ईरान-इजरायल युद्ध की आग में झुलस रही दुनिया, सीधे 3 नहीं बल्कि 40 देशों पर मंडरा रहा आर्थिक संकट; तेल, व्यापार और महंगाई से आम लोगों की जेब पर पड़ेगा बड़ा असर
तेल कीमतों में उछाल, व्यापार मार्ग संकट में; भारत समेत कई देशों पर बढ़ेगा महंगाई का दबाव
Global economic crisis: ईरान और इजरायल के बीच जारी युद्ध अब केवल दो देशों की लड़ाई नहीं रही। इस जंग ने पूरी दुनिया की आर्थिक व्यवस्था को हिलाकर रख दिया है। भले ही सीधे तौर पर तीन देश यानी ईरान, इजरायल और अमेरिका इस युद्ध में शामिल हैं, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से दुनिया के करीब 40 बड़े देश इस संघर्ष की जद में आ चुके हैं। इन देशों की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और व्यापारिक संतुलन पर इस युद्ध का गहरा और दीर्घकालिक प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
Global economic crisis: एनर्जी मार्केट में मचा हाहाकार
पश्चिम एशिया दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। ईरान खुद एक प्रमुख तेल निर्यातक देश है और होर्मुज जलडमरूमध्य, जिससे होकर दुनिया की करीब 20 प्रतिशत कच्चे तेल की आपूर्ति गुजरती है, इस युद्ध के कारण खतरे में पड़ गया है। जैसे ही इस क्षेत्र में तनाव बढ़ा, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से उछलने लगीं। इसका असर सीधे उन देशों पर पड़ा जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर हैं। भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी और फ्रांस जैसे देश अपनी ऊर्जा आपूर्ति के लिए पश्चिम एशिया पर बड़े पैमाने पर निर्भर हैं। इन देशों में तेल की कीमतें बढ़ने से महंगाई की दर तेजी से ऊपर जा सकती है, जिससे आम नागरिकों की जेब पर सीधा बोझ पड़ेगा।
Global economic crisis: भारत पर क्या होगा असर
भारत जो दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, इस युद्ध से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले देशों में से एक है। भारत अपनी कुल तेल जरूरत का करीब 85 प्रतिशत आयात करता है, और उसका एक बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया से आता है। यदि तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तो पेट्रोल और डीजल महंगा होगा, जिससे परिवहन लागत बढ़ेगी और रसोई गैस से लेकर रोजमर्रा की जरूरी चीजें तक सब महंगी हो जाएंगी। इसके अलावा भारत का चाबहार बंदरगाह परियोजना, जो ईरान में स्थित है और मध्य एशिया तथा अफगानिस्तान तक व्यापार का रास्ता खोलती है, भी इस संकट में उलझ सकती है। यदि ईरान पर और अधिक अमेरिकी प्रतिबंध लगाए जाते हैं, तो इस परियोजना की रफ्तार थम सकती है।
Global economic crisis: किन 40 देशों पर पड़ेगा असर
विशेषज्ञों के अनुसार इस युद्ध से प्रभावित होने वाले देशों की सूची बहुत लंबी है। एशिया में भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे देश सीधे प्रभावित होंगे। यूरोप में जर्मनी, फ्रांस, इटली, स्पेन और ब्रिटेन की अर्थव्यवस्थाओं पर भी असर पड़ेगा। अफ्रीकी देश जो ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर हैं, वे भी इस संकट से अछूते नहीं रहेंगे। मिस्र, जॉर्डन, लेबनान और तुर्की जैसे देश तो भौगोलिक रूप से इतने करीब हैं कि इनकी अर्थव्यवस्थाओं पर असर पहले से ही दिखने लगा है। खाड़ी देश जैसे सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कुवैत, जो तेल के बड़े निर्यातक हैं, उनके लिए भी यह युद्ध एक बड़ी चुनौती बनकर उभरा है।
Global economic crisis: शिपिंग और व्यापार मार्ग खतरे में
पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव का असर केवल तेल तक सीमित नहीं है। यह क्षेत्र दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों का केंद्र है। लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य से होकर हर साल अरबों डॉलर का माल एक देश से दूसरे देश तक पहुंचता है। युद्ध की स्थिति में शिपिंग कंपनियां इन रास्तों से बचने लगती हैं, जिससे माल ढुलाई की लागत कई गुना बढ़ जाती है। इसका सीधा असर उन देशों पर पड़ता है जो समुद्री व्यापार पर निर्भर हैं। भारत के निर्यातकों और आयातकों को पहले से ही इस संकट की मार झेलनी पड़ रही है।
Global economic crisis: वैश्विक खाद्य संकट की भी आशंका
युद्ध के असर केवल ऊर्जा बाजार तक नहीं रुकते। इस क्षेत्र में उर्वरकों का उत्पादन और आपूर्ति भी होती है। यदि यह आपूर्ति श्रृंखला टूटती है, तो खेती की लागत बढ़ेगी और खाद्य पदार्थों की कीमतें आसमान छू सकती हैं। यह स्थिति विशेष रूप से विकासशील देशों के लिए बेहद खतरनाक साबित हो सकती है, जहां जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा पहले से ही खाद्य असुरक्षा का सामना कर रहा है।
Global economic crisis: दुनिया के शेयर बाजारों में उथलपुथल
जब भी पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ता है, दुनिया के शेयर बाजारों में घबराहट फैल जाती है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हो रहा है। निवेशक सुरक्षित निवेश की तलाश में सोने और डॉलर की तरफ भाग रहे हैं, जिससे विकासशील देशों की मुद्राओं पर दबाव बढ़ गया है। भारतीय रुपया भी इस दबाव से अप्रभावित नहीं रहा है।
आगे क्या होगा
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यदि यह युद्ध और लंबा खिंचा, तो इसके आर्थिक नतीजे और गंभीर होंगे। 2008 की वैश्विक मंदी के बाद से दुनिया की अर्थव्यवस्था पहली बार इतने बड़े भू-राजनीतिक संकट का सामना कर रही है। ऐसे में दुनिया के नेताओं पर यह दबाव है कि वे जल्द से जल्द किसी राजनयिक समाधान की दिशा में काम करें, वरना इस युद्ध की असली कीमत वे करोड़ों आम लोग चुकाएंगे जो न युद्ध चाहते हैं और न ही उनसे कोई पूछता है। यह जंग सिर्फ सैनिकों की नहीं है। यह उन परिवारों की भी जंग है जिनकी रसोई में गैस सिलिंडर की कीमत बढ़ रही है, उन किसानों की भी जिनके खाद महंगे हो रहे हैं, और उन युवाओं की भी जिनके रोजगार पर इस आर्थिक उथलपुथल का साया मंडरा रहा है।
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