डॉलर के सामने कमजोर पड़ा रुपया, 92.37 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंची भारतीय मुद्रा; कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, विदेशी निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक अनिश्चितता से बढ़ा दबाव

कच्चे तेल की कीमतों में उछाल और विदेशी निवेशकों की बिकवाली से रुपये पर बढ़ा दबाव

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INR depreciation 2026: पश्चिम एशिया में जारी जंग की आग अब भारत के मुद्रा बाजार तक पहुंच गई है। शुक्रवार को कारोबार की शुरुआत में ही भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 12 पैसे टूटकर 92.37 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया। भारतीय रिजर्व बैंक के तमाम प्रयासों के बावजूद रुपये की यह गिरावट रुकने का नाम नहीं ले रही। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार उछाल, विदेशी निवेशकों की भारी बिकवाली और वैश्विक बाजार में बढ़ती अनिश्चितता ने मिलकर भारतीय करेंसी को कमजोर कर दिया है।

INR depreciation 2026: किस स्तर पर खुला और कहां पहुंचा रुपया

शुक्रवार को अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में भारतीय रुपये ने 92.33 प्रति डॉलर के स्तर पर कारोबार की शुरुआत की। लेकिन शुरुआती कारोबार में ही यह और नीचे फिसल गया और 92.37 प्रति डॉलर तक जा पहुंचा। यह पिछले कारोबारी दिन के बंद भाव की तुलना में 12 पैसे की गिरावट है। गुरुवार को भी रुपये की स्थिति बेहद खराब रही थी। उस दिन कारोबार के दौरान रुपया 92.36 प्रति डॉलर तक गिरा था और अंत में 24 पैसे की कमजोरी के साथ 92.25 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था। यानी लगातार दो दिनों में रुपये ने 36 पैसे से अधिक का नुकसान झेला है, जो इस बात का संकेत है कि बाजार में दबाव बेहद गहरा हो चुका है।

INR depreciation 2026: क्यों लगातार टूट रहा है रुपया

रुपये की इस कमजोरी के पीछे कई कारण एक साथ काम कर रहे हैं। सबसे बड़ी वजह पश्चिम एशिया में जारी युद्ध है जिसने वैश्विक ऊर्जा बाजार में भारी अनिश्चितता पैदा कर दी है। ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव की वजह से होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल की आपूर्ति बाधित होने का खतरा बना हुआ है। इस जलमार्ग से दुनिया का एक बड़ा हिस्सा तेल आपूर्ति प्राप्त करता है और इसमें किसी भी तरह की रुकावट कच्चे तेल की कीमतों को आसमान पर पहुंचा देती है। भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। जब तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो भारत को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ते हैं।

INR depreciation 2026: विदेशी निवेशकों ने की भारी बिकवाली

रुपये की गिरावट को और तेज करने में विदेशी संस्थागत निवेशकों यानी एफआईआई की भूमिका भी कम नहीं है। शेयर बाजार के आंकड़ों के मुताबिक गुरुवार को विदेशी संस्थागत निवेशकों ने 7 हजार 49 करोड़ 87 लाख रुपये के शेयर बेच डाले। जब विदेशी निवेशक इतने बड़े पैमाने पर बिकवाली करते हैं तो वे रुपयों को डॉलर में बदलकर देश से बाहर ले जाते हैं। इससे बाजार में डॉलर की मांग अचानक बढ़ जाती है और रुपया कमजोर पड़ जाता है। भू राजनीतिक अनिश्चितता के माहौल में विदेशी निवेशक आमतौर पर उभरते बाजारों से पैसा निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी बाजार और डॉलर में लगाना पसंद करते हैं।

INR depreciation 2026: शेयर बाजार पर भी दिखा असर

रुपये की कमजोरी के साथ साथ घरेलू शेयर बाजार में भी गिरावट का माहौल रहा। बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज का सेंसेक्स शुरुआती कारोबार में 560 अंक से अधिक यानी करीब 0.74 प्रतिशत टूटकर 75 हजार 474 के स्तर पर आ गया। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज का निफ्टी 50 भी 184 अंक से अधिक यानी 0.78 प्रतिशत की गिरावट के साथ 23 हजार 454 पर आ गया। बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि जब शेयर बाजार में इस तरह की गिरावट आती है तो इसका असर रुपये पर भी पड़ता है क्योंकि दोनों बाजार एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। शेयर बाजार में बिकवाली का मतलब है विदेशी पूंजी का बाहर जाना।

INR depreciation 2026: कच्चे तेल में जोरदार उछाल

अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत में जबरदस्त उछाल देखने को मिला। यह 4.99 प्रतिशत बढ़कर 96.57 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया। कच्चे तेल की यह बढ़ती कीमत भारत के लिए दोहरी मुसीबत है। एक तरफ महंगे तेल के आयात के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है और दूसरी तरफ इससे देश में महंगाई बढ़ने का खतरा रहता है। विशेषज्ञों के मुताबिक पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बनी हुई है और कच्चे तेल की कीमतों में नरमी के कोई संकेत फिलहाल नजर नहीं आ रहे। जब तक इस क्षेत्र में शांति नहीं होती तब तक कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बना रहेगा।

INR depreciation 2026: आगे क्या होगा रुपये का

बाजार विश्लेषकों का मानना है कि रुपये पर दबाव तब तक बना रहेगा जब तक पश्चिम एशिया में युद्ध की स्थिति सामान्य नहीं होती। भारतीय रिजर्व बैंक बाजार में हस्तक्षेप करके रुपये को संभालने की कोशिश कर रहा है लेकिन वैश्विक कारकों की वजह से इस कोशिश की भी एक सीमा है। अगर कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं और विदेशी निवेशक बिकवाली जारी रखे तो रुपया और नीचे जा सकता है। यह स्थिति आयात को महंगा करेगी और आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ाएगी।

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