लापता बच्चों के मामले में सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र से कहा, पता करें नेटवर्क का सच

हर 8 मिनट में एक बच्चा लापता, कोर्ट ने मांगा देशव्यापी डेटा और गहन विश्लेषण

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Supreme Court News: देशभर में बच्चों के लापता होने के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केंद्र सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं। न्यायालय ने केंद्र से यह पता लगाने को कहा है कि क्या देश के विभिन्न हिस्सों में बच्चों के गायब होने की बढ़ती घटनाओं के पीछे कोई देशव्यापी गिरोह या राज्य-विशिष्ट संगठित समूह सक्रिय है। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने स्पष्ट किया कि यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि इन घटनाओं के पीछे कोई निश्चित पैटर्न है या ये महज आकस्मिक घटनाएं हैं। पीठ ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से लापता बच्चों का संपूर्ण डेटा एकत्र करे और उसका विस्तृत विश्लेषण करे। यह मामला एक एनजीओ द्वारा दायर जनहित याचिका पर चल रहा है, जिसमें कई राज्यों में लापता बच्चों की संख्या में चिंताजनक वृद्धि को रेखांकित किया गया है।

Supreme Court News: केंद्र सरकार ने पेश किया डेटा का हाल

अदालत में केंद्र की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल ऐश्वर्या भाटी ने कोर्ट को बताया कि कुछ राज्यों ने लापता बच्चों और उनसे संबंधित अभियोजन के आंकड़े उपलब्ध कराए हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि लगभग एक दर्जन राज्यों ने अभी तक अपना डेटा साझा नहीं किया है।

भाटी ने अदालत के समक्ष दलील दी कि किसी भी सार्थक विश्लेषण के लिए पूर्ण और व्यापक डेटा आवश्यक है। उन्होंने कहा कि केवल आंशिक जानकारी के आधार पर कोई ठोस निष्कर्ष निकालना संभव नहीं है।

केंद्र सरकार की वकील ने कोर्ट को बताया कि सरकार यह जानना चाहती है कि क्या इन घटनाओं के पीछे कोई राष्ट्रव्यापी गिरोह सक्रिय है या फिर ये राज्य-विशिष्ट समूहों की करतूत है। यह भी पता लगाना जरूरी है कि क्या इन मामलों में कोई विशिष्ट पैटर्न दिखाई देता है या ये सभी अलग-अलग और असंबंधित घटनाएं हैं।

भाटी ने आश्वासन दिया कि जैसे ही सभी राज्यों से पूरा डेटा प्राप्त होगा, केंद्र सरकार उसका गहन विश्लेषण करेगी और अदालत के समक्ष विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करेगी।

सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण सुझाव

न्यायालय की पीठ ने केंद्र सरकार को कुछ महत्वपूर्ण और व्यावहारिक सुझाव दिए। सबसे महत्वपूर्ण सुझाव यह था कि जिन बच्चों को बचाया गया है, उनसे विस्तृत बातचीत की जानी चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि बचाए गए बच्चों से सावधानीपूर्वक पूछताछ करके यह पता लगाया जा सकता है कि उन्हें किसने और कैसे अपहृत किया था। उनके साथ क्या हुआ, उन्हें कहां रखा गया और क्या उन्होंने अन्य लापता बच्चों को देखा।

यह जानकारी अपहरणकर्ताओं की पहचान, उनके कार्यप्रणाली और संभावित नेटवर्क को समझने में बेहद मददगार हो सकती है। बच्चों की गवाही से यह भी पता चल सकता है कि क्या ये घटनाएं संगठित अपराध का हिस्सा हैं।

न्यायालय ने यह भी सुझाव दिया कि बाल मनोवैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की मदद से बच्चों से संवेदनशील तरीके से पूछताछ की होनी चाहिए ताकि उन्हें कोई मानसिक आघात न पहुंचे।

Supreme Court News: राज्यों की लापरवाही पर कड़ी टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने उन राज्यों की कड़ी आलोचना की जिन्होंने अभी तक लापता बच्चों का डेटा उपलब्ध नहीं कराया है। न्यायालय ने कहा कि यह गंभीर लापरवाही है और बच्चों की सुरक्षा के प्रति राज्यों के उदासीन रवैये को दर्शाता है। पीठ ने चेतावनी दी कि यदि राज्य स्वेच्छा से सहयोग नहीं करते हैं, तो अदालत कड़े आदेश पारित करने के लिए मजबूर होगी। न्यायालय ने संकेत दिया कि वह राज्यों को बाध्य करने के लिए सख्त दंडात्मक कार्रवाई भी कर सकती है।

वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट्ट ने अदालत से अनुरोध किया कि केंद्र सरकार ने अच्छी पहल की है और अब सभी राज्यों को स्पष्ट और समयबद्ध निर्देश जारी किए जाने चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि प्रत्येक राज्य को एक निश्चित समय सीमा के भीतर पूरा डेटा उपलब्ध कराना अनिवार्य किया जाए, अन्यथा उनके खिलाफ कार्रवाई की जाए।

एनजीओ की याचिका और पृष्ठभूमि

यह मामला ‘गुड़िया स्वयं सेवी संस्थान’ नामक एनजीओ द्वारा दायर जनहित याचिका पर आधारित है। इस याचिका में कई राज्यों में लापता बच्चों की संख्या में लगातार हो रही वृद्धि को गंभीरता से उठाया गया है।

एनजीओ ने अपनी याचिका में विभिन्न राज्यों से एकत्रित आंकड़े और तथ्य प्रस्तुत किए हैं जो इस समस्या की भयावहता को दर्शाते हैं। याचिका में बच्चों की तस्करी, अवैध गोद लेने और अंग व्यापार जैसे गंभीर आरोप भी लगाए गए हैं। संस्थान ने अदालत से मांग की है कि इस मुद्दे पर राष्ट्रीय स्तर पर कार्रवाई की जाए और एक समग्र रणनीति विकसित की जाए। उन्होंने कहा कि यह केवल कानून व्यवस्था का मामला नहीं है बल्कि बाल अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।

Supreme Court News: पिछले निर्देश और कोर्ट की चिंता

सुप्रीम कोर्ट इससे पहले भी इस मामले पर कई महत्वपूर्ण निर्देश दे चुका है। 9 दिसंबर 2025 को अदालत ने केंद्र सरकार को लापता बच्चों के पिछले छह वर्षों का राष्ट्रव्यापी डेटा संकलित करने का निर्देश दिया था। उसी समय कोर्ट ने केंद्रीय गृह मंत्रालय में एक समर्पित अधिकारी की नियुक्ति का भी आदेश दिया था जो राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के साथ प्रभावी समन्वय सुनिश्चित करेगा।

18 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने एक मीडिया रिपोर्ट का संज्ञान लेते हुए गंभीर चिंता व्यक्त की थी। उस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि भारत में हर आठ मिनट में एक बच्चा लापता हो जाता है। यह आंकड़ा अत्यंत चौंकाने वाला है। इसका अर्थ है कि प्रतिदिन लगभग 180 बच्चे लापता होते हैं। एक वर्ष में यह संख्या 65,000 से अधिक हो जाती है।

गोद लेने की प्रक्रिया पर टिप्पणी

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की थी कि भारत में गोद लेने की प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है। न्यायालय ने केंद्र सरकार से इस प्रक्रिया को सरल और पारदर्शी बनाने को कहा था। अदालत ने कहा था कि जटिल और लंबी प्रक्रिया के कारण लोग अवैध तरीकों का सहारा लेते हैं। कई निःसंतान दंपत्ति वैध गोद लेने की प्रक्रिया से निराश होकर अवैध रास्ते अपनाते हैं।

यह स्थिति बच्चों की तस्करी और अवैध गोद लेने को बढ़ावा देती है। कोर्ट का मानना है कि यदि वैध गोद लेना आसान और तेज हो, तो अवैध व्यापार पर अंकुश लग सकता है।

Supreme Court News: आगे की राह

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि वह इस मामले को बहुत गंभीरता से ले रहा है। अदालत चाहती है कि केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर इस समस्या का स्थायी समाधान खोजें। डेटा संकलन और विश्लेषण पहला कदम है। इससे समस्या की वास्तविक प्रकृति और व्यापकता समझी जा सकेगी। फिर उसके आधार पर ठोस कार्य योजना बनाई जा सकती है।

निष्कर्ष

लापता बच्चों का मामला राष्ट्रीय शर्म का विषय है। सुप्रीम कोर्ट का सक्रिय हस्तक्षेप सराहनीय है। अब सभी राज्यों और केंद्र को मिलकर इस गंभीर समस्या से निपटना होगा ताकि हर बच्चा सुरक्षित रह सके।

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