शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने वाराणसी में चतुरंगिणी सेना सभा बनाई, 27 सदस्यों को फरसा देकर सनातन रक्षा का संकल्प लिया

वाराणसी के विद्यामठ में 27 सदस्यों को फरसा प्रदान कर सनातन रक्षा का संकल्प, 10 महीने में भर्ती-प्रशिक्षण की रूपरेखा तैयार

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Avimukteshwaranand: वाराणसी के विद्यामठ आश्रम में ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने ‘चतुरंगिणी सेना सभा’ की स्थापना की है। 27 सदस्यों की इस प्रारंभिक टीम को ‘रोको, टोको और ठोको’ का नारा देते हुए फरसा प्रदान किया जाएगा। आगामी 10 महीनों में भर्ती और प्रशिक्षण की पूरी रूपरेखा तैयार होगी।

Avimukteshwaranand: चतुरंगिणी सेना सभा क्या है और इसका गठन क्यों हुआ?

ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने वाराणसी स्थित अपने विद्यामठ आश्रम में ‘चतुरंगिणी सेना सभा’ के गठन की औपचारिक घोषणा की। इस संगठन में पहले चरण में 27 सदस्यों को शामिल किया गया है और सभी को एक पारंपरिक शस्त्र फरसा प्रदान किया जाएगा।

शंकराचार्य ने इस अवसर पर ‘रोको, टोको और ठोको’ का नारा दिया। उनके अनुसार यह संगठन सनातन धर्म के प्रतीकों की रक्षा करेगा और समाज में सुरक्षा की भावना को मजबूत बनाएगा। यह पहल माघ मेले में हुई एक घटना के बाद शुरू की गई बताई जा रही है।

Avimukteshwaranand: माघ मेले की घटना क्या थी जिसने इस कदम को जन्म दिया?

प्रयागराज में हर साल आयोजित होने वाले माघ मेले के दौरान एक ऐसी घटना हुई जिसने शंकराचार्य को यह संगठन बनाने के लिए प्रेरित किया। सूत्रों के अनुसार उस घटना में सनातन आस्था से जुड़े किसी प्रतीक या स्थल के साथ अनुचित व्यवहार हुआ था।

शंकराचार्य का मानना है कि धार्मिक स्थलों और प्रतीकों की सुरक्षा के लिए केवल आध्यात्मिक प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। उन्होंने कहा कि समाज को संगठित होना होगा और जहां जरूरी हो वहां शक्ति का भी प्रदर्शन करना होगा।

Avimukteshwaranand: शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कौन हैं?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ज्योतिर्मठ बदरिकाश्रम के शंकराचार्य हैं। वे आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित चार मठों में से एक के पीठाधीश्वर हैं। काशी में उनका विद्यामठ आश्रम धार्मिक और सामाजिक गतिविधियों का एक सक्रिय केंद्र है।

वे समय-समय पर सनातन धर्म से जुड़े मुद्दों पर मुखर रूप से अपना पक्ष रखते हैं। पिछले कुछ वर्षों में उन्होंने मंदिर आंदोलन, गाय संरक्षण और धर्म रक्षा जैसे विषयों पर बड़े सार्वजनिक मंचों पर अपनी बात रखी है।

Avimukteshwaranand: 10 महीनों की योजना में क्या होगा प्रशिक्षण का खाका?

शंकराचार्य ने बताया कि आने वाले 10 महीनों में चतुरंगिणी सेना सभा के लिए भर्ती और प्रशिक्षण की विस्तृत रूपरेखा तैयार की जाएगी। इसमें शारीरिक प्रशिक्षण के साथ-साथ धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों की शिक्षा भी दी जाएगी।

संगठन के सदस्यों को पारंपरिक भारतीय शस्त्र फरसा धारण करने का अधिकार दिया जाएगा। यह प्रतीकात्मक रूप से उस परंपरा से जुड़ा है जिसमें भगवान परशुराम को फरसाधारी माना जाता है और उन्हें धर्म की रक्षा का प्रतीक माना जाता है।

Avimukteshwaranand: धार्मिक संगठनों के इस तरह के कदमों पर विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

सामाजिक और धार्मिक मामलों के विशेषज्ञों के अनुसार, “भारत में धार्मिक संगठनों का सशस्त्र या अर्धसशस्त्र स्वरूप कोई नई परिघटना नहीं है। लेकिन जब किसी शंकराचार्य जैसी सर्वोच्च धार्मिक सत्ता इस तरह का संगठन बनाती है, तो इसका सांकेतिक महत्व बहुत बड़ा होता है।”

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे संगठनों को अपनी गतिविधियाँ भारतीय कानून के दायरे में रखनी होती हैं। किसी भी स्वयंसेवी या धार्मिक संगठन का गठन वैध है, लेकिन उसकी गतिविधियाँ संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर ही होनी चाहिए।

Avimukteshwaranand: इस संगठन का उद्देश्य और कार्यक्षेत्र क्या होगा?

शंकराचार्य के अनुसार चतुरंगिणी सेना सभा का मुख्य उद्देश्य सनातन धर्म के प्रतीकों, मंदिरों और धार्मिक आयोजनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही समाज में अनुशासन और जागरूकता का संदेश भी फैलाया जाएगा।

‘रोको, टोको और ठोको’ के नारे का अर्थ है कि अगर कोई धर्म विरोधी कार्य होता दिखे तो पहले उसे रोका जाए, फिर टोका जाए और यदि फिर भी न माने तो उचित कार्रवाई की जाए। शंकराचार्य ने स्पष्ट किया कि यह नारा कानून की सीमाओं के भीतर रहते हुए समाज में सक्रियता का आह्वान है।

निष्कर्ष

काशी की पवित्र धरती से उठी यह आवाज केवल एक संगठन के गठन की खबर नहीं है, यह उस व्यापक सामाजिक भावना की अभिव्यक्ति है जो धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए संगठित होना चाहती है। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का यह कदम धार्मिक नेतृत्व की एक नई भूमिका को परिभाषित करता है। आने वाले महीनों में जब इस संगठन की भर्ती और प्रशिक्षण प्रक्रिया आकार लेगी, तब इसकी वास्तविक भूमिका और प्रभाव का सही आकलन हो सकेगा।

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