जनवरी में खुदरा महंगाई घटकर 2.75% पर आई, नई CPI सीरीज में 2024 को आधार वर्ष बनाया गया, खाद्य मुद्रास्फीति 2.13%

सरकार ने जारी किए ताजा आंकड़े, वस्तुओं और सेवाओं की सूची में किया गया बड़ा विस्तार

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Retail Inflation: भारत में खुदरा महंगाई में उल्लेखनीय कमी आई है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा बुधवार को जारी नई उपभोक्ता मूल्य सूचकांक सीरीज के अनुसार, जनवरी 2026 में खुदरा महंगाई दर घटकर 2.75 प्रतिशत पर आ गई। यह आंकड़ा नई सीपीआई सीरीज पर आधारित है जिसमें 2024 को आधार वर्ष के रूप में लिया गया है। इस नई गणना पद्धति में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं ताकि मूल्य स्थिति का अधिक सटीक और व्यापक आकलन किया जा सके।

नई सीपीआई सीरीज के साथ तुलना करने पर, पुरानी सीरीज जिसमें 2012 को आधार वर्ष माना गया था, के अनुसार जनवरी 2025 में खुदरा महंगाई 4.26 प्रतिशत थी जबकि दिसंबर 2025 में यह 1.33 प्रतिशत रही। हालांकि, विभिन्न आधार वर्षों के कारण इन आंकड़ों की प्रत्यक्ष तुलना सीमित है।

Retail Inflation: खाद्य मुद्रास्फीति में भी आई कमी

नई सीपीआई सीरीज के अनुसार, जनवरी 2026 में खाद्य मुद्रास्फीति 2.13 प्रतिशत रही। यह आंकड़ा यह दर्शाता है कि खाद्य पदार्थों की कीमतों में वृद्धि की दर अपेक्षाकृत नियंत्रण में रही। खाद्य मुद्रास्फीति का आम जनता की क्रय शक्ति पर सीधा प्रभाव पड़ता है, इसलिए इसका कम रहना एक सकारात्मक संकेत है।

खाद्य वस्तुओं में सब्जियों, फलों, अनाज, दालों, दूध और डेयरी उत्पादों की कीमतें शामिल होती हैं। पिछले कुछ महीनों में सब्जियों की कीमतों में उतार-चढ़ाव देखा गया था, लेकिन जनवरी में स्थिति अपेक्षाकृत स्थिर रही। सरकार की ओर से खाद्य कीमतों को नियंत्रित करने के लिए उठाए गए कदमों का भी इसमें योगदान रहा।

अनाज की कीमतें सामान्य रही हैं और अच्छी फसल के कारण दालों की उपलब्धता में सुधार हुआ है। दूध और डेयरी उत्पादों में मौसमी उतार-चढ़ाव के बावजूद, समग्र खाद्य मुद्रास्फीति नियंत्रण में रही है। यह स्थिति आम उपभोक्ताओं के लिए राहत की बात है।

नई CPI सीरीज में महत्वपूर्ण बदलाव

नई उपभोक्ता मूल्य सूचकांक सीरीज में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं जो इसे अधिक समकालीन और प्रासंगिक बनाते हैं। सबसे उल्लेखनीय परिवर्तन यह है कि वस्तुओं की संख्या 259 से बढ़ाकर 308 कर दी गई है। यह विस्तार इसलिए किया गया है ताकि उपभोक्ताओं की खरीद टोकरी में आए बदलावों को बेहतर तरीके से प्रतिबिंबित किया जा सके।

सेवाओं की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। पुरानी सीरीज में 40 सेवाएं शामिल थीं, जबकि नई सीरीज में इन्हें बढ़ाकर 50 कर दिया गया है। यह बदलाव भारतीय अर्थव्यवस्था में सेवा क्षेत्र की बढ़ती भूमिका को स्वीकार करता है। सेवा क्षेत्र अब जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा है और रोजगार का प्रमुख स्रोत भी है।

नई मदों में ग्रामीण घर किराया को शामिल करना एक महत्वपूर्ण कदम है। पहले सीपीआई में मुख्य रूप से शहरी आवास की लागत पर ध्यान केंद्रित था, लेकिन अब ग्रामीण क्षेत्रों में भी आवास लागत को मापा जाएगा। यह बदलाव ग्रामीण और शहरी मुद्रास्फीति के बीच अंतर को बेहतर समझने में मदद करेगा।

Retail Inflation: डिजिटल युग के अनुरूप नई मदें

आधुनिक जीवनशैली में डिजिटल सेवाओं की बढ़ती भूमिका को देखते हुए, नई सीरीज में ऑनलाइन मीडिया सेवाओं और ओटीटी प्लेटफॉर्म सब्सक्रिप्शन को शामिल किया गया है। नेटफ्लिक्स, अमेजन प्राइम, डिज्नी प्लस हॉटस्टार जैसे प्लेटफॉर्म आज लाखों भारतीयों की मनोरंजन खपत का हिस्सा हैं। इन सेवाओं की लागत को सीपीआई में शामिल करना समय की मांग थी।

ईंधन की श्रेणी में भी विस्तार किया गया है। अब केवल पेट्रोल और डीजल ही नहीं, बल्कि सीएनजी और पीएनजी को भी शामिल किया गया है। कई शहरों में वाहनों और घरेलू उपयोग के लिए सीएनजी और पीएनजी का उपयोग तेजी से बढ़ा है, इसलिए इनकी कीमतों को ट्रैक करना आवश्यक हो गया था।

टेलीफोन शुल्क, रेल किराया, हवाई किराया और डाक शुल्क जैसी सेवाओं के लिए अब डिजिटल और प्रशासनिक स्रोतों से डेटा एकत्र किया जाएगा। यह परिवर्तन डेटा संग्रह को अधिक कुशल और सटीक बनाएगा। पहले इन मदों के लिए मुख्य रूप से सर्वेक्षण पर निर्भरता थी, लेकिन अब सरकारी और निजी डेटाबेस का उपयोग किया जाएगा।

आधार वर्ष परिवर्तन का महत्व

सीपीआई के आधार वर्ष को 2012 से बदलकर 2024 करना एक सामान्य और आवश्यक प्रक्रिया है। आधार वर्ष वह वर्ष होता है जिसके मूल्य स्तर को 100 मानकर बाद के वर्षों में मूल्य परिवर्तन को मापा जाता है। समय के साथ उपभोग पैटर्न बदलते हैं, नई वस्तुएं और सेवाएं बाजार में आती हैं, और पुरानी चीजें प्रासंगिकता खो देती हैं।

2012 के बाद से भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज में महत्वपूर्ण परिवर्तन हुए हैं। स्मार्टफोन, इंटरनेट सेवाएं, डिजिटल भुगतान, ई-कॉमर्स और कई अन्य चीजें जो आज आम हैं, 2012 में या तो मौजूद नहीं थीं या बहुत सीमित थीं। इसलिए पुराने आधार वर्ष से वर्तमान उपभोग पैटर्न को सटीक रूप से नहीं मापा जा सकता था।

नया आधार वर्ष 2024 को चुनने से सूचकांक वर्तमान वास्तविकताओं को बेहतर प्रतिबिंबित करेगा। हालांकि, आधार वर्ष बदलने से पुराने और नए आंकड़ों की प्रत्यक्ष तुलना मुश्किल हो जाती है। इसलिए अर्थशास्त्रियों और नीति निर्माताओं को दोनों सीरीज के बीच अंतर को ध्यान में रखना होगा।

Retail Inflation: मौद्रिक नीति पर प्रभाव

खुदरा मुद्रास्फीति आरबीआई की मौद्रिक नीति के लिए एक प्रमुख संकेतक है। भारतीय रिजर्व बैंक का लक्ष्य मुद्रास्फीति को 4 प्रतिशत के आसपास रखना है, जिसमें प्लस-माइनस 2 प्रतिशत की सहनशीलता सीमा है। जनवरी में 2.75 प्रतिशत की मुद्रास्फीति दर आरबीआई के लक्ष्य से नीचे है।

यह कम मुद्रास्फीति आरबीआई को ब्याज दरों में कटौती करने का अवसर दे सकती है। कम ब्याज दरें उधारी को सस्ता बनाती हैं, जिससे निवेश और खपत को बढ़ावा मिलता है। हालांकि, आरबीआई अन्य कारकों जैसे आर्थिक वृद्धि, वैश्विक स्थिति और वित्तीय स्थिरता को भी ध्यान में रखता है।

कम खाद्य मुद्रास्फीति विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में सीपीआई टोकरी में खाद्य पदार्थों का भार काफी अधिक है। खाद्य कीमतों में स्थिरता से समग्र मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने में मदद मिलती है। यह आम जनता, विशेष रूप से कम आय वर्ग के लिए भी राहत की बात है।

नई सीपीआई सीरीज भारत के आर्थिक डेटा संग्रह और विश्लेषण को आधुनिक बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह नीति निर्माताओं को बेहतर जानकारी प्रदान करेगी और अधिक सूचित निर्णय लेने में सहायता करेगी।

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