Budget 2026 से पहले धराशायी हुआ भारतीय रुपया, डॉलर के मुकाबले रिकॉर्ड 92 के निचले स्तर पर पहुंचा, विदेशी पूंजी प्रवाह में कमी और टैरिफ चिंताओं से दबाव

भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 91.98 पर, FII बहिर्गमन, अमेरिकी टैरिफ और तेल कीमतों से दबाव; RBI हस्तक्षेप, 94 तक गिरावट संभावित

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Budget 2026: केंद्रीय बजट 2026-27 की प्रस्तुति से मात्र दो दिन पूर्व भारतीय रुपये में भारी गिरावट दर्ज की गई है। गुरुवार, 29 जनवरी 2026 को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर लगभग 92 रुपये (91.98) तक गिर गया। इस गिरावट ने पिछले सर्वकालिक निम्नतम स्तर 91.9650 को भी पीछे छोड़ दिया। विदेशी पूंजी प्रवाह में निरंतर कमजोरी, अमेरिकी टैरिफ की चिंताएं और हेजिंग की होड़ ने मजबूत घरेलू आर्थिक संकेतकों के बावजूद रुपये पर भारी दबाव डाला है।

रुपये की ऐतिहासिक गिरावट

गुरुवार को इंटरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 91.45 पर खुला और प्रारंभ में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 91.41 के इंट्राडे उच्चतम स्तर को छू लिया। हालांकि यह राहत अल्पकालिक साबित हुई और रुपया शीघ्र ही दबाव में आ गया।

दिन के कारोबार के दौरान रुपया 92.00 के अब तक के सबसे निचले इंट्राडे स्तर तक गिर गया। अंततः यह दिन के लिए 91.88 (अस्थायी) के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ, जो पिछले समापन स्तर से 30 पैसे की गिरावट को दर्शाता है।

यह उल्लेखनीय है कि मात्र छह ट्रेडिंग सत्र पूर्व रुपया पहली बार 91 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया था और अब यह तेजी से 92 की ओर बढ़ गया है।

Budget 2026: गिरावट के प्रमुख कारण

Budget 2026
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1. विदेशी पूंजी का निरंतर बहिर्गमन

विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा भारतीय बाजारों से निरंतर पूंजी निकासी रुपये पर दबाव का प्रमुख कारण है। विदेशी निवेशक भारतीय इक्विटी और ऋण बाजारों से धन निकाल रहे हैं जो रुपये की मांग को कम कर रहा है।

2. कमजोर घरेलू शेयर बाजार

भारतीय शेयर बाजारों में भी कमजोरी देखी गई है जो विदेशी निवेशकों की चिंता को बढ़ाती है और पूंजी बहिर्गमन को तेज करती है।

3. कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि

अंतर्राष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि ने भारत के व्यापार घाटे की चिंताओं को बढ़ाया है। भारत अपनी तेल आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है और उच्च तेल कीमतें डॉलर की मांग बढ़ाती हैं।

4. अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में उछाल

अमेरिकी ट्रेजरी प्रतिफल में वृद्धि ने डॉलर को आकर्षक बना दिया है, जिससे उभरते बाजारों की मुद्राओं से पूंजी अमेरिका की ओर प्रवाहित हो रही है।

5. हेजिंग दबाव

आयातकर्ता और व्यवसाय आगे की गिरावट से बचने के लिए हेजिंग कर रहे हैं, जो डॉलर की मांग को और बढ़ा रहा है।

अमेरिकी टैरिफ का प्रभाव

गोल्डमैन सैक्स के विश्लेषकों ने अपने एक नोट में महत्वपूर्ण टिप्पणी की: “हमें उम्मीद है कि भारतीय निर्यात पर मौजूदा उच्च अमेरिकी टैरिफ अंततः कम हो जाएंगे, लेकिन इस बीच हो रही देरी भारत के बाह्य संतुलन पर दबाव डाल रही है।”

अगस्त 2025 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत के व्यापारिक निर्यात पर भारी टैरिफ लगाने की घोषणा के बाद से रुपये में लगभग 5% की गिरावट आई है। यह टैरिफ भारत के निर्यात को महंगा बना रहे हैं और व्यापार संतुलन को नकारात्मक रूप से प्रभावित कर रहे हैं।

Budget 2026: वर्ष 2026 में अब तक की गिरावट

इस वर्ष अब तक भारतीय मुद्रा में लगभग 2% की गिरावट दर्ज की गई है। अगस्त 2025 के बाद से देखें तो गिरावट लगभग 5% है, जो रुपये पर निरंतर दबाव को दर्शाता है।

मजबूत GDP के बावजूद दबाव

विडंबना यह है कि यह गिरावट तब हुई है जब आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार 30 सितंबर 2025 को समाप्त तिमाही में भारत की GDP में 8.2% की मजबूत वृद्धि दर्ज की गई थी। यह दर्शाता है कि वैश्विक कारक और विदेशी निवेशकों की धारणा घरेलू आर्थिक मजबूती से अधिक प्रभावशाली हो रही है।

Budget 2026: भारतीय रिजर्व बैंक का हस्तक्षेप

ट्रेडर्स के अनुसार भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने गुरुवार को स्थानीय स्पॉट मार्केट खुलने से पूर्व संभवतः हस्तक्षेप किया। एक विदेशी बैंक के ट्रेडर ने बताया कि यह हस्तक्षेप संभवतः गिरावट को धीमा करने के उद्देश्य से किया गया क्योंकि रुपया मनोवैज्ञानिक रूप से महत्वपूर्ण 92 के स्तर के निकट पहुंच रहा था।

भारतीय रिजर्व बैंक ने स्पष्ट किया है कि वह मुद्रा के किसी विशेष स्तर या बैंड को लक्षित नहीं करता और केवल अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए हस्तक्षेप करता है। बैंक का उद्देश्य व्यवस्थित बाजार सुनिश्चित करना है, न कि कोई विशिष्ट विनिमय दर बनाए रखना।

आगामी 12 महीनों का अनुमान

गोल्डमैन सैक्स ने अपने विश्लेषण में अनुमान लगाया है कि अगले 12 महीनों में रुपया और गिरकर 94 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच सकता है। यह अनुमान निम्नलिखित कारकों पर आधारित है:

  • अमेरिकी टैरिफ की अनिश्चितता

  • विदेशी पूंजी प्रवाह में संभावित कमी

  • वैश्विक आर्थिक परिदृश्य

  • अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति

Budget 2026: व्यापक आर्थिक प्रभाव

रुपये की गिरावट के व्यापक आर्थिक प्रभाव हैं:

आयात महंगा: डॉलर में मूल्यवर्गित वस्तुओं जैसे कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी महंगी हो जाती हैं।

मुद्रास्फीति दबाव: आयातित वस्तुओं की बढ़ती लागत घरेलू मुद्रास्फीति को बढ़ा सकती है।

विदेशी ऋण भार: डॉलर में लिए गए ऋणों की चुकौती महंगी हो जाती हैं।

निर्यातकों को लाभ: हालांकि निर्यातक कुछ लाभ प्राप्त कर सकते हैं क्योंकि उनके उत्पाद अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सस्ते हो जाते हैं।

निष्कर्ष

बजट 2026 से पहले रुपये की यह ऐतिहासिक गिरावट भारतीय अर्थव्यवस्था के समक्ष चुनौतियां प्रस्तुत करती है। वित्त मंत्री को शनिवार को प्रस्तुत होने वाले बजट में इन चिंताओं को संबोधित करने की आवश्यकता होगी।

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