UGC के नए नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका, जाति आधारित भेदभाव का आरोप

विनीत जिंदल ने कहा- जनरल कैटेगरी के छात्रों को किया गया नजरअंदाज, समान अवसर की मांग

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New UGC Bill 2026: यूनिवर्सिटी ग्रांट कमिशन (UGC) द्वारा हाल ही में जारी किए गए नए नियमों को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। यह मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। सर्वोच्च न्यायालय में एक याचिका दायर करके इन नए नियमों को चुनौती दी गई है और आरोप लगाया गया है कि यूजीसी जाति आधारित भेदभाव को बढ़ावा दे रही है।

याचिकाकर्ता विनीत जिंदल ने अपनी याचिका में गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि यूजीसी के ये नए नियम कुछ चुनिंदा जातियों को ही संस्थागत संरक्षण प्रदान करते हैं, जबकि अन्य वर्गों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया है। यह समावेशी विकास की अवधारणा के बिल्कुल विपरीत है।

New UGC Bill 2026: क्या है पूरा मामला

यूजीसी ने हाल ही में एक नया नोटिफिकेशन जारी किया है जिसमें उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम बनाए गए हैं। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका के अनुसार, इस नोटिफिकेशन के नियम 3(सी) में एक बड़ी खामी है।

याचिका में कहा गया है कि यूजीसी अनारक्षित श्रेणी के अभ्यर्थियों और शिक्षकों को उचित संरक्षण देने में पूरी तरह से विफल रही है। जबकि अन्य आरक्षित वर्गों के लिए विशेष प्रावधान किए गए हैं, वहीं सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों की समस्याओं को अनदेखा किया गया है।

विनीत जिंदल ने लगाए गंभीर आरोप

New UGC Bill 2026
New UGC Bill 2026

याचिकाकर्ता विनीत जिंदल ने यूजीसी के इन नियमों के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उनका मुख्य आरोप है कि यूजीसी जाति आधारित भेदभाव को एक संकीर्ण नजरिए से देख रही है।

विनीत जिंदल का कहना है कि यूजीसी की परिभाषा के अनुसार जाति आधारित भेदभाव सिर्फ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के साथ ही होता है। इस परिभाषा में सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को पूरी तरह से बाहर रखा गया है।

याचिकाकर्ता का तर्क है कि यह धारणा गलत है क्योंकि वास्तविकता में सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों को भी कई बार जाति के आधार पर परेशानियों का सामना करना पड़ता है। उन्हें भी समान संरक्षण और सहायता की जरूरत है।

New UGC Bill 2026: याचिका में क्या मांगें की गई हैं

विनीत जिंदल ने अपनी याचिका में केंद्र सरकार और यूजीसी को कई महत्वपूर्ण निर्देश देने की मांग की है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम आदेश जारी करने की अपील की है। याचिका में मांग की गई है कि सभी अभ्यर्थियों के लिए समान अवसर केंद्र स्थापित किए जाएं। वर्तमान में जो व्यवस्था है वह सिर्फ आरक्षित वर्गों पर केंद्रित है, जिसे बदलने की जरूरत है।

सभी श्रेणियों के छात्रों के लिए समान हेल्पलाइन नंबर की स्थापना की मांग की गई है। इससे किसी भी वर्ग का छात्र अपनी समस्या दर्ज करा सकेगा और उसका समाधान पा सकेगा। याचिका में एक निष्पक्ष और समावेशी लोकपाल तंत्र के गठन की भी मांग की गई है। यह तंत्र सभी छात्रों और शिक्षकों की शिकायतों को सुनेगा और उचित कार्रवाई करेगा।

सबसे महत्वपूर्ण मांग यह है कि जातिगत भेदभाव की परिभाषा पर पुनर्विचार किया जाए। इस परिभाषा को इतना व्यापक बनाया जाए कि सभी वर्गों को इसमें शामिल किया जा सके।

यूजीसी के नए नियम क्या कहते हैं

यूजीसी ने उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम 2026 जारी किए हैं। इन नियमों का उद्देश्य शैक्षणिक संस्थानों में सभी छात्रों के लिए समान अवसर और सुरक्षित माहौल बनाना है। इन नियमों के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में इक्विटी कमेटी और इक्विटी स्क्वॉड का गठन करना अनिवार्य किया गया है। ये समितियां छात्रों की समस्याओं को सुनेंगी और उनका समाधान करेंगी।

सभी शैक्षणिक संस्थानों में 24 घंटे हेल्पलाइन और शिकायत निवारण प्रणाली स्थापित करने का निर्देश दिया गया है। छात्र किसी भी समय अपनी समस्या दर्ज करा सकेंगे। नियमों में विशेष रूप से अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के छात्रों को संस्थानों में सुरक्षित और भेदभाव रहित माहौल देने पर जोर दिया गया है।

यूजीसी ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन नियमों का उल्लंघन करने वाले संस्थानों की मान्यता रद्द की जा सकती है या उनके फंड पर रोक लगाई जा सकती है।

New UGC Bill 2026: विवाद की जड़ क्या है

विवाद की मुख्य वजह यह है कि यूजीसी के नियम सिर्फ आरक्षित वर्गों पर केंद्रित हैं। इनमें सामान्य वर्ग के छात्रों और शिक्षकों के लिए कोई विशेष प्रावधान नहीं किया गया है। आलोचकों का कहना है कि यह दृष्टिकोण एकतरफा है। भेदभाव किसी भी जाति या वर्ग के साथ हो सकता है और सभी को समान संरक्षण मिलना चाहिए।

कई शिक्षाविदों ने भी इस बात पर चिंता जताई है कि ऐसे नियम समाज में विभाजन को बढ़ावा दे सकते हैं। शिक्षा का उद्देश्य सभी को एक साथ लाना है, न कि अलग-अलग करना।

शिक्षा जगत में प्रतिक्रिया

यूजीसी के इन नियमों को लेकर शिक्षा जगत में मिली-जुली प्रतिक्रिया देखने को मिली है। कुछ लोग इसे सकारात्मक कदम मानते हैं तो कुछ इसकी आलोचना कर रहे हैं।

समर्थकों का कहना है कि ये नियम आरक्षित वर्ग के छात्रों को बेहतर सुरक्षा और अवसर प्रदान करेंगे। शैक्षणिक संस्थानों में अक्सर इन छात्रों को भेदभाव का सामना करना पड़ता है और ये नियम इस समस्या का समाधान करेंगे।

वहीं आलोचकों का मानना है कि सभी छात्रों के लिए समान नियम होने चाहिए। किसी एक वर्ग पर विशेष ध्यान देना अन्य वर्गों के साथ अन्याय है।

कुछ शिक्षाविदों का सुझाव है कि यूजीसी को एक व्यापक नीति बनानी चाहिए जो सभी छात्रों के हितों का ध्यान रखे। शिक्षा में समानता का मतलब सभी को समान अवसर देना है, न कि किसी को विशेष लाभ देना।

New UGC Bill 2026: अब क्या होगा

सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर होने के बाद अब देखना होगा कि सर्वोच्च न्यायालय इस मामले पर क्या फैसला सुनाता है। यह एक संवेदनशील मुद्दा है जो शिक्षा नीति और सामाजिक न्याय दोनों से जुड़ा है।

कोर्ट को यह तय करना होगा कि यूजीसी के नियम संविधान के समानता के सिद्धांत के अनुकूल हैं या नहीं। संविधान सभी नागरिकों को समान अधिकार और अवसर देने की बात करता है। यह भी संभव है कि सुप्रीम कोर्ट यूजीसी से इन नियमों में संशोधन करने को कहे ताकि सभी वर्गों को इसमें समान रूप से शामिल किया जा सके।

यह मामला भारतीय शिक्षा प्रणाली में समानता और आरक्षण की बहस को फिर से सामने ला सकता है। आने वाले दिनों में इस पर और चर्चा होने की संभावना है।

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