मेटा-व्हाट्सएप प्राइवेसी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 23 फरवरी तक टाली सुनवाई, 213 करोड़ के जुर्माने पर होगी बहस
CCI के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर अगली सुनवाई अगले हफ्ते
Meta-WhatsApp Privacy Case: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को मेटा प्लेटफॉर्म्स और व्हाट्सएप द्वारा दायर याचिकाओं पर सुनवाई को 23 फरवरी 2026 तक के लिए स्थगित कर दिया है। ये याचिकाएं भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (Competition Commission of India – CCI) के उस फैसले को चुनौती देती हैं जिसमें व्हाट्सएप की विवादास्पद प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर कंपनी पर 213.14 करोड़ रुपये का भारी जुर्माना लगाया गया था। यह मामला भारत में डेटा प्राइवेसी और बड़ी टेक कंपनियों की जवाबदेही से जुड़े महत्वपूर्ण सवाल उठाता है।
Meta-WhatsApp Privacy Case: क्या है पूरा मामला?
यह विवाद व्हाट्सएप की 2021 में लाई गई प्राइवेसी पॉलिसी से शुरू हुआ था। उस समय व्हाट्सएप ने अपनी प्राइवेसी पॉलिसी में बदलाव किया था जिसके तहत यूजर्स का डेटा मूल कंपनी मेटा (पूर्व में फेसबुक) के साथ साझा करने का प्रावधान किया गया था।
इस नई पॉलिसी के अनुसार, व्हाट्सएप यूजर्स की व्यक्तिगत जानकारी, मेटाडेटा और अन्य संवेदनशील डेटा को मेटा की अन्य सेवाओं जैसे फेसबुक और इंस्टाग्राम के साथ साझा कर सकता था। यूजर्स को इस नई पॉलिसी को स्वीकार करना अनिवार्य बना दिया गया था, वरना वे व्हाट्सएप का उपयोग नहीं कर सकते थे।
इस एकतरफा फैसले ने भारत समेत दुनियाभर में विवाद खड़ा कर दिया। लाखों यूजर्स ने अपनी प्राइवेसी के उल्लंघन की चिंता जताई और कई लोगों ने सिग्नल और टेलीग्राम जैसे अन्य मैसेजिंग ऐप्स की ओर रुख किया।
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग का फैसला
भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग (CCI) ने इस मामले की गहन जांच की और पाया कि व्हाट्सएप और मेटा ने अपनी प्रभावशाली बाजार स्थिति का दुरुपयोग किया है। CCI का मानना था कि यूजर्स को नई प्राइवेसी पॉलिसी स्वीकार करने के लिए बाध्य करना उचित प्रतिस्पर्धा के खिलाफ है।
आयोग ने पाया कि व्हाट्सएप ने अपने यूजर्स को कोई वास्तविक विकल्प नहीं दिया। यूजर्स के पास केवल दो ही विकल्प थे – या तो नई पॉलिसी स्वीकार करो या फिर व्हाट्सएप का उपयोग बंद कर दो। भारत में व्हाट्सएप के करोड़ों यूजर्स होने के कारण यह एक प्रकार से जबरदस्ती थी।
इन निष्कर्षों के आधार पर CCI ने व्हाट्सएप और मेटा पर 213.14 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया। यह जुर्माना कंपनी को भारतीय प्रतिस्पर्धा कानूनों के उल्लंघन और यूजर्स की प्राइवेसी से खिलवाड़ करने के लिए लगाया गया था।
Meta-WhatsApp Privacy Case: मेटा और व्हाट्सएप की चुनौती
CCI के फैसले से असंतुष्ट होकर मेटा प्लेटफॉर्म्स और व्हाट्सएप ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। कंपनियों ने अपनी याचिकाओं में CCI के फैसले को गलत और अनुचित बताया है।
मेटा और व्हाट्सएप का तर्क है कि उनकी प्राइवेसी पॉलिसी में बदलाव उचित थे और यूजर्स को पर्याप्त जानकारी दी गई थी। कंपनियों का कहना है कि वे अंतरराष्ट्रीय मानकों का पालन कर रही हैं और भारतीय कानूनों का कोई उल्लंघन नहीं किया गया है।
इसके अलावा, कंपनियों ने 213.14 करोड़ रुपये के जुर्माने को भी अत्यधिक और अनुचित बताया है। उनका मानना है कि यह जुर्माना उनके कथित उल्लंघन के अनुपात में बहुत अधिक है।
डेटा प्राइवेसी का महत्वपूर्ण मुद्दा
यह मामला सिर्फ एक कानूनी विवाद नहीं है, बल्कि भारत में डेटा प्राइवेसी और डिजिटल अधिकारों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल है। भारत में करोड़ों लोग व्हाट्सएप का उपयोग करते हैं और उनकी व्यक्तिगत जानकारी की सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण है।
डेटा प्राइवेसी विशेषज्ञों का मानना है कि बड़ी टेक कंपनियों को यूजर्स के डेटा के साथ मनमाने तरीके से व्यवहार करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। यूजर्स को यह अधिकार होना चाहिए कि वे तय करें कि उनका डेटा किसके साथ और कैसे साझा किया जाए।
दूसरी ओर, कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि नियामक संस्थाओं को भी यह ध्यान रखना चाहिए कि उनके फैसले इनोवेशन और व्यापार को प्रभावित न करें। संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है।
Meta-WhatsApp Privacy Case: भारत में डेटा संरक्षण कानून की आवश्यकता
यह मामला भारत में एक व्यापक और प्रभावी डेटा संरक्षण कानून की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है। हालांकि भारत में डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट पारित किया गया है, लेकिन इसके नियमों को अभी पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है।
एक मजबूत डेटा संरक्षण कानून यूजर्स को बेहतर सुरक्षा प्रदान कर सकता है और कंपनियों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश तय कर सकता है। इससे इस तरह के विवादों को कम किया जा सकता है।
अगली सुनवाई 23 फरवरी को
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 23 फरवरी 2026 को रखी है। उस दिन अदालत दोनों पक्षों की दलीलें सुनेगी और मामले की गहराई से समीक्षा करेगी।
यह देखना होगा कि सुप्रीम कोर्ट CCI के फैसले को बरकरार रखता है या फिर मेटा और व्हाट्सएप की याचिकाओं को स्वीकार करता है। अदालत का फैसला भारत में डेटा प्राइवेसी और टेक कंपनियों की जवाबदेही के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल कायम करेगा।
Meta-WhatsApp Privacy Case: यूजर्स के लिए क्या मायने रखता है?
व्हाट्सएप के करोड़ों भारतीय यूजर्स के लिए इस मामले का परिणाम बेहद महत्वपूर्ण है। अगर सुप्रीम कोर्ट CCI के फैसले को बरकरार रखता है, तो यह यूजर्स की प्राइवेसी के लिए एक बड़ी जीत होगी।
दूसरी ओर, अगर कोर्ट मेटा और व्हाट्सएप के पक्ष में फैसला सुनाता है, तो यूजर्स को अपने डेटा की प्राइवेसी के बारे में अधिक सतर्क रहना होगा। किसी भी स्थिति में, यूजर्स को यह समझना चाहिए कि उनका डेटा मूल्यवान है और उन्हें इसकी सुरक्षा के लिए सचेत रहना चाहिए।
टेक कंपनियों के लिए संदेश
यह मामला बड़ी टेक कंपनियों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश है कि वे भारतीय यूजर्स की प्राइवेसी को हल्के में नहीं ले सकतीं। भारत एक बड़ा और महत्वपूर्ण बाजार है और कंपनियों को यहां के कानूनों और नियमों का सम्मान करना होगा।
यूजर्स की सहमति और पारदर्शिता किसी भी डेटा संग्रहण और साझाकरण की नींव होनी चाहिए। कंपनियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि वे यूजर्स को पूरी जानकारी देते हैं और उन्हें वास्तविक विकल्प प्रदान करते हैं।
Meta-WhatsApp Privacy Case: निष्कर्ष
मेटा-व्हाट्सएप प्राइवेसी मामला भारत में डिजिटल युग के सबसे महत्वपूर्ण कानूनी विवादों में से एक है। 213.14 करोड़ रुपये के जुर्माने और प्राइवेसी पॉलिसी को लेकर यह लड़ाई डेटा संरक्षण, यूजर अधिकारों और टेक कंपनियों की जवाबदेही के व्यापक सवालों को उठाती है। 23 फरवरी को होने वाली अगली सुनवाई इस मामले में अहम मोड़ साबित हो सकती है।
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