ऋतिक और ऐश्वर्या की इस फिल्म ने पहले ही दिखा दिया था हरीश राणा का दर्द, क्लाइमेक्स देख रो पड़े थे लोग
13 साल से कोमा में पड़े युवक पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला, फिल्म ‘गुजारिश’ फिर चर्चा में
Harish Rana story: हरीश राणा का नाम इन दिनों पूरे देश में चर्चा का विषय बना हुआ है। सुप्रीम कोर्ट ने 13 साल से कोमा में पड़े हरीश के लाइफ सपोर्ट सिस्टम को हटाने की अनुमति दे दी है। यह फैसला जितना कानूनी है उतना ही भावनात्मक भी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि बॉलीवुड ने इस दर्द को करीब 16 साल पहले ही बड़े पर्दे पर उतार दिया था? संजय लीला भंसाली की फिल्म गुजारिश ने इच्छामृत्यु जैसे संवेदनशील विषय को इतनी खूबसूरती से पेश किया था कि दर्शक सिनेमाघरों में ही रो पड़े थे।
Harish Rana story: हरीश राणा की दर्दनाक कहानी
गाजियाबाद के रहने वाले हरीश राणा एक होनहार युवक थे जो चंडीगढ़ में बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। अगस्त 2013 में वह अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए। इस हादसे में उनके सिर पर इतनी गहरी चोट आई कि वह वेजिटेटिव स्टेट में चले गए। यानी शरीर तो जीवित रहा लेकिन दिमाग ने काम करना बंद कर दिया। हरीश को जिम जाने का शौक था, प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते थे और जिंदगी से भरपूर एक युवक थे। उस एक हादसे ने उनके सारे सपनों को पल भर में खाक कर दिया। उनके माता-पिता ने 13 साल तक अपने बेटे को बेबस और लाचार देखा। हर रोज उम्मीद की किरण लेकर उठे और हर रात निराशा लेकर सोए। जब सारे इलाज और तमाम दुआएं बेअसर हो गईं तो थके हुए माता-पिता ने वह कदम उठाया जो शायद दुनिया का सबसे कठिन फैसला था। उन्होंने अपने ही बेटे के लिए सुप्रीम कोर्ट से इच्छामृत्यु की मांग की।
Harish Rana story: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में बेहद संवेदनशीलता के साथ फैसला सुनाया। कोर्ट ने एम्स दिल्ली को निर्देश दिया कि हरीश का लाइफ सपोर्ट सिस्टम अत्यंत सावधानी और योजनाबद्ध तरीके से हटाया जाए। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस पूरी प्रक्रिया में मरीज की गरिमा और सम्मान का पूरा ध्यान रखा जाना चाहिए। यह फैसला भारतीय न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण मोड़ है क्योंकि इच्छामृत्यु को लेकर देश में लंबे समय से बहस चलती रही है। यह वही दर्द है जिसे संजय लीला भंसाली ने 2010 में अपनी फिल्म गुजारिश के जरिए दुनिया के सामने रखा था।
Harish Rana story: गुजारिश की कहानी जो आज भी रुलाती है
साल 2010 में आई गुजारिश एक ऐसी फिल्म थी जिसे देखकर पत्थर दिल इंसान भी रो पड़े। फिल्म में ऋतिक रोशन ने ईथन मस्करेन्हा का किरदार निभाया था। ईथन एक प्रतिभाशाली जादूगर था जो एक हादसे के बाद पूरी तरह लकवाग्रस्त हो गया। 14 साल तक बिस्तर पर पड़े रहने के बाद उसने तय किया कि अब और नहीं। उसने कोर्ट में अपनी जान खत्म करने की इजाजत मांगी। फिल्म में ऐश्वर्या राय बच्चन ने सोफिया का किरदार निभाया था जो ईथन की देखभाल करने वाली नर्स थी और उससे प्रेम भी करती थी। सोफिया एक ओर ईथन से प्यार करती है और दूसरी ओर उसे जीते देखना चाहती है, लेकिन ईथन की तकलीफ उसे तोड़ देती है। आखिरकार जब कोर्ट ईथन को इजाजत दे देती है तो वह एक विदाई पार्टी रखता है और सोफिया की मदद से अपनी आखिरी सांस लेता है।
Harish Rana story: भंसाली ने क्यों बनाई यह फिल्म
संजय लीला भंसाली ने बाद में खुलासा किया था कि उन्होंने यह फिल्म किसी करीबी की पीड़ा को देखकर बनाई थी। वह कहते हैं कि जब आप अपने किसी प्रिय को असहनीय दर्द में तड़पते देखते हैं और कुछ नहीं कर पाते तो उस बेबसी को शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। गुजारिश उसी बेबसी की फिल्मी अभिव्यक्ति थी। भंसाली की खूबी यह रही कि उन्होंने इस विषय को न तो अत्यधिक नाटकीय बनाया और न ही इसे बहुत हल्के ढंग से प्रस्तुत किया। फिल्म में हर दृश्य इतना वास्तविक लगता था कि दर्शक खुद को उस स्थिति में महसूस करने लगते थे।
Harish Rana story: फिल्म को लेकर हुआ था जबरदस्त विवाद
जब गुजारिश रिलीज हुई तो यह सिर्फ एक फिल्म नहीं बल्कि एक सामाजिक बहस बन गई। एक वकील ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर फिल्म का विरोध किया। उनका तर्क था कि भारत में इच्छामृत्यु कानूनी नहीं है और ऐसी फिल्म समाज में गलत संदेश भेज सकती है। धार्मिक संगठनों ने भी फिल्म का विरोध किया क्योंकि उनका मानना था कि जीवन और मृत्यु का फैसला ईश्वर पर छोड़ना चाहिए। हालांकि बॉक्स ऑफिस पर यह फिल्म उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाई लेकिन इसने एक जरूरी सवाल देश के सामने रख दिया था। क्या किसी ऐसे इंसान को जीने के लिए मजबूर करना सही है जो खुद जीना नहीं चाहता और जिसके जीवन में सिर्फ पीड़ा बची हो?
Harish Rana story: भारत में इच्छामृत्यु का कानूनी सफर
भारत में इच्छामृत्यु का सवाल दशकों से अदालतों और संसद में उठता रहा है। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी जीवन रक्षक उपकरण हटाने को कुछ विशेष परिस्थितियों में वैध माना था। हरीश राणा के मामले में भी अदालत ने इसी सिद्धांत के आधार पर फैसला सुनाया है। सक्रिय इच्छामृत्यु यानी किसी को जानबूझकर मारने की दवा देना अभी भी भारत में पूरी तरह प्रतिबंधित है। लेकिन जब किसी मरीज के ठीक होने की कोई उम्मीद नहीं बचती और वह केवल मशीनों के सहारे जी रहा हो तो लाइफ सपोर्ट हटाना कानूनी रूप से संभव है।
Harish Rana story: दो कहानियां, एक ही दर्द
हरीश राणा की असली जिंदगी और ईथन मस्करेन्हा की काल्पनिक कहानी में फर्क सिर्फ इतना है कि एक पर्दे पर थी और दूसरी हमारे बीच। दोनों में असहनीय दर्द है, दोनों में परिवार की बेबसी है और दोनों में एक ऐसे इंसान की पीड़ा है जो जी भी नहीं पा रहा और मर भी नहीं पा रहा। गुजारिश ने 2010 में जो सवाल उठाया था आज सुप्रीम कोर्ट ने उस पर अपनी मुहर लगाई है। यह फैसला सिर्फ हरीश राणा के परिवार के लिए नहीं बल्कि उन तमाम परिवारों के लिए एक उम्मीद की किरण है जो ऐसी ही परिस्थितियों में असहाय खड़े हैं। जिंदगी और मौत के बीच फंसे किसी अपने को देखना दुनिया का सबसे बड़ा दर्द है।
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