LPG संकट से ऑटो कंपोनेंट उद्योग में मजदूरों का पलायन, मजदूर गांव लौट रहे हैं, फैक्ट्री कैंटीन बंद, ACMA ने भारी उद्योग मंत्रालय को लिखा पत्र,सरकार ने बनाई समिति

LPG की कमी से फैक्ट्री कैंटीन बंद, मजदूर गांव लौटे, ACMA ने सरकार से मदद मांगी।

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LPG Crisis: ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध के कारण एलपीजी आपूर्ति में आई रुकावट का असर अब सीधे भारत के ऑटो कंपोनेंट उद्योग पर पड़ने लगा है। एलपीजी सिलेंडर न मिलने से मजदूर खाना नहीं बना पा रहे और फैक्ट्री कैंटीन भी बंद हो गई हैं। इस कारण मजदूर अपने-अपने गांव लौटने लगे हैं। भारतीय वाहन कलपुर्जा विनिर्माता संघ यानी एसीएमए ने इसे गंभीर संकट बताते हुए भारी उद्योग मंत्रालय को पत्र लिखा है। एसीएमए 1,064 से अधिक कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है और ऑटो कंपोनेंट उद्योग का कुल कारोबार वित्त वर्ष 2024-25 में 80.2 अरब डॉलर रहा था।

एलपीजी संकट और ऑटो उद्योग – मुख्य तथ्य एक नजर में

विवरण जानकारी
प्रभावित उद्योग ऑटो कंपोनेंट विनिर्माण
प्रतिनिधि संगठन एसीएमए (ACMA)
एसीएमए की सदस्य कंपनियां 1,064 से अधिक
उद्योग का कुल कारोबार 80.2 अरब डॉलर (वित्त वर्ष 2024-25)
निर्यात 22.9 अरब डॉलर
व्यापार अधिशेष 50 करोड़ डॉलर
संकट का कारण ईरान युद्ध से एलपीजी आपूर्ति बाधित
मजदूरों पर असर गांव लौट रहे हैं
सरकार का कदम 9 मार्च को समिति गठित

मजदूर गांव क्यों लौट रहे हैं? पूरी कहानी

एसीएमए के महानिदेशक विन्नी मेहता ने इस संकट की पूरी तस्वीर खींची।

उन्होंने बताया कि मजदूर खाना पकाने के लिए पहले छोटे गैस बर्नर का इस्तेमाल करने लगे थे क्योंकि वायु प्रदूषण के कारण लकड़ी जलाने को हतोत्साहित किया जाता था। अब एलपीजी सिलेंडर की कमी के कारण उन्हें घर पर खाना बनाना मुश्किल हो रहा है।

इसके साथ-साथ कुछ फैक्ट्रियों की कैंटीन भी बंद हो गई हैं। कैंटीन बंद होने का कारण यही है कि वहां भी खाना पकाने के लिए कमर्शियल एलपीजी नहीं मिल रही। ऐसे में मजदूरों के सामने खाने का संकट खड़ा हो गया और वे अपने गांव लौटने पर मजबूर हो रहे हैं।

यह एक ऐसी श्रृंखला है जो ईरान युद्ध से शुरू होकर गैस आपूर्ति में बाधा, एलपीजी की कमी, फैक्ट्री कैंटीन बंद और अंततः मजदूर पलायन तक पहुंच रही है।

LPG Crisis: इंडस्ट्री को कमर्शियल एलपीजी क्यों नहीं मिल रही

सरकार ने पश्चिम एशिया संकट के कारण घरेलू स्तर पर उत्पादित प्राकृतिक गैस के आवंटन की प्राथमिकता सूची में बदलाव किया है।

सरकार घरेलू उपभोक्ताओं को पहले प्राथमिकता दे रही है। इसके कारण उद्योग को कमर्शियल एलपीजी नहीं मिल पा रही है। यह फैसला आम जनता को राहत देने के लिए तो सही है लेकिन उद्योगों के लिए एक बड़ी मुश्किल बन गया है।

कोविड जैसा नहीं लेकिन खतरनाक

एसीएमए ने सोमवार को स्पष्ट किया कि यह स्थिति कोविड महामारी जितनी मुश्किल नहीं है लेकिन अगर इसे जल्द हल नहीं किया गया तो यह और खराब हो सकती है।

कोविड में सरकार ने लॉकडाउन खोलकर स्थिति संभाली थी। लेकिन यह संकट एक अंतरराष्ट्रीय युद्ध से जुड़ा है जिसका समाधान सरकार के हाथ में पूरी तरह नहीं है। इसीलिए यह चिंताजनक है।

LPG Crisis: भारी उद्योग मंत्रालय को लिखा गया पत्र

एसीएमए ने पिछले हफ्ते भारी उद्योग मंत्रालय को एक महत्वपूर्ण पत्र लिखा।

पत्र में कहा गया कि यह उद्योग वैश्विक वाहन मूल्य श्रृंखलाओं के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है। मौजूदा भू-राजनीतिक उथल-पुथल के दौर में अगर समय पर सहायता मिलती है तो निर्यात की निरंतरता बनी रहेगी और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता भी सुरक्षित रहेगी।

यह पत्र इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऑटो कंपोनेंट उद्योग का 22.9 अरब डॉलर का निर्यात खतरे में पड़ सकता है।

सरकार का जवाब – समिति का गठन

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने 9 मार्च को एक समिति का गठन किया है। यह समिति उद्योग की शिकायतों और सुझावों पर विचार करेगी। हालांकि अभी तक कोई ठोस समाधान सामने नहीं आया है।

सरकार का कदम विवरण
समिति गठन 9 मार्च 2026
मंत्रालय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय
उद्देश्य उद्योग की शिकायतें सुनना
प्राथमिकता बदलाव घरेलू उपभोक्ता पहले

LPG Crisis: ऑटो कंपोनेंट उद्योग का महत्व – क्यों है यह संकट खतरनाक?

भारत का ऑटो कंपोनेंट उद्योग देश की अर्थव्यवस्था में एक अहम स्तंभ है।

वित्त वर्ष 2024-25 में इस उद्योग का कुल कारोबार 80.2 अरब डॉलर रहा था। इसमें 22.9 अरब डॉलर का निर्यात और 50 करोड़ डॉलर का व्यापार अधिशेष शामिल है। 1,064 से अधिक कंपनियां मिलकर संगठित क्षेत्र के 90 प्रतिशत से अधिक कारोबार का प्रतिनिधित्व करती हैं।

अगर मजदूर पलायन जारी रहा तो उत्पादन घटेगा। उत्पादन घटने से निर्यात प्रभावित होगा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारत की साख को नुकसान होगा।

उद्योग विशेषज्ञ की राय

ऑटो उद्योग विश्लेषक राजेश मेनन का कहना है कि एलपीजी संकट का ऑटो कंपोनेंट उद्योग पर यह असर एक चेतावनी है। यह उद्योग लाखों कामगारों को रोजगार देता है और भारत के मैन्युफैक्चरिंग निर्यात में बड़ा योगदान करता है। सरकार को घरेलू और औद्योगिक दोनों जरूरतों के बीच संतुलन बनाना होगा नहीं तो मेक इन इंडिया की छवि को नुकसान पहुंच सकता है।

LPG Crisis: निष्कर्ष

एलपीजी संकट का असर अब सिर्फ रसोई तक सीमित नहीं रहा बल्कि यह देश के महत्वपूर्ण उद्योगों तक फैल गया है। ऑटो कंपोनेंट उद्योग में मजदूरों का पलायन एक गंभीर चेतावनी है। सरकार को घरेलू और औद्योगिक दोनों जरूरतों के बीच जल्द संतुलन बनाना होगा। अगर यह संकट लंबा खिंचा तो भारत के 22.9 अरब डॉलर के ऑटो कंपोनेंट निर्यात पर बुरा असर पड़ सकता है जो देश की अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह होगा।

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