NCERT किताब विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, एक हफ्ते में बनेगी डोमेन एक्सपर्ट कमेटी; विवादित अध्याय की समीक्षा और पाठ्यपुस्तकों की व्यापक जांच के आदेश
केंद्र को एक हफ्ते में एक्सपर्ट कमेटी बनाने का आदेश, विवादित अध्याय की होगी समीक्षा
NCERT textbook controversy: NCERT की पाठ्यपुस्तकों को लेकर चल रहे विवाद में बुधवार को सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया। देश की सर्वोच्च अदालत ने केंद्र सरकार को सख्त निर्देश देते हुए कहा कि एक सप्ताह के भीतर डोमेन एक्सपर्ट कमेटी का गठन किया जाए। इस कमेटी में एक पूर्व न्यायाधीश, एक अनुभवी शिक्षाविद् और कानून के एक जानकार विशेषज्ञ को शामिल किया जाएगा। यह फैसला उस वक्त आया जब कक्षा 8 की एक पाठ्यपुस्तक के एक विवादास्पद अध्याय ने पूरे देश में बहस छेड़ दी थी।
NCERT textbook controversy: क्यों लेना पड़ा सुप्रीम कोर्ट को यह फैसला?
दरअसल NCERT की कक्षा 8 की एक पाठ्यपुस्तक में शामिल एक अध्याय पर लंबे समय से विवाद चल रहा था। आरोप था कि इस अध्याय की सामग्री न केवल भ्रामक है बल्कि यह न्यायपालिका को लेकर गलत धारणाएं बनाने में भी सहायक हो सकती है। इस मामले में तीन नाम बार-बार सामने आए, प्रोफेसर मिशेल डैनिनो, शिक्षिका सुपर्णा दिवाकर और कानूनी शोधकर्ता आलोक प्रसन्ना कुमार। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और NCERT दोनों को आदेश दिया कि इन तीनों को स्कूली पाठ्यक्रम तैयार करने की किसी भी प्रक्रिया से तत्काल बाहर किया जाए। मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि अगर इन तीनों व्यक्तियों को इस आदेश में किसी संशोधन की जरूरत लगती है तो वे अदालत का दरवाजा खटखटा सकते हैं।
NCERT textbook controversy: CJI ने क्या कहा, जो सबका ध्यान खींच गया
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा चर्चा मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत के उस बयान की हुई जिसमें उन्होंने कहा कि अगर न्यायपालिका में भी किसी अन्य संस्था की तरह कमियां हैं और अगर उन कमियों की ओर ध्यान दिलाया जाता है तो यह भविष्य के न्यायाधीशों और वकीलों के लिए मददगार साबित होगा। इससे वर्तमान में जुड़े पक्षों को भी सुधारात्मक कदम उठाने में सहायता मिलेगी। उन्होंने यह भी आदेश दिया कि नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी, भोपाल से परामर्श लेकर कानूनी अध्ययन पर सामग्री तैयार की जाए।
NCERT textbook controversy: न्यायपालिका को बदनाम करने वालों पर भड़के CJI
इस सुनवाई के दौरान एक और अहम पहलू सामने आया। मुख्य न्यायाधीश ने सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफार्मों पर न्यायपालिका के खिलाफ अभद्र और भड़काऊ टिप्पणियां करने वालों पर कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि ऐसे सोशल मीडिया अकाउंट और डिजिटल प्लेटफार्मों की पहचान की जाए जो न्यायपालिका की छवि को धूमिल करने का काम कर रहे हैं, और उनके खिलाफ तत्काल कार्रवाई की जाए। CJI ने कहा कि ऐसे लोगों को सबक सिखाना बेहद जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट लहजे में कहा कि वे बतौर मुख्य न्यायाधीश ऐसे लोगों को किसी भी हालत में नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने यह भी कहा कि जिन लोगों ने न्यायपालिका को बदनाम करने की कोशिश की है, यह भी देखना होगा कि उन्होंने अब तक बिना शर्त माफी मांगी है या नहीं।
NCERT textbook controversy: NCERT ने पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा शुरू की
इस मामले में एक राहत देने वाली खबर यह भी सामने आई कि केंद्र सरकार ने NCERT को सभी कक्षाओं की पाठ्यपुस्तकों की व्यापक समीक्षा करने का निर्देश दे दिया है। सॉलिसिटर जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को इस बारे में जानकारी दी। इससे यह साफ संकेत मिलता है कि सरकार इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करने को लेकर गंभीर है।
NCERT textbook controversy: देशभर में क्यों मचा था बवाल?
NCERT की पाठ्यपुस्तकों में बदलाव का यह मामला पहली बार नहीं उठा है। पिछले कुछ वर्षों में कई बार यह आरोप लगते रहे हैं कि स्कूली किताबों में जो सामग्री शामिल की जा रही है वह एकतरफा, भ्रामक या किसी खास विचारधारा को बढ़ावा देने वाली है। इस बार कक्षा 8 की पाठ्यपुस्तक का वह अध्याय विवाद की जड़ बना जिसमें न्यायिक प्रणाली को लेकर ऐसी सामग्री शामिल थी जिसे लेकर शिक्षाविदों, कानून विशेषज्ञों और अभिभावकों ने गहरी आपत्ति जताई। इस पूरे विवाद ने यह सवाल खड़ा कर दिया कि देश के करोड़ों बच्चों को जो पाठ्यसामग्री पढ़ाई जा रही है, उसे तैयार करने की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी और जवाबदेह है? क्या उन विशेषज्ञों पर भरोसा करना उचित है जिनकी पृष्ठभूमि और इरादों पर सवाल उठ रहे हों?
NCERT textbook controversy: आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला निश्चित रूप से NCERT और केंद्र सरकार दोनों के लिए एक बड़ा संदेश है। अब जब डोमेन एक्सपर्ट कमेटी का गठन होगा तो उम्मीद की जा रही है कि पाठ्यपुस्तकों की समीक्षा अधिक निष्पक्ष, पारदर्शी और व्यापक होगी। एक सप्ताह की तय समयसीमा यह भी बताती है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को लेकर कितना गंभीर है और वह किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला एक स्वागतयोग्य कदम है। उनका कहना है कि पाठ्यपुस्तकें किसी भी देश की अगली पीढ़ी की नींव तय करती हैं। ऐसे में इनकी सामग्री को लेकर पूरी सतर्कता बरती जानी चाहिए। जो भी सामग्री बच्चों तक पहुंचे वह प्रामाणिक, संतुलित और देश की संवैधानिक भावना के अनुरूप होनी चाहिए। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि केंद्र सरकार एक सप्ताह के भीतर इस कमेटी का गठन करती है या नहीं और यह कमेटी किस तरह से अपनी जिम्मेदारी निभाती है।
read more here