भारत ने जंग के बीच बचाई 183 ईरानी नाविकों की जान! कोच्चि में IRIS लावन को शरण दी, जयशंकर ने खोला पूरा राज — “मानवता सर्वोपरि, हिंद महासागर में हम नेट सिक्योरिटी प्रोवाइडर”
ईरानी युद्धपोत IRIS लावन को कोच्चि में शरण, 183 क्रू मेंबर्स सुरक्षित, जयशंकर बोले — "मानवता के आधार पर लिया फैसला"
S Jaishankar statement: मध्य-पूर्व की जंग की आग जब हिंद महासागर तक पहुंची, तो भारत ने एक ऐसा फैसला लिया जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींच लिया। ईरान के युद्धपोत IRIS लावन को कोच्चि बंदरगाह पर शरण देकर भारत ने 183 नाविकों की जिंदगी बचाई। इस फैसले पर जब सवाल उठे तो विदेश मंत्री डॉ. एस. जयशंकर ने रायसीना डायलॉग 2026 में सारे पर्दे हटा दिए और बताया कि भारत ने आखिर यह कदम क्यों उठाया।
S Jaishankar statement: IRIS लावन कोच्चि कैसे पहुंचा, जानिए पूरी कहानी
यह पूरी घटना तब शुरू हुई जब भारत के इंटरनेशनल फ्लीट रिव्यू और MILAN 2026 कार्यक्रम में भाग लेने के लिए फरवरी महीने में कई देशों के युद्धपोत भारत आए थे। ईरान का युद्धपोत IRIS लावन भी इसी कार्यक्रम में शामिल होने के लिए भारत आया था। यह कार्यक्रम 15 से 25 फरवरी के बीच आयोजित हुआ था। लेकिन इसी दौरान मध्य-पूर्व में हालात तेजी से बिगड़ने लगे। अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले तेज कर दिए और इस क्षेत्र में भयानक तनाव पैदा हो गया। इन्हीं परिस्थितियों में ईरान का एक अन्य युद्धपोत IRIS डेना अमेरिकी नौसेना के हमले का शिकार हो गया। अमेरिकी नौसेना ने श्रीलंका के पास इस जहाज को निशाना बनाया जिसमें कई ईरानी नाविक मारे गए।
S Jaishankar statement: डिस्ट्रेस सिग्नल से शुरू हुई बचाव की मुहिम
जब IRIS डेना पर हमला हुआ तब श्रीलंका के मैरिटाइम रेस्क्यू कोऑर्डिनेशन सेंटर यानी MRCC को जहाज की तरफ से डिस्ट्रेस सिग्नल मिला। इस आपातकालीन संकेत पर तुरंत कार्रवाई हुई और भारतीय नौसेना भी राहत एवं बचाव कार्य में कूद पड़ी। भारत की इस त्वरित कार्रवाई से कई ईरानी नाविकों की जान बच सकी। इसी बीच IRIS लावन में तकनीकी खराबी आ गई। जहाज के इंजन में गड़बड़ी की वजह से वह आगे बढ़ने की स्थिति में नहीं था। ऊपर से तनाव इस कदर बढ़ चुका था कि जहाज का वापस लौटना भी खतरे से खाली नहीं था। इन हालात में ईरान सरकार ने 28 फरवरी को औपचारिक रूप से भारत से अनुरोध किया कि IRIS लावन को कोच्चि में ठहरने की अनुमति दी जाए।
S Jaishankar statement: भारत ने 24 घंटे के भीतर लिया फैसला
भारत सरकार ने यह अनुरोध मिलने के बाद तेजी से काम किया। 1 मार्च को भारत ने ईरान के इस अनुरोध को मंजूरी दे दी। इसके कुछ दिनों बाद IRIS लावन कोच्चि पहुंचा और 4 मार्च को उसने बंदरगाह पर डॉकिंग कर ली। जहाज पर सवार 183 क्रू मेंबर, जिनमें कई युवा कैडेट भी शामिल थे, अब कोच्चि में पूरी तरह सुरक्षित हैं। भारत के इस त्वरित निर्णय ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक सकारात्मक संदेश दिया है कि संकट के समय मानवीय सहायता सर्वोपरि है और भारत अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझता है।
S Jaishankar statement: जयशंकर बोले, “हमने सही किया”
रायसीना डायलॉग 2026 के मंच पर जब विदेश मंत्री जयशंकर से इस फैसले के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बिना किसी हिचकिचाहट के कहा कि भारत ने जो किया वह बिल्कुल सही था। उन्होंने कहा कि ये नाविक फ्लीट रिव्यू में भाग लेने आए थे और अचानक हालात बदल जाने की वजह से एक बेहद कठिन परिस्थिति में फंस गए। जयशंकर ने कहा कि भारत ने इस पूरे मामले को मानवता के नजरिए से देखा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि यह निर्णय अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून और संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि के पूर्णत: अनुरूप है। उन्होंने कहा कि मानवीय कर्तव्य से पीछे नहीं हटा जा सकता।
S Jaishankar statement: सोशल मीडिया के हंगामे को किया खारिज
इस फैसले पर सोशल मीडिया पर काफी बहस छिड़ गई थी। कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि जब अमेरिका और ईरान के बीच जंग छिड़ी हो, तो भारत को ईरानी युद्धपोत को शरण क्यों देनी चाहिए। जयशंकर ने इन सवालों को खारिज करते हुए हिंद महासागर की असली तस्वीर सामने रखी। उन्होंने याद दिलाया कि डिएगो गार्सिया पर पिछले 50 सालों से अमेरिकी सैन्य अड्डा मौजूद है। जिबूती में कई देशों के विदेशी सैन्य ठिकाने काम कर रहे हैं। इसके अलावा हम्बनटोटा बंदरगाह भी चर्चित रहा है। जयशंकर ने इन सभी उदाहरणों के जरिए यह समझाया कि हिंद महासागर में ऐसी मौजूदगी कोई नई बात नहीं है।
S Jaishankar statement: खाड़ी में एक करोड़ भारतीयों की सुरक्षा भी प्राथमिकता
जयशंकर ने एक और अहम पहलू उठाया जो अक्सर नजरअंदाज हो जाता है। उन्होंने कहा कि इस समय खाड़ी देशों में लगभग एक करोड़ भारतीय नागरिक रह रहे हैं। इसके अलावा जंग के दौरान कई मालवाहक जहाजों पर भारतीय नाविक काम कर रहे हैं जो इस संघर्ष की जद में आ सकते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की प्राथमिकता अपने नागरिकों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति की निरंतरता और आर्थिक हितों की रक्षा करना है। इस लिहाज से हिंद महासागर में शांति और स्थिरता बनाए रखना भारत के लिए बेहद जरूरी है।
S Jaishankar statement: “भारत के साथ चलो, फायदे में रहोगे”
रायसीना डायलॉग में जयशंकर ने भारत की बढ़ती ताकत और उसकी क्षेत्रीय भूमिका पर भी जोरदार बात रखी। उन्होंने कहा कि भारत पिछले एक दशक से हिंद महासागर क्षेत्र में व्यापार और कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए एक पूरा इकोसिस्टम तैयार कर रहा है। इसमें संसाधन, परियोजनाएं और दीर्घकालिक प्रतिबद्धताएं शामिल हैं। उन्होंने साफ कहा कि जो देश और क्षेत्रीय भागीदार भारत के साथ मिलकर काम करेंगे, उन्हें सबसे अधिक फायदा होगा। जयशंकर ने यह भी कहा कि भारत का उत्थान उसकी अपनी ताकत और क्षमता पर टिका है, किसी दूसरे की कमजोरी या गलतियों पर नहीं।
S Jaishankar statement: भारत की नीति बोलती है, तटस्थ रहते हुए मानवता का साथ
IRIS लावन प्रकरण दरअसल भारत की उस विदेश नीति की एक झलक है जिसमें वह किसी भी गुट में शामिल हुए बिना अपने राष्ट्रीय हित और मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखता है। ईरान और अमेरिका दोनों के साथ भारत के संबंध महत्वपूर्ण हैं। ऐसे में एक कठिन वक्त में मानवता के आधार पर लिया गया यह फैसला भारत की कूटनीतिक परिपक्वता को दर्शाता है। जयशंकर का यह बयान यह भी बताता है कि भारत अब केवल एक दर्शक नहीं है, वह इस क्षेत्र में एक जिम्मेदार और सक्षम शक्ति के रूप में उभर रहा है जो संकट के समय भी सही और साहसी निर्णय लेने से नहीं हिचकता।
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