रानी लक्ष्मीबाई योजना का सच,- 10 साल में 1690 आवेदन आए, 75% खारिज और सिर्फ 234 पीड़ितों को मिला लाभ; 36 मेडिकल रिपोर्ट अभी तक नहीं हुईं अपलोड
10 साल में 1690 आवेदन, 1266 निरस्त, सिर्फ 234 पीड़ितों को मिला लाभ; 36 मेडिकल रिपोर्ट अब तक नहीं अपलोड
UP News: हिंसा की शिकार महिलाओं और बच्चों को आर्थिक मदद देने के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश सरकार ने 2015 में रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष योजना शुरू की थी। इस योजना के तहत दुष्कर्म, एसिड अटैक, घरेलू हिंसा, दहेज हत्या और POCSO जैसी गंभीर हिंसाओं की पीड़ितों को 3 लाख रुपये से लेकर 10 लाख रुपये तक की आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है। लेकिन गाजियाबाद जिले के आंकड़े इस योजना की जमीनी हकीकत का एक निराशाजनक चित्र पेश करते हैं। बीते 10 वर्षों में जिले में कुल 1690 आवेदन आए लेकिन इनमें से 75 प्रतिशत यानी 1266 आवेदनों को जिला स्तरीय समिति ने निरस्त कर दिया। केवल 234 पीड़ितों या उनके परिजनों के बैंक खाते में ही योजना की राशि पहुंच सकी।
UP News: क्या है रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष योजना?
उत्तर प्रदेश सरकार ने 2015 में यह योजना उन महिलाओं और बच्चों की मदद के लिए शुरू की थी जो विभिन्न प्रकार की हिंसाओं का शिकार बनते हैं। इस योजना का मकसद पीड़ितों को इलाज और पुनर्वास के लिए आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना है। इसमें दुष्कर्म, सामूहिक दुष्कर्म, एसिड अटैक, दहेज हत्या और POCSO अधिनियम के तहत आने वाले मामले शामिल हैं। योजना की एक खास बात यह है कि इसमें आवेदन पीड़ित खुद नहीं बल्कि पुलिस करती है। पुलिस अपनी कार्रवाई पूरी करने के बाद चार्जशीट योजना की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करती है।
UP News: कैसे काम करती है इस योजना की प्रक्रिया?
इस योजना में मदद मिलने की प्रक्रिया कई चरणों से होकर गुजरती है। सबसे पहले महिला या बच्चे के साथ आपराधिक घटना होने पर पुलिस अपनी कार्रवाई पूरी करके चार्जशीट को योजना की आधिकारिक वेबसाइट पर अपलोड करती है। इसके बाद स्वास्थ्य विभाग के नोडल अधिकारी जांच के आधार पर पीड़िता की मेडिकल रिपोर्ट अपलोड करते हैं। फिर सभी मामले जिला संचालन समिति के सामने रखे जाते हैं जहां सत्यापन होता है। समिति की मंजूरी के बाद रिपोर्ट शासन को भेजी जाती है और अंत में पीएफएमएस यानी पब्लिक फाइनेंशियल मैनेजमेंट सिस्टम के जरिए सहायता राशि सीधे पीड़िता के बैंक खाते में भेजी जाती है।
UP News: 10 साल के आंकड़े बोलते हैं अलग ही कहानी
गाजियाबाद जिले में इस योजना के तहत 10 वर्षों में पुलिस ने कुल 1690 मामले दर्ज करके वेबसाइट पर अपलोड किए। इनमें से स्वास्थ्य विभाग ने 1582 मामले आगे फॉरवर्ड किए। लेकिन इसके बाद की स्थिति और भी निराशाजनक है। जिला स्तरीय समिति ने इनमें से 1266 आवेदनों को विभिन्न कारणों से अपात्र पाते हुए निरस्त कर दिया। बाकी में से केवल 234 पीड़ितों को ही योजना का लाभ मिल सका। इसके अलावा 36 मामलों में स्वास्थ्य विभाग ने अभी तक मेडिकल रिपोर्ट शासन की वेबसाइट पर अपलोड ही नहीं की है। जिला स्तरीय समिति के पास 12 आवेदन और नोडल पुलिस अधिकारी के यहां 6 आवेदन अभी लंबित पड़े हैं।
UP News: श्रेणीवार देखें कितनों को मिला न्याय
योजना की विभिन्न श्रेणियों में आए मामलों और उनमें मिले लाभ का विवरण देखें तो तस्वीर और भी स्पष्ट होती है। दहेज हत्या के 72 मामलों में से केवल 41 को लाभ मिला। एसिड अटैक के 28 मामलों में से सिर्फ 9 को सहायता मिली। दुष्कर्म के साथ शारीरिक क्षति के 9 मामलों में से केवल 3 को मदद मिली। सामूहिक दुष्कर्म के 126 मामलों में से 15 को लाभ मिला। POCSO की धारा 4 के 909 मामलों में से 113 को और धारा 6 के 574 मामलों में से 55 को ही योजना का फायदा मिल सका। ये आंकड़े बताते हैं कि POCSO के मामलों में स्थिति सबसे चिंताजनक है जहां सैकड़ों पीड़ित बच्चे आर्थिक मदद से वंचित रह गए।
UP News: योजना के तहत मिलने वाली आर्थिक सहायता
इस योजना में हिंसा की गंभीरता के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में आर्थिक सहायता दी जाती है। दुष्कर्म के साथ मृत्यु या स्थायी अपंगता की स्थिति में 10 लाख रुपये, सामूहिक दुष्कर्म यानी धारा 376-डी के मामले में 7 लाख रुपये, तेजाब हमले के बाद मृत्यु होने पर 10 लाख रुपये, एसिड से 30 प्रतिशत से अधिक जलने पर 5 लाख रुपये, एसिड से 10 से 30 प्रतिशत जलने पर या दो प्रतिशत चेहरा जलने पर 3 लाख रुपये और दहेज हत्या होने पर परिजनों को 3 लाख रुपये की सहायता दी जाती है।
UP News: 75% आवेदन खारिज होने का क्या है कारण?
इतने बड़े पैमाने पर आवेदन खारिज होने के बारे में गाजियाबाद के मुख्य विकास अधिकारी अभिनव गोपाल ने कहा कि जो भी मामले आते हैं उनका जिला स्तरीय समिति की ओर से सत्यापन किया जाता है और उसके बाद उन्हें शासन को भेजा जाता है। जो आवेदन अपात्र पाए जाते हैं उन्हें निरस्त कर दिया जाता है। हालांकि सवाल यह उठता है कि जब आवेदन खुद पुलिस करती है और स्वास्थ्य विभाग मेडिकल रिपोर्ट देता है तो फिर 75 प्रतिशत मामले अपात्र कैसे पाए जाते हैं। यह सवाल इस पूरी व्यवस्था की कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।
महिला सुरक्षा और न्याय के लिए बनाई गई इस योजना का लाभ वास्तव में जरूरतमंद पीड़ितों तक पहुंचे, इसके लिए प्रक्रिया को सरल बनाने और जवाबदेही सुनिश्चित करने की जरूरत है।
read more here