरी उतरती है। अनेक वैज्ञानिक शोधों ने तुलसी के औषधीय और एंटीमाइक्रोबियल गुणों को प्रमाणित किया है। यह परंपरा इस बात का प्रमाण है कि हमारे पूर्वजों के पास प्रकृति और विज्ञान का गहरा ज्ञान था। उन्होंने इस ज्ञान को धार्मिक परंपराओं के रूप में अगली पीढ़ियों तक पहुंचाया ताकि यह सदैव जीवित रहे।

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