ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता में भारत, ओमान, तुर्की और यूएई की भूमिका सामने आई, जानें पूरा घटनाक्रम

ट्रंप की युद्धविराम घोषणा से पहले भारत, ओमान, तुर्की और यूएई ने मिलकर खोला बैकचैनल संवाद का रास्ता

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Iran US talks: मध्य-पूर्व में जारी युद्ध को रोकने के लिए पर्दे के पीछे से एक बड़ी कूटनीतिक कोशिश चल रही थी। एक वरिष्ठ राजनयिक सूत्र के अनुसार, भारत, ओमान, तुर्की और यूएई ने मिलकर अमेरिका और ईरान के बीच संवाद का रास्ता खोला। ट्रंप की शांति घोषणा से ठीक पहले यह बैकचैनल कूटनीति अपने चरम पर थी।

Iran US talks: ट्रंप की शांति घोषणा से पहले क्या हुआ था पर्दे के पीछे?

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जब ईरान के साथ युद्धविराम की घोषणा की, तो दुनिया को लगा कि यह अचानक लिया गया फैसला है। लेकिन राजनयिक सूत्रों से मिली जानकारी बताती है कि यह कदम हफ्तों की गुप्त कूटनीतिक मेहनत का नतीजा था।

वरिष्ठ राजनयिक सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, ट्रंप की घोषणा से ठीक पहले ओमान और तुर्की के माध्यम से सबसे सक्रिय बैकचैनल वार्ताएं संचालित की गईं। यह पहली बार नहीं है कि ओमान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई हो, इस खाड़ी देश ने 2015 के ईरान परमाणु समझौते में भी इसी तरह की भूमिका अदा की थी।

Iran US talks: भारत और यूएई की भूमिका क्यों है इतनी महत्वपूर्ण?

जो बात इस पूरे घटनाक्रम को खास बनाती है, वह यह है कि संदेश केवल ओमान और तुर्की के जरिए नहीं, बल्कि भारत और संयुक्त अरब अमीरात के माध्यम से भी भेजे जा रहे थे। यह जानकारी अंतरराष्ट्रीय राजनय के जानकारों को चौंकाने वाली है।

भारत परंपरागत रूप से ईरान और अमेरिका दोनों के साथ संतुलित संबंध रखता है। नई दिल्ली ने हमेशा संवाद और कूटनीतिक समाधान का समर्थन किया है। इस बार भारत ने उस संतुलन को व्यावहारिक रूप में इस्तेमाल कर एक जिम्मेदार वैश्विक भूमिका निभाई।

Iran US talks: कौन से चार देश बने शांति के दूत?

इस बैकचैनल कूटनीति में चार देशों की भूमिका सामने आई है। पहला ओमान, जो ऐतिहासिक रूप से ईरान और पश्चिमी देशों के बीच एक विश्वसनीय मध्यस्थ रहा है। दूसरा तुर्की, जो नाटो का सदस्य होने के बावजूद मुस्लिम देशों में अपनी स्वतंत्र विदेश नीति के लिए जाना जाता है।

तीसरा संयुक्त अरब अमीरात, जिसने हाल के वर्षों में इजरायल के साथ अब्राहम समझौते के बाद भी ईरान के साथ व्यापारिक और कूटनीतिक संपर्क बनाए रखे हैं। चौथा भारत, जो ईरान से तेल खरीदता है, अमेरिका का रणनीतिक साझेदार है और मध्य-पूर्व में लाखों भारतीय नागरिकों के हितों की रक्षा में सीधे रूप से जुड़ा है।

Iran US talks: ईरान ने बातचीत के लिए क्यों मानी शर्तें?

23 दिनों से अधिक समय से चले आ रहे इस युद्ध में ईरान को भारी नुकसान उठाना पड़ा। सुप्रीम लीडर समेत कई शीर्ष नेताओं की मौत के बाद देश की राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व संरचना कमजोर पड़ गई। ऐसे में बातचीत का रास्ता खुलना ईरान के लिए भी जरूरी हो गया था।

अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, “जब किसी देश की आंतरिक नेतृत्व संरचना युद्ध से बुरी तरह प्रभावित हो जाती है, तो बैकचैनल कूटनीति ही एकमात्र व्यावहारिक रास्ता बचती है। ऐसे में मध्यस्थ देशों की भूमिका निर्णायक हो जाती है।”

Iran US talks: भारत की कूटनीतिक रणनीति क्या रही इस पूरे मामले में?

भारत की विदेश नीति की एक बुनियादी विशेषता यह रही है कि वह किसी भी गुट का हिस्सा बने बिना सभी पक्षों से संवाद बनाए रखता है। प्रधानमंत्री कार्यालय और विदेश मंत्रालय ने इस संकट के दौरान सार्वजनिक रूप से शांति की अपील की थी।

भारत के लिए यह संकट केवल भूराजनीतिक नहीं था। खाड़ी देशों में करीब 90 लाख से अधिक भारतीय नागरिक काम करते हैं। इनकी सुरक्षा और मध्य-पूर्व से आने वाली ऊर्जा आपूर्ति भारत की आर्थिक स्थिरता के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे में शांति स्थापित करने की कोशिश में भारत की सक्रियता पूरी तरह स्वाभाविक और तर्कसंगत है।

Iran US talks: तुर्की और ओमान की मध्यस्थता में क्या है खास?

ओमान की भूमिका को कूटनीतिक इतिहास में विशेष स्थान प्राप्त है। 2013 में ओमान ने ही अमेरिका और ईरान के बीच गुप्त वार्ता का रास्ता खोला था, जिसने आगे चलकर 2015 के जेसीपीओए परमाणु समझौते की नींव रखी।

तुर्की की स्थिति और भी जटिल है। राष्ट्रपति एर्दोआन ने नाटो और पश्चिमी देशों के साथ मतभेदों के बावजूद ईरान के साथ व्यापार और संवाद बनाए रखे। यही कारण है कि तुर्की को ऐसी संवेदनशील मध्यस्थता के लिए उपयुक्त माना गया।

निष्कर्ष

यह घटनाक्रम दुनिया को यह याद दिलाता है कि असली कूटनीति अक्सर सुर्खियों से दूर, चुपचाप और धैर्य के साथ होती है। भारत, ओमान, तुर्की और यूएई ने मिलकर यह साबित किया कि जब बंदूकें बोल रही हों, तब भी बातचीत का रास्ता बंद नहीं होता।

भारत की यह भूमिका केवल एक कूटनीतिक उपलब्धि नहीं है, यह उस वैश्विक नेतृत्व की झलक है जिसकी दुनिया आज भारत से उम्मीद करती है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह शांति टिकाऊ बन पाती है और क्या मध्य-पूर्व में स्थायी स्थिरता की नींव रखी जा सकती है।

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