US-Iran War: मिडिल ईस्ट युद्ध का असर मुंबई के फ्रूट मार्केट पर, ईरान-इजरायल जंग से APMC वाशी मंडी में फलों का अंबार, व्यापारियों और किसानों का भारी नुकसान, सरकार से राहत की गुहार
ईरान-इजरायल युद्ध से वाशी APMC में फलों का अंबार, तरबूज ₹8-10 और अंगूर ₹500-600 तक गिरा भाव।
US-Iran War: मिडिल ईस्ट में जारी ईरान-इजरायल-अमेरिका युद्ध का असर अब सीधे भारत के फल बाजार तक पहुंच गया है। एशिया की सबसे बड़ी फल मंडियों में से एक मुंबई के पास स्थित APMC फ्रूट मार्केट वाशी में हालात बेहद खराब हैं। खाड़ी देशों को फलों का निर्यात लगभग ठप पड़ने से मंडी में माल का अंबार लग गया है। तरबूज जो पहले ₹30-35 प्रति किलो बिकता था वह अब सिर्फ ₹8-10 प्रति किलो पर आ गया है। व्यापारियों के आंसू निकल रहे हैं और किसानों की लागत भी नहीं निकल पा रही। सरकार से तत्काल राहत की मांग उठ रही है।
US-Iran War और भारत का फल निर्यात कैसे जुड़े हैं
मिडिल ईस्ट यानी खाड़ी देश भारत के फल निर्यात के सबसे बड़े बाजारों में से एक हैं। UAE, सऊदी अरब, कुवैत, कतर और बहरीन में रहने वाले करोड़ों प्रवासी भारतीय और स्थानीय लोग भारतीय फलों के शौकीन हैं।
रमजान के महीने में तो खाड़ी देशों में भारतीय फलों की मांग कई गुना बढ़ जाती है। इफ्तार और सहरी में फल एक अहम हिस्सा होते हैं। तरबूज, पपीता, खरबूजा और अंगूर खासतौर पर बड़ी मात्रा में मंगाए जाते हैं।
लेकिन ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद हो गई है जो दुनिया के लगभग 20 प्रतिशत तेल और गैस की आपूर्ति का रास्ता है। इसी रास्ते से खाड़ी देशों को जाने वाले जहाज भी गुजरते हैं। जहाजों की आवाजाही बाधित होने से भारत से खाड़ी देशों को होने वाला फलों का निर्यात लगभग ठप पड़ गया है।
APMC वाशी मंडी में फलों के दाम कितने गिरे
मुंबई के पास नवी मुंबई में स्थित APMC फ्रूट मार्केट वाशी एशिया की सबसे बड़ी फल मंडियों में से एक है। यहां देशभर से फल आते हैं और यहीं से खाड़ी देशों को निर्यात भी होता है।
| फल | पहले का भाव | अभी का भाव | गिरावट |
|---|---|---|---|
| तरबूज | ₹30-35 प्रति किलो | ₹8-10 प्रति किलो | 70% से अधिक |
| पपीता | ₹30-35 प्रति किलो | ₹20-25 प्रति किलो | 30% |
| अंगूर (9 किलो कैरेट) | ₹1,500-1,600 | ₹500-600 | 65% से अधिक |
| खरबूजा | ₹25-30 प्रति किलो | ₹10-15 प्रति किलो | 50% |
यह गिरावट इतनी तेज और बड़ी है कि व्यापारियों की लागत भी नहीं निकल पा रही। कई व्यापारी तो अपना माल घाटे में बेचने को मजबूर हैं क्योंकि फल सड़ने से पहले बेचना जरूरी है।
मंडी में माल का अंबार क्यों लगा?
पहले APMC वाशी मंडी में रोजाना करीब 2000 टन फल आते थे। इसमें से बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों को निर्यात हो जाता था।
लेकिन मिडिल ईस्ट युद्ध की वजह से निर्यात बंद होने के बाद अब वही फल जो विदेशों में भेजे जाने थे वह स्थानीय बाजार में आ रहे हैं। मंडी में आवक पहले से भी ज्यादा हो गई है जबकि स्थानीय मांग सीमित है।
नतीजा यह है कि मंडी में हर जगह फलों के ढेर लगे हैं। मांग कम होने के कारण कई बार फल बिक नहीं पाते और खराब होने लगते हैं। मंडी में कई जगह सड़े हुए फलों के ढेर भी दिखाई दे रहे हैं जिन्हें व्यापारियों को मजबूरी में फेंकना पड़ रहा है। यह न सिर्फ आर्थिक नुकसान है बल्कि खाद्य पदार्थों की भारी बर्बादी भी है।
किसानों पर क्या पड़ रहा है असर?
मिडिल ईस्ट युद्ध का सबसे ज्यादा नुकसान उन किसानों को हो रहा है जिन्होंने निर्यात के लिए फलों की खेती की थी।
महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के किसान बड़े पैमाने पर खाड़ी देशों के लिए तरबूज, अंगूर और पपीता उगाते हैं। इन फलों की खेती में बड़ी पूंजी लगती है।
बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई और मजदूरी का खर्च जोड़ने के बाद किसान को तरबूज पर कम से कम ₹15-18 प्रति किलो की लागत आती है। लेकिन अभी मंडी में ₹8-10 प्रति किलो का भाव मिल रहा है जो लागत से भी कम है।
इसका मतलब है कि किसान हर किलो पर घाटा उठा रहे हैं। जो किसान लोन लेकर फसल उगाते हैं उनके लिए यह स्थिति और भी भयावह है।
रमजान में खाड़ी देशों की मांग और भारतीय फल
रमजान भारतीय फल निर्यातकों के लिए सबसे अहम सीजन होता है।
| फल | रमजान में खाड़ी देशों की मांग | भारत से सामान्य निर्यात |
|---|---|---|
| तरबूज | बहुत अधिक | महाराष्ट्र, UP से |
| अंगूर | बहुत अधिक | नासिक, कर्नाटक से |
| पपीता | अच्छी मांग | आंध्र, महाराष्ट्र से |
| खरबूजा | अच्छी मांग | राजस्थान, UP से |
| केला | नियमित मांग | महाराष्ट्र, तमिलनाडु से |
इस साल रमजान मार्च में पड़ा है जो आम तौर पर तरबूज और खरबूजे का पीक सीजन होता है। ऐसे में मिडिल ईस्ट युद्ध का असर दोगुना हो गया है क्योंकि यह ठीक उस वक्त आया जब निर्यात सबसे ज्यादा होना चाहिए था।
व्यापारियों की परेशानी और सरकार से मांग
वाशी मंडी के फल व्यापारियों का कहना है कि पिछले कुछ हफ्तों में उन्हें करोड़ों रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है।
व्यापारी मनोहर पाटिल का कहना है कि हमने पहले से ऑर्डर बुक करके किसानों से फल खरीदे थे। अब खाड़ी देशों का निर्यात बंद है तो माल कहां जाए। स्थानीय बाजार में इतना माल खप नहीं सकता और कीमतें इतनी गिर गई हैं कि लागत भी नहीं निकलती।
व्यापारियों और किसानों ने सरकार से कई मांगें की हैं। पहली मांग है कि निर्यात के लिए वैकल्पिक रास्ते तलाशे जाएं। दूसरी मांग है कि प्रभावित किसानों और व्यापारियों को राहत पैकेज दिया जाए। तीसरी मांग है कि फलों की खरीद के लिए सरकारी एजेंसियां सामने आएं और नुकसान की भरपाई की जाए।
केंद्र सरकार ने हाल ही में घोषणा की है कि वह मिडिल ईस्ट युद्ध से प्रभावित निर्यातकों की मदद के लिए बीमा सहायता उपलब्ध कराएगी। लेकिन व्यापारियों का कहना है कि यह काफी नहीं है और तत्काल राहत की जरूरत है।
US-Iran War का भारतीय कृषि पर व्यापक असर
| क्षेत्र | असर |
|---|---|
| फल निर्यात | लगभग ठप, कीमतें धराशायी |
| ड्राई फ्रूट्स | आयात महंगा, कीमतें बढ़ीं |
| कच्चा तेल | महंगा, परिवहन लागत बढ़ी |
| LPG आपूर्ति | प्रभावित, होर्मुज से गुजरता था |
| खाद आयात | महंगा, यूरिया-DAP दाम बढ़े |
| फूड इन्फ्लेशन | बढ़ने का खतरा |
US-Iran War का असर सिर्फ फल निर्यात तक सीमित नहीं है। इसने भारतीय कृषि और खाद्य आपूर्ति श्रृंखला के कई हिस्सों को प्रभावित किया है।
उपभोक्ताओं को फायदा लेकिन किसानों का नुकसान
इस पूरे संकट में एक विरोधाभासी स्थिति यह है कि मंडी में फलों की कीमतें गिरने से आम उपभोक्ताओं को सस्ते फल मिल रहे हैं। बाजार में तरबूज अभी ₹10-15 प्रति किलो और अंगूर ₹80-100 प्रति किलो के भाव पर उपलब्ध है।
लेकिन यह स्थिति टिकाऊ नहीं है। अगर किसानों को लगातार घाटा होता रहा तो वे अगले साल इन फसलों की खेती कम कर देंगे। इससे आने वाले सीजन में फलों की कमी और कीमतों में उछाल आ सकता है।
कृषि अर्थशास्त्री डॉ. विक्रम देशमुख का कहना है कि मिडिल ईस्ट युद्ध का यह असर सिर्फ इस सीजन तक नहीं रहेगा। अगर निर्यात जल्द बहाल नहीं हुआ तो कई किसान फलों की खेती छोड़ देंगे और दीर्घकालिक रूप से भारत की फल निर्यात क्षमता को नुकसान पहुंचेगा। सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए।
वैकल्पिक बाजार की तलाश जरूरी
भारतीय फल निर्यातकों को अब नए बाजारों की तरफ देखना होगा।
यूरोप और अमेरिका में भारतीय आम, अंगूर और पपीता की मांग है लेकिन वहां गुणवत्ता मानक बहुत सख्त हैं। दक्षिण पूर्व एशिया यानी थाईलैंड, वियतनाम और मलेशिया में भारतीय फलों की मांग बढ़ रही है। चीन का बाजार भी एक विकल्प हो सकता है लेकिन वहां नियामक बाधाएं हैं।
घरेलू स्तर पर प्रोसेसिंग उद्योग यानी जूस, जैम और कैनिंग फैक्ट्रियों को अतिरिक्त माल खरीदने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है। इससे बर्बादी रुकेगी और किसानों को थोड़ी कीमत मिलेगी।
US-Iran War: निष्कर्ष
मिडिल ईस्ट युद्ध का यह असर बताता है कि वैश्विक संघर्ष का सीधा असर भारत के छोटे किसानों और व्यापारियों तक कैसे पहुंचता है। वाशी की APMC मंडी में तरबूज का ₹8-10 और अंगूर के कैरेट का ₹500-600 पर बिकना एक व्यापक आर्थिक संकट की तस्वीर पेश करता है। सरकार को तत्काल वैकल्पिक निर्यात रूट तलाशने, राहत पैकेज देने और घरेलू प्रोसेसिंग को बढ़ावा देने की जरूरत है ताकि किसानों और व्यापारियों को इस संकट से बाहर निकाला जा सके।
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