NGT ने दी ₹81,000 करोड़ के ग्रेट निकोबार मेगा प्रोजेक्ट को हरी झंडी, बनेंगे पोर्ट-एयरपोर्ट और पावर प्लांट

ट्रांसशिपमेंट पोर्ट, एयरपोर्ट, पावर प्लांट बनेगा, 10 लाख पेड़ों की कटाई, चीन पर नजर रखने की ताकत

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Great Nicobar Mega Project : नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (NGT) की 6 सदस्यों वाली स्पेशल बेंच ने सोमवार को 81,000 करोड़ रुपये के ग्रेट निकोबार मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट को मंजूरी दे दी। NGT चेयरपर्सन जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव की अगुवाई वाली स्पेशल बेंच ने कहा कि प्रोजेक्ट को दी गई पर्यावरण मंजूरी में दखल देने का कोई ठोस आधार नहीं मिला क्योंकि इसमें पर्याप्त सुरक्षा उपाय मौजूद थे।

Great Nicobar Mega Project : प्रोजेक्ट के तहत क्या बनेगा?

इस मेगा प्रोजेक्ट के तहत सरकार निम्नलिखित निर्माण करना चाहती है:

  • ट्रांसशिपमेंट पोर्ट

  • इंटीग्रेटेड टाउनशिप

  • सिविल और मिलिट्री एयरपोर्ट

  • 450 MVA का गैस और सोलर पावर प्लांट

Great Nicobar Mega Project: 6 जजों की स्पेशल बेंच का फैसला

NGT की इस स्पेशल बेंच ने माना कि प्रोजेक्ट के रणनीतिक महत्व को नकारा नहीं जा सकता। बेंच ने इस मुद्दे को “बैलेंस्ड अप्रोच” की जरूरत वाला बताया। ट्रिब्यूनल ने 2023 में गठित हाई-पावर्ड कमेटी की रिपोर्ट और सुझावों को ध्यान में रखते हुए यह अंतिम निर्णय लिया। बेंच ने स्पष्ट किया कि सरकार पर्यावरण मंजूरी की सभी शर्तों का पालन करने के लिए बाध्य होगी।

Great Nicobar Mega Project: भारत के लिए क्यों जरूरी है यह प्रोजेक्ट?

  • आर्थिक लाभ: ग्रेट निकोबार द्वीप मलक्का जलडमरूमध्य के पास स्थित है। ट्रांसशिपमेंट पोर्ट बनने से भारत वैश्विक सप्लाई चेन का प्रमुख हिस्सा बनेगा, जिससे विदेशी मुद्रा और रोजगार के अवसर पैदा होंगे।

  • सैन्य महत्व: यहां से भारत हिंद महासागर में चीनी जहाजों और पनडुब्बियों पर पैनी नजर रख सकेगा। मिलिट्री बेस बनने से भारत को स्थायी निगरानी और त्वरित सैन्य प्रतिक्रिया की क्षमता मिलेगी।

  • रणनीतिक बढ़त: किसी भी प्राकृतिक आपदा या युद्ध की परिस्थिति में यह स्थान भारत को बढ़त प्रदान करेगा।

Great Nicobar Mega Project: पर्यावरण संरक्षण और चुनौतियां

NGT द्वारा लगाई गई शर्तें:

  • लेदरबैक समुद्री कछुए, निकोबार मेगापोड, खारे पानी के मगरमच्छ और अन्य स्थानीय प्रजातियों की सुरक्षा के लिए खास शर्तें तय की गई हैं।

  • निर्माण से द्वीप के किनारों पर कटाव या शोरलाइन में बदलाव नहीं होना चाहिए।

  • रेतीले बीच को किसी भी तरह का नुकसान नहीं पहुंचना चाहिए।

पर्यावरणविदों की चिंता:

  • 130 वर्ग किलोमीटर जंगल की जमीन का डायवर्जन और लगभग 10 लाख पेड़ों की कटाई एक बड़ी चिंता है।

  • स्थानीय निकोबारी समुदाय को उनके और अधिक विस्थापन का डर है। सरकार का दावा है कि उन्हें उचित मुआवजा और पुनर्वास दिया जाएगा।

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