AI कंटेंट पर सरकार का बड़ा फैसला, डीपफेक वीडियो हटाने के लिए अब सिर्फ 3 घंटे, नए नियम लागू
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स की जवाबदेही तय, उल्लंघन पर भारी जुर्माना और कानूनी कार्रवाई का प्रावधान
Update on AI: डिजिटल युग में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बढ़ती शक्ति के साथ-साथ इसके दुरुपयोग के मामले भी तेजी से बढ़ रहे हैं। डीपफेक वीडियो, फर्जी आवाज और झूठी तस्वीरें आम लोगों की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा रही हैं और सामाजिक अशांति फैला रही हैं। इन बढ़ते खतरों को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक ऐतिहासिक कदम उठाया है। सरकार ने हाल ही में एक नया नोटिफिकेशन जारी किया है जिसके तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को डीपफेक और AI से बनाए गए फर्जी कंटेंट को केवल तीन घंटे के अंदर हटाना अनिवार्य हो गया है। यह निर्देश सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम 2000 के तहत जारी किया गया है और इसका उल्लंघन करने पर सख्त कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है। यह कदम भारत को डिजिटल सुरक्षा के मामले में दुनिया के सबसे सख्त नियम वाले देशों में शामिल कर देता है।
Update on AI: डीपफेक की बढ़ती समस्या
पिछले कुछ वर्षों में डीपफेक तकनीक का दुरुपयोग चिंताजनक स्तर तक पहुंच गया है। इस तकनीक के माध्यम से किसी भी व्यक्ति का चेहरा किसी अन्य वीडियो में लगाया जा सकता है, उसकी आवाज की नकल की जा सकती है और ऐसे वीडियो बनाए जा सकते हैं जो पूरी तरह असली लगते हैं।
भारत में कई प्रमुख हस्तियां इसका शिकार हो चुकी हैं। अभिनेत्रियों के फर्जी वीडियो बनाकर उनकी छवि खराब करने की कोशिशें हुई हैं। राजनीतिक नेताओं के नाम पर फर्जी बयान वाले वीडियो वायरल किए गए हैं। आम नागरिकों को भी ठगने के लिए डीपफेक का उपयोग हो रहा है।
सबसे खतरनाक बात यह है कि ये वीडियो इतने वास्तविक दिखते हैं कि आम व्यक्ति के लिए असली और नकली में फर्क करना मुश्किल हो जाता है। इससे गलत सूचना तेजी से फैलती है और समाज में अफवाहें और भ्रम पैदा होता है।
वित्तीय धोखाधड़ी में भी डीपफेक का उपयोग बढ़ा है। लोगों के परिचितों की आवाज की नकल करके पैसे मांगने के मामले सामने आए हैं। कंपनियों के सीईओ की नकली आवाज में कर्मचारियों को गलत निर्देश देने की घटनाएं हुई हैं।
नए नियमों की मुख्य बातें
केंद्र सरकार द्वारा जारी नए नोटिफिकेशन में कई महत्वपूर्ण प्रावधान किए गए हैं। सबसे महत्वपूर्ण नियम यह है कि जैसे ही किसी प्लेटफॉर्म को डीपफेक या AI-जनित फर्जी कंटेंट की शिकायत मिलती है, उसे तीन घंटे के भीतर उस कंटेंट को हटाना अनिवार्य है।
यह समय सीमा बेहद कड़ी है और यह दर्शाती है कि सरकार इस मुद्दे को कितनी गंभीरता से ले रही है। तीन घंटे की समय सीमा इसलिए रखी गई है क्योंकि सोशल मीडिया पर कंटेंट कुछ ही घंटों में वायरल हो जाता है और लाखों लोगों तक पहुंच जाता है।
प्लेटफॉर्म्स को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वे AI-जनित कंटेंट की पहचान करने के लिए उन्नत तकनीक का उपयोग करें। उन्हें ऐसे सिस्टम विकसित करने होंगे जो स्वचालित रूप से संदिग्ध कंटेंट का पता लगा सकें।
सभी सोशल मीडिया कंपनियों को भारत में अपना ग्रीवांस ऑफिसर नियुक्त करना अनिवार्य है जो शिकायतों का समाधान करेगा। यह अधिकारी भारतीय कानूनों के तहत जवाबदेह होगा।
Update on AI: AI कंटेंट की लेबलिंग अनिवार्य
नए नियमों के तहत AI से बनाए गए सभी कंटेंट को स्पष्ट रूप से लेबल करना अनिवार्य किया गया है। यदि कोई वीडियो, तस्वीर या ऑडियो AI की मदद से बनाया गया है, तो उस पर साफ तौर पर यह जानकारी देनी होगी।
यह प्रावधान बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे दर्शकों को यह जानने में मदद मिलेगी कि वे जो देख रहे हैं वह वास्तविक है या कृत्रिम रूप से निर्मित। यह पारदर्शिता लोगों को सूचित निर्णय लेने में सक्षम बनाएगी।
लेबलिंग दृश्य रूप से स्पष्ट होनी चाहिए। छोटे अक्षरों में कहीं कोने में छिपा हुआ डिस्क्लेमर पर्याप्त नहीं होगा। कंटेंट की शुरुआत में या प्रमुख स्थान पर यह जानकारी दिखनी चाहिए।
शैक्षणिक, कला या मनोरंजन उद्देश्यों के लिए बनाए गए AI कंटेंट में भी लेबलिंग आवश्यक होगी, ताकि कोई भ्रम न हो।
कंटेंट क्रिएटर्स की जिम्मेदारी
केवल प्लेटफॉर्म्स ही नहीं, बल्कि कंटेंट बनाने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं की भी जवाबदेही तय की गई है। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर किसी की छवि खराब करने या गलत सूचना फैलाने के उद्देश्य से डीपफेक बनाता है, तो उसके खिलाफ सीधे कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
इसमें आपराधिक मामला दर्ज करना, भारी जुर्माना लगाना और यहां तक कि जेल की सजा भी शामिल हो सकती है। यदि डीपफेक के कारण किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचता है, तो पीड़ित व्यक्ति मानहानि का मुकदमा भी दायर कर सकता है।
विज्ञापनदाताओं और ब्रांड्स को भी सावधान रहना होगा। यदि वे AI-जनित कंटेंट का उपयोग कर रहे हैं, तो उन्हें स्पष्ट रूप से इसका खुलासा करना होगा।
Update on AI: प्लेटफॉर्म्स की प्रतिक्रिया
नए नियमों के जवाब में बड़े सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने अपनी तकनीक और नीतियों में बदलाव करना शुरू कर दिया है। उन्हें अब विशेष टीमें बनानी होंगी जो चौबीसों घंटे शिकायतों की निगरानी करें।
कई प्लेटफॉर्म्स ने पहले से ही AI-आधारित डिटेक्शन सिस्टम विकसित करना शुरू कर दिया है जो स्वचालित रूप से डीपफेक कंटेंट की पहचान कर सकते हैं। हालांकि, तीन घंटे की समय सीमा को पूरा करना एक बड़ी चुनौती है।
कुछ प्लेटफॉर्म्स ने चिंता व्यक्त की है कि इतनी कड़ी समय सीमा में कभी-कभी वैध कंटेंट भी गलती से हटाया जा सकता है। लेकिन सरकार का रुख स्पष्ट है कि सुरक्षा प्राथमिकता है।
अंतरराष्ट्रीय तुलना
भारत का यह कदम वैश्विक स्तर पर सबसे सख्त नियमों में से एक है। यूरोपीय संघ ने भी AI एक्ट पारित किया है, लेकिन वहां समय सीमा इतनी कड़ी नहीं है। अमेरिका में अभी तक संघीय स्तर पर कोई व्यापक कानून नहीं है, हालांकि कुछ राज्यों ने अपने नियम बनाए हैं।
चीन ने भी डीपफेक पर सख्त नियम लागू किए हैं, लेकिन वहां फोकस मुख्य रूप से राजनीतिक कंटेंट पर है। भारत का दृष्टिकोण अधिक व्यापक है और सभी प्रकार के फर्जी कंटेंट को कवर करता है।
Update on AI: चुनौतियां और समाधान
इन नियमों को लागू करने में कई चुनौतियां हैं। पहली चुनौती है तकनीकी क्षमता। हर दिन करोड़ों कंटेंट अपलोड होते हैं और उनमें से डीपफेक की पहचान करना आसान नहीं है।
दूसरी चुनौती है मानव संसाधन। तीन घंटे में निर्णय लेने के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित स्टाफ की आवश्यकता होगी।
तीसरी चुनौती है वैध कंटेंट को गलती से न हटाना। कभी-कभी व्यंग्य, पैरोडी या कलात्मक काम को भी फर्जी समझा जा सकता है।
इन चुनौतियों के समाधान के लिए सरकार और प्लेटफॉर्म्स को मिलकर काम करना होगा। बेहतर AI टूल्स, स्पष्ट दिशानिर्देश और नियमित प्रशिक्षण आवश्यक होंगे।
आम नागरिकों के लिए सुझाव
नए नियम लागू होने के बावजूद, आम नागरिकों को भी सतर्क रहना चाहिए। किसी भी वायरल वीडियो या तस्वीर को तुरंत सच मान लेने से पहले उसकी प्रामाणिकता जांचनी चाहिए।
यदि कोई कंटेंट संदिग्ध लगे, तो उसे शेयर करने से पहले फैक्ट-चेक करें। विश्वसनीय समाचार स्रोतों पर भरोसा करें।
यदि आप खुद डीपफेक का शिकार हों, तो तुरंत संबंधित प्लेटफॉर्म पर शिकायत दर्ज करें और साइबर क्राइम सेल से संपर्क करें।
Update on AI: निष्कर्ष
सरकार का यह कदम डिजिटल सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति है। तीन घंटे की समय सीमा भले ही चुनौतीपूर्ण हो, लेकिन यह दर्शाती है कि सरकार इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है। अब देखना यह है कि इन नियमों का क्रियान्वयन कितना प्रभावी होता है और क्या ये वास्तव में डीपफेक की समस्या पर नियंत्रण कर पाते हैं। निश्चित रूप से यह एक सही दिशा में उठाया गया कदम है जो भारत को डिजिटल युग में सुरक्षित बनाने में मदद करेगा।
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