ट्रंप का ईरान पर फिर सैन्य हमले का विकल्प खुला, इस्लामाबाद वार्ता विफल होने के बाद अमेरिका ने बढ़ाया दबाव, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी और हवाई हमलों की तैयारी, मध्य पूर्व में नया तनाव, भारत पर भी असर टाइटल
इस्लामाबाद शांति वार्ता विफल: ट्रंप ने ईरान पर फिर सैन्य हमले का विकल्प खोला, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज नाकेबंदी और हवाई हमलों की तैयारी, अमेरिकी सेना हाई अलर्ट पर
Trump Iran tension: पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में हुई अमेरिका-ईरान शांति वार्ता के विफल होने के बाद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनके वरिष्ठ सलाहकार ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई फिर शुरू करने तथा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की नाकेबंदी के विकल्पों पर गंभीर मंथन कर रहे हैं। वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक रिपोर्ट में यह दावा किया गया है कि अमेरिकी सेना को हाई अलर्ट पर रखा गया है और किसी भी समय ईरान के रणनीतिक ठिकानों पर हवाई हमले हो सकते हैं।
Trump Iran tension: वार्ता टूटी तो फिर खुला युद्ध का दरवाजा
इस्लामाबाद में दोनों देशों के बीच हुई कूटनीतिक बातचीत बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई। वार्ता के विफल होने के महज कुछ घंटों के भीतर ट्रंप ने फ्लोरिडा के डोरल स्थित अपने आवास पर सलाहकारों के साथ आपात बैठक की और आगे की रणनीति पर विचार-विमर्श किया। सूत्रों के अनुसार इस बैठक में ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हवाई हमले फिर शुरू करने का विकल्प प्रमुखता से उठाया गया। साथ ही फारस की खाड़ी के सबसे संवेदनशील जलमार्ग स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद करने की संभावना भी चर्चा में रही।
Trump Iran tension: स्ट्रेट ऑफ होर्मुज क्यों है इतना अहम
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया का सबसे व्यस्त तेल परिवहन मार्ग है। इस जलडमरूमध्य से होकर वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा गुजरता है। यदि इस मार्ग को अवरुद्ध किया जाता है तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें रातोंरात आसमान छू सकती हैं। भारत सहित एशिया के तमाम देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इसी मार्ग पर निर्भर हैं।
Trump Iran tension: पिछले 40 दिनों में क्या हुआ
अमेरिका ने पिछले करीब 40 दिनों में ईरान के विरुद्ध एक सीमित किंतु व्यापक सैन्य अभियान चलाया था। इस अभियान में ईरान के कई परमाणु संयंत्रों और सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया गया था। उसके बाद दोनों पक्षों ने वार्ता की मेज पर आने का फैसला किया और इस्लामाबाद को तटस्थ स्थान के रूप में चुना गया। किंतु इस वार्ता में कोई ठोस सहमति नहीं बन सकी और बातचीत बेनतीजा रही।
Trump Iran tension: ट्रंप का रुख और फॉक्स न्यूज इंटरव्यू
रविवार को ट्रंप ने एक प्रमुख अमेरिकी टेलीविजन चैनल को इंटरव्यू दिया जिसमें उन्होंने ईरान पर दबाव बनाए रखने के अपने इरादे को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि परमाणु समझौते के बिना कोई भी विकल्प मेज पर मौजूद है। अमेरिकी विदेश नीति विशेषज्ञों के अनुसार ट्रंप प्रशासन अब ईरान को एक ऐसे बिंदु पर लाना चाहता है जहां उसके पास समझौते के अलावा कोई रास्ता न बचे। यह कूटनीति और बल प्रयोग का मिला-जुला दबाव रणनीति है।
Trump Iran tension: अमेरिकी सेना हाई अलर्ट पर
रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी वायु सेना और नौसेना को मध्य पूर्व क्षेत्र में तैनात रखा गया है। खाड़ी में अमेरिकी युद्धपोतों की संख्या में हाल के हफ्तों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। सैन्य सूत्रों के हवाले से बताया गया है कि किसी भी आदेश पर कुछ ही घंटों के भीतर हमले शुरू करने की क्षमता तैयार रखी गई है। यह स्थिति पूरे मध्य पूर्व क्षेत्र में एक नई अनिश्चितता पैदा कर रही है।
Trump Iran tension: ईरान की प्रतिक्रिया और क्षेत्रीय तनाव
ईरान ने अब तक इस रिपोर्ट पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। हालांकि तेहरान के सरकारी मीडिया ने संकेत दिया है कि ईरान किसी भी हमले का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए तैयार है। क्षेत्रीय विश्लेषकों का मानना है कि इस्लामाबाद वार्ता की विफलता ने मध्य पूर्व में एक नए संघर्ष की आशंका को जीवित कर दिया है। इजरायल, सऊदी अरब और खाड़ी देश भी इस घटनाक्रम पर बारीकी से नजर रख रहे हैं।
Trump Iran tension: भारत पर क्या पड़ेगा असर
भारत अपनी कुल तेल आयात का एक बड़ा हिस्सा ईरान और खाड़ी देशों से प्राप्त करता है। यदि होर्मुज की नाकेबंदी होती है या इस क्षेत्र में युद्ध फिर भड़कता है तो भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर सीधा असर पड़ सकता है। इसके अलावा भारत के उन लाखों प्रवासी श्रमिकों की सुरक्षा भी चिंता का विषय बन सकती है जो खाड़ी देशों में कार्यरत हैं। विदेश मंत्रालय स्थिति पर निगरानी रख रहा है।
निष्कर्ष
इस्लामाबाद वार्ता की विफलता ने अमेरिका और ईरान के बीच के संबंधों को एक नए और खतरनाक मोड़ पर ला खड़ा किया है। ट्रंप प्रशासन का दबाव बढ़ाने का रुख और अमेरिकी सेना का हाई अलर्ट पर रहना स्पष्ट संकेत देता है कि यह संकट अभी टला नहीं है। अगले कुछ दिनों में जो भी फैसला होगा उसका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर महसूस किया जाएगा।
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