पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार पर तुष्टिकरण का बड़ा आरोप, मदरसों का बजट 12 गुना बढ़ा, भाजपा ने उठाए गंभीर सवाल
ममता सरकार पर भाजपा का बड़ा आरोप, मदरसा बजट 472 करोड़ से 5713 करोड़ तक, 1100% वृद्धि; वोट बैंक राजनीति का खेल
West Bengal News: पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार के कार्यकाल में मदरसा शिक्षा के लिए आवंटित बजट में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। जहां टीएमसी सत्ता में आने के समय (2011) मदरसों का कुल बजट सिर्फ 472 करोड़ रुपये था, वहीं अब यह राशि बढ़कर 5713 करोड़ रुपये हो गई है। यानी पिछले करीब 15 वर्षों में मदरसा बजट लगभग 12 गुना (1100 प्रतिशत से अधिक) बढ़ चुका है। इस भारी वृद्धि को लेकर अब राजनीतिक विवाद तेज हो गया है।
भाजपा ने इसे खुलेआम तुष्टिकरण करार देते हुए ममता बनर्जी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए हैं। पार्टी का कहना है कि चुनावी फायदे के लिए अल्पसंख्यक वोट बैंक को साधने की कोशिश की जा रही है। भाजपा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने शुक्रवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि मदरसा शिक्षकों के नाम पर मस्जिदों में अजान देने वाले मुअज्जिनों का वेतन बढ़ाकर मुस्लिम समुदाय का समर्थन जुटाने का खेल खेला जा रहा है। उन्होंने सवाल किया कि अगर मुस्लिम बच्चों की शिक्षा बेहतर करने के लिए बजट बढ़ाया गया होता तो इसका स्वागत होता। लेकिन सरकार ने शिक्षा के नाम पर केवल वोट बैंक की राजनीति की है।
West Bengal News: बजट वृद्धि के आंकड़े
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2011 (टीएमसी सत्ता में आई): मदरसा शिक्षा बजट – 472 करोड़ रुपये
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2026 (अंतरिम बजट): मदरसा शिक्षा बजट – 5713 करोड़ रुपये
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कुल वृद्धि: लगभग 5241 करोड़ रुपये
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प्रतिशत में वृद्धि: 1100% से अधिक (12 गुना)
यह आंकड़ा पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा 5 फरवरी को पेश किए गए 4.06 लाख करोड़ रुपये के अंतरिम बजट से सामने आया है। इस बजट में मदरसा शिक्षा पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया गया है। टीएमसी का कहना है कि यह अल्पसंख्यक कल्याण और संविधान के अनुच्छेद 30 (अल्पसंख्यकों को शिक्षा संस्थान चलाने का अधिकार) के तहत किया गया प्रावधान है। लेकिन विपक्ष इसे खुला तुष्टिकरण बता रहा है।
भाजपा के मुख्य आरोप और दावे
भाजपा नेताओं ने कई गंभीर बिंदु उठाए हैं:
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तुष्टिकरण की राजनीति सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि बजट बढ़ाने का असली मकसद मुस्लिम वोटों को एकजुट रखना है। राज्य में करीब 30 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, जो टीएमसी का मजबूत वोट बैंक रहे हैं।
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मुअज्जिनों का वेतन बढ़ाया पार्टी का दावा है कि मदरसा शिक्षकों के नाम पर मस्जिदों में काम करने वाले लोगों को भी लाभ दिया जा रहा है। यह शिक्षा से ज्यादा धार्मिक गतिविधियों को बढ़ावा दे रहा है।
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सुरक्षा पर सवाल त्रिवेदी ने पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य का हवाला दिया। उन्होंने कहा था कि कुछ मदरसों के पाकिस्तान से संबंध हैं और वहां आपराधिक गतिविधियां चल रही हैं। ममता सरकार सुरक्षा को नजरअंदाज कर वोट बैंक बचाने में लगी है।
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चुनावी फायदा भाजपा का अनुमान है कि अप्रैल-मई 2026 में होने वाले विधानसभा चुनाव से ठीक पहले यह बजट इसलिए बढ़ाया गया है ताकि मुस्लिम वोटर टीएमसी के साथ बने रहें।
West Bengal News: टीएमसी का जवाब और बचाव
टीएमसी नेताओं ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है:
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मदरसा शिक्षा अल्पसंख्यक समुदाय की जरूरत है।
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संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यकों को अपनी शिक्षा व्यवस्था चलाने का अधिकार है।
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बजट बढ़ाना तुष्टिकरण नहीं, बल्कि समावेशी विकास का हिस्सा है।
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पिछले 15 साल में मदरसों में नामांकन और सुविधाएं बढ़ी हैं, इसलिए बजट बढ़ाना स्वाभाविक है।
टीएमसी का यह भी कहना है कि भाजपा हर अल्पसंख्यक कल्याण को तुष्टिकरण का नाम दे देती है।
राजनीतिक पृष्ठभूमि और वोट बैंक का खेल
पश्चिम बंगाल में मुस्लिम मतदाता करीब 30 प्रतिशत हैं। 2021 के विधानसभा चुनाव में टीएमसी को इन वोटों का भारी समर्थन मिला था। उस समय वाम दल और कांग्रेस ने कमजोर प्रदर्शन किया, जिससे मुस्लिम वोट एकतरफा टीएमसी की ओर चले गए। टीएमसी को 48 प्रतिशत वोट मिले, जबकि भाजपा को 38 प्रतिशत।
लेकिन अब स्थिति बदल रही है:
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हुमायूं कबीर (टीएमसी के पूर्व सहयोगी) सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं।
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असदुद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम भी बंगाल में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
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ओवैसी को बिहार चुनाव में मिली सफलता के बाद बंगाल में भी उम्मीदें हैं।
भाजपा का अनुमान है कि अगर हुमायूं कबीर और ओवैसी मिलकर टीएमसी के 8-10 प्रतिशत वोट भी काट लेते हैं, तो चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। इसी डर से ममता बनर्जी आक्रामक रुख अपना रही हैं और मुस्लिम समुदाय को लुभाने के लिए बजट में भारी निवेश कर रही हैं।
West Bengal News: अंतरिम बजट में अन्य लोकलुभावन घोषणाएं
5 फरवरी को पेश अंतरिम बजट में सरकार ने कई ऐसी योजनाएं घोषित कीं जो सीधे वोटरों को लुभाने वाली हैं:
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लक्ष्मी भंडार योजना में महिलाओं को 500 रुपये प्रति महीने अतिरिक्त।
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आशा कार्यकर्ताओं के वेतन में 1000 रुपये मासिक वृद्धि।
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बांग्लार युवा साथी योजना के तहत हर बेरोजगार युवा को 1500 रुपये मासिक।
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मदरसा शिक्षा पर 5713 करोड़ रुपये का प्रावधान।
ये सभी घोषणाएं चुनाव से ठीक पहले की गई हैं, जिससे तुष्टिकरण का आरोप और मजबूत हो रहा है।
क्या कहते हैं विश्लेषक?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी की यह रणनीति मुस्लिम वोटों को बांधे रखने की है। पिछले चुनाव में यह वोट बैंक टीएमसी के लिए गेम-चेंजर साबित हुआ था। लेकिन अब विपक्षी ताकतें (हुमायूं कबीर, ओवैसी, भाजपा) इस वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रही हैं।
वहीं कुछ विश्लेषक यह भी कहते हैं कि मदरसा शिक्षा में निवेश जरूरी है क्योंकि राज्य में मदरसों में पढ़ने वाले बच्चे ज्यादा हैं। लेकिन इतनी भारी वृद्धि पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
West Bengal News: आगे क्या होगा?
यह मुद्दा अब बंगाल की सियासत का बड़ा केंद्र बन चुका है। आने वाले विधानसभा चुनाव में तुष्टिकरण बनाम समावेशी विकास की बहस तेज होगी। भाजपा इसे अपने अभियान का मुख्य हथियार बनाएगी, जबकि टीएमसी इसे अल्पसंख्यक कल्याण से जोड़ेगी।
मदरसा बजट की 12 गुना वृद्धि अब सिर्फ आंकड़ा नहीं रही, बल्कि राजनीतिक युद्ध का सबसे बड़ा मुद्दा बन गई है। चुनाव नजदीक आते ही यह बहस और गरमाएगी।
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