तेल, डॉलर और सत्ता का खेल! पेट्रो-डॉलर सिस्टम की वह सच्चाई जिसने दशकों तक दुनिया की राजनीति, युद्ध और अर्थव्यवस्था को प्रभावित किया

कैसे तेल की बिक्री डॉलर में तय होने से अमेरिका को मिली वैश्विक आर्थिक ताकत

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Petrodollar system: एक पुराना मजाक है कि अमेरिका में कभी तख्तापलट क्यों नहीं होता? जवाब है, क्योंकि वहां कोई अमेरिकी दूतावास नहीं है। यह महज हंसी की बात नहीं है, बल्कि इसमें एक कड़वी सच्चाई छुपी है। दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से लेकर आज तक अमेरिका ने दुनिया के दर्जनों देशों में सरकारें गिराई हैं, युद्ध थोपे हैं और अपनी सेना भेजी है। सवाल यह है कि आखिर वो ऐसा क्यों करता है? इसका जवाब छुपा है एक शब्द में और वो है “पेट्रो-डॉलर।”

Petrodollar system: क्या होता है पेट्रो-डॉलर और कैसे हुई इसकी शुरुआत

बात 1971 की है जब अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने एक ऐतिहासिक फैसला लिया। उन्होंने डॉलर को सोने से अलग कर दिया। इससे पहले हर डॉलर के पीछे एक तय मात्रा में सोने की गारंटी होती थी, लेकिन निक्सन ने वो धागा काट दिया। इसे “निक्सन शॉक” कहा जाता है। अब डॉलर की ताकत सोने पर नहीं, बल्कि तेल पर टिकी थी। 1973 में अमेरिका ने सऊदी अरब के साथ एक गुप्त समझौता किया। इस समझौते के तहत सऊदी अरब ने तय किया कि वो दुनिया में तेल की बिक्री सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी डॉलर में करेगा। बदले में अमेरिका ने सऊदी शाही परिवार को सुरक्षा की गारंटी दी। यहीं से पेट्रो-डॉलर की नींव पड़ी। धीरे-धीरे बाकी ओपेक देशों ने भी यही राह पकड़ी और पूरी दुनिया में तेल डॉलर में बिकने लगा।

Petrodollar system: डॉलर की ताकत का असली राज

अब समझिए इस खेल की असल चाल। जब दुनिया के हर देश को तेल खरीदना हो तो उसे पहले डॉलर खरीदना पड़ता है। चाहे भारत हो, चीन हो, जापान हो या यूरोप के देश, सबको पहले अपनी मुद्रा बेचकर डॉलर जुटाने होते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि पूरी दुनिया में डॉलर की मांग हमेशा बनी रहती है। इस मांग की वजह से अमेरिका जितना चाहे उतना डॉलर छाप सकता है। जब कोई और देश इतनी मुद्रा छापे तो उसकी अर्थव्यवस्था चरमरा जाए, महंगाई आसमान छू ले। लेकिन अमेरिका के लिए यह नियम लागू नहीं होता क्योंकि छपे हुए डॉलर को दुनिया तेल खरीदने के लिए खींच लेती है। यही अमेरिकी आर्थिक साम्राज्य की असली ताकत है।

Petrodollar system: तेल के लिए तख्तापलट और युद्ध

अब बात करते हैं उस काले इतिहास की जो पाठ्यपुस्तकों में नहीं मिलता। 1953 में ईरान के लोकतांत्रिक रूप से चुने हुए प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसादेग ने ईरानी तेल का राष्ट्रीयकरण करने का फैसला किया। यानी वो तेल की कमाई अपने देश के लोगों के लिए चाहते थे। अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA ने ब्रिटेन के साथ मिलकर उनकी सरकार को गिरा दिया और शाह को सत्ता में बिठाया। कारण सिर्फ यही था कि ईरान का तेल पश्चिमी कंपनियों के हाथ में रहे। इराक की कहानी तो और भी दर्दनाक है। 2003 में अमेरिका ने सामूहिक विनाश के हथियारों का बहाना बनाकर इराक पर हमला किया। सद्दाम हुसैन ने तेल को यूरो में बेचने की बात कही थी, यानी डॉलर को चुनौती देने की कोशिश की थी। उसका परिणाम सबके सामने है।

Petrodollar system: खाड़ी युद्ध और पेट्रो-डॉलर की रक्षा

1990 में जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर कब्जा किया तो अमेरिका तुरंत हरकत में आ गया। यह युद्ध सिर्फ कुवैत की आजादी के लिए नहीं था। असल बात यह थी कि अगर सद्दाम खाड़ी के तेल पर काबिज हो जाता तो वो तेल की कीमत और मुद्रा दोनों तय कर सकता था। यह पेट्रो-डॉलर के लिए सीधा खतरा था। अमेरिका ने लाखों सैनिक उतारे और युद्ध लड़ा। सऊदी अरब, जो इस पूरे पेट्रो-डॉलर सिस्टम की धुरी है, उसके साथ अमेरिका का रिश्ता भी बड़ा दिलचस्प है। सऊदी शाही परिवार मानवाधिकारों को कुचलता है, विपक्ष को खत्म करता है, पत्रकारों की हत्या होती है लेकिन अमेरिका हमेशा आंखें मूंदे रहता है। कारण साफ है, सऊदी अरब पेट्रो-डॉलर का सबसे बड़ा स्तंभ है।

Petrodollar system: क्या पेट्रो-डॉलर को चुनौती मिल रही है

आज दुनिया बदल रही है और पेट्रो-डॉलर की जड़ें हिलने लगी हैं। चीन ने युआन में तेल खरीदने के समझौते कई देशों से किए हैं। रूस ने प्रतिबंधों के बाद अपना तेल रुपये और युआन में बेचना शुरू किया। भारत भी कुछ सौदों में डॉलर के बजाय रुपये का इस्तेमाल कर चुका है। ब्रिक्स देश एक नई मुद्रा की संभावना पर विचार कर रहे हैं जो डॉलर के दबदबे को सीधी चुनौती दे। यही वजह है कि अमेरिका आजकल रूस, चीन और ईरान के खिलाफ इतना आक्रामक दिखता है। यह सिर्फ लोकतंत्र और तानाशाही की लड़ाई नहीं है, यह असल में डॉलर की बादशाहत बचाने की जंग है।

Petrodollar system: भारत के लिए क्या मायने रखता है यह खेल

भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है। हर साल भारत तेल खरीदने के लिए सैकड़ों अरब डॉलर खर्च करता है। इसका मतलब है कि पेट्रो-डॉलर सिस्टम भारत की जेब पर सीधा असर डालता है। जब डॉलर महंगा होता है तो तेल महंगा हो जाता है, महंगाई बढ़ती है और आम आदमी की रसोई पर बोझ पड़ता है। इसीलिए भारत का रुपये में तेल खरीदने की कोशिश करना महज एक आर्थिक फैसला नहीं है, यह एक बड़ी भू-राजनीतिक चाल है। अगर दुनिया धीरे-धीरे डॉलर से हटकर दूसरी मुद्राओं में तेल खरीदने लगी तो अमेरिकी आर्थिक दबदबे की नींव हिल जाएगी। पेट्रो-डॉलर की यह कहानी सिर्फ तेल और पैसे की कहानी नहीं है। यह उन लाखों जिंदगियों की कहानी भी है जो इस खेल में बिसात के मोहरे बन गए।

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