ममता बनर्जी के खिलाफ ED ने खोला नया मोर्चा, सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुई रिट याचिका

तीन अधिकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार और तलाशी में बाधा डालने के गंभीर आरोप

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I-Pac Case: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवर्तन निदेशालय के बीच टकराव अब देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया है। ED ने सोमवार को ममता बनर्जी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक रिट याचिका दाखिल की है। इस याचिका में बेहद गंभीर आरोप लगाए गए हैं। केंद्रीय एजेंसी ने अपनी याचिका में कहा है कि उसके तीन अधिकारियों को धमकाया गया और जांच कार्य में जानबूझकर बाधा डाली गई। यह पूरा मामला कोलकाता में 8 जनवरी को हुई तलाशी से जुड़ा हुआ है।

8 जनवरी को क्या हुआ था?

I-Pac Case
I-Pac Case

8 जनवरी 2026 को प्रवर्तन निदेशालय की एक टीम कोलकाता में तलाशी अभियान पर निकली थी। यह तलाशी एक बड़े घोटाले की जांच के सिलसिले में की जा रही थी। ED के अधिकारी एक संदिग्ध व्यक्ति के आवास पर पहुंचे और जांच शुरू की। लेकिन इसी दौरान कुछ ऐसी घटनाएं हुईं जिन्होंने इस मामले को एक नया मोड़ दे दिया।

प्रतीक जैन के घर पर छापा

ED की टीम प्रतीक जैन (I-Pac Case) नाम के एक व्यक्ति के घर पर तलाशी लेने पहुंची थी। जांच के दौरान अधिकारियों ने कई दस्तावेज, लैपटॉप और मोबाइल फोन जब्त किए। यह सामग्री जांच के लिए बेहद महत्वपूर्ण थी। लेकिन फिर जो हुआ वह ED के अनुसार पूरी तरह से अप्रत्याशित और चौंकाने वाला था।

I-Pac Case: दोपहर 12 बजे पहुंचीं मुख्यमंत्री

ED की याचिका में दावा किया गया है कि दोपहर 12 बजकर 5 मिनट पर ममता बनर्जी खुद वहां पहुंच गईं। उनके साथ 100 से अधिक पुलिसकर्मी थे। मुख्यमंत्री ने घर में प्रवेश किया और ED अधिकारियों से सवाल-जवाब किए। इस पूरी घटना में ED की तलाशी प्रक्रिया बाधित हो गई।

जब्त सामग्री ले जाने का आरोप

सबसे गंभीर आरोप यह है कि ED द्वारा जब्त की गई सामग्री को जबरन वापस ले लिया गया। याचिका में कहा गया है कि लैपटॉप, मोबाइल फोन और दस्तावेज एक ट्रक में रखकर ले जाए गए। यह सामग्री जांच के लिए बेहद जरूरी थी। इसे ले जाने से पूरी जांच प्रक्रिया पर असर पड़ा है।

I-Pac Case: ED की याचिका में क्या आरोप हैं?

प्रवर्तन निदेशालय ने अपनी याचिका में कई गंभीर बातें कही हैं। केंद्रीय एजेंसी ने ममता बनर्जी, पश्चिम बंगाल के डीजीपी राजीव कुमार और कोलकाता पुलिस कमिश्नर मनोज वर्मा के खिलाफ आरोप लगाए हैं।

तलाशी में बाधा का आरोप

ED का कहना है कि मुख्यमंत्री और पुलिस के शीर्ष अधिकारियों ने जबरन तलाशी कार्यवाही (I-Pac Case) में हस्तक्षेप किया। कानूनी प्रक्रिया को बीच में ही रोक दिया गया। यह एक केंद्रीय जांच एजेंसी के काम में प्रत्यक्ष रुकावट है जो बेहद गंभीर मामला बनता है।

अधिकारियों को धमकाने का दावा

याचिका में यह भी आरोप है कि ED के तीन अधिकारियों को धमकाया गया और उनके साथ गलत व्यवहार किया गया। इन अधिकारियों की ओर से ही यह याचिका दाखिल की गई है। वे कोलकाता में तलाशी के दौरान मौजूद थे और उन्हें कथित तौर पर प्रतिबंधित करने की कोशिश की गई।

I-Pac Case: CBI जांच की मांग

ED ने अपनी याचिका में CBI जांच की मांग भी की है। केंद्रीय एजेंसी चाहती है कि इस पूरे मामले में ममता बनर्जी, डीजीपी राजीव कुमार और सीपी मनोज वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज की जाए और CBI से जांच कराई जाए। यह मांग दिखाती है कि ED इस मामले को कितना गंभीर मानती है।

कोयला घोटाले का पृष्ठभूमि

यह पूरा मामला पश्चिम बंगाल में हुए एक बड़े कोयला घोटाले (I-Pac Case) से जुड़ा है। यह घोटाला करीब 2742 करोड़ रुपये का बताया जा रहा है। ED इस मामले की जांच कर रही है और कई लोगों से पूछताछ कर चुकी है।

कैसे हुआ यह घोटाला

कोयला घोटाले (I-Pac Case) में अवैध खनन और कोयले की तस्करी शामिल है। आरोप है कि कोयले का अवैध कारोबार किया गया और करोड़ों रुपये की धोखाधड़ी हुई। ED ने इस मामले में कई छापेमारी की हैं और कई लोगों के नाम सामने आए हैं। 8 जनवरी की तलाशी भी इसी जांच का हिस्सा थी।

राजनीतिक संवेदनशीलता

यह मामला राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है। पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की सरकार है। ममता बनर्जी TMC की प्रमुख हैं। केंद्र में भाजपा की सरकार है। इसलिए इस मामले को राजनीतिक चश्मे से भी देखा जा रहा है। TMC का आरोप है कि केंद्र राजनीतिक प्रतिशोध ले रहा है।

कलकत्ता हाईकोर्ट में भी हंगामा

इस मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट में भी सुनवाई हुई थी। लेकिन वहां भी विवाद हुआ। ED की याचिका के अनुसार TMC समर्थकों ने कोर्ट की कार्यवाही को प्रभावित करने की कोशिश की।

याचिका में दावा किया गया है कि व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए TMC समर्थकों को संदेश भेजे गए। उन्हें कोर्ट में पहुंचने के लिए कहा गया। फिर सुनवाई से पहले सुनियोजित तरीके से हंगामा किया गया। कोर्ट में भारी भीड़ जमा हो गई और अफरातफरी का माहौल बन गया।

I-Pac Case: सुनवाई टालनी पड़ी

इस हंगामे के कारण कलकत्ता हाईकोर्ट को सुनवाई टालनी पड़ी। यह एक गंभीर बात है क्योंकि अदालत की कार्यवाही में बाधा डालना अदालत की अवमानना मानी जाती है। ED ने इसे भी अपनी याचिका में शामिल किया है।

I-Pac Case: TMC ने भी दाखिल की कैविएट

इस मामले में TMC और पश्चिम बंगाल सरकार भी सक्रिय हो गई है। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दाखिल की है। कैविएट का मतलब है कि अगर कोई पक्ष कोर्ट में कुछ दाखिल करे तो दूसरे पक्ष को भी सुना जाए।

पश्चिम बंगाल सरकार ने कहा है कि उसका भी पक्ष सुना जाना चाहिए। TMC का कहना है कि ED की कार्रवाई राजनीतिक प्रेरित थी। वे अपने बचाव में कई दलीलें देने की तैयारी कर रहे हैं। यह मामला अब कानूनी लड़ाई का रूप ले चुका है।

ED और TMC के बीच लंबा विवाद

यह पहली बार नहीं है जब ED और पश्चिम बंगाल सरकार आमने-सामने आई हैं। पिछले कुछ वर्षों में कई मौकों पर दोनों के बीच टकराव हुआ है। ED ने पश्चिम बंगाल में कई बार छापेमारी की है। TMC नेताओं और उनसे जुड़े लोगों के खिलाफ कई मामले चल रहे हैं। हर बार TMC ने इसे राजनीतिक हमला बताया है। ED का कहना है कि वह सिर्फ अपना कानूनी काम कर रही है।

I-Pac Case: दिल्ली में विरोध प्रदर्शन

इस मामले में TMC के सांसदों ने दिल्ली में विरोध प्रदर्शन भी किया था। उन्होंने ED की कार्रवाई को गलत बताया और केंद्र सरकार पर आरोप लगाए। कई TMC सांसदों को हिरासत में भी लिया गया था। यह विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है।

I-Pac Case: राजनीतिक गलियारों में प्रतिक्रिया

इस ताजा घटनाक्रम पर देशभर के राजनीतिक गलियारों में चर्चा हो रही है। विपक्षी दल केंद्र सरकार पर जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगा रहे हैं। भाजपा का कहना है कि कानून सबके लिए समान है। भाजपा नेताओं ने कहा है कि अगर किसी ने गलत काम किया है तो उसे सजा मिलनी चाहिए। चाहे वह कोई भी हो। उनका कहना है कि जांच एजेंसियों को अपना काम करने देना चाहिए। किसी को भी कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता।

विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार पर आरोप लगाया है कि ED और CBI का इस्तेमाल राजनीतिक विरोधियों को डराने के लिए किया जा रहा है। उनका कहना है कि जो दल केंद्र सरकार के खिलाफ बोलते हैं उन्हें निशाना बनाया जाता है। यह लोकतंत्र के लिए खतरा है।

कानूनी विशेषज्ञों की राय

कानूनी जानकारों ने इस मामले पर अपनी राय दी है। उनका कहना है कि यह एक जटिल मामला है जिसमें कई कानूनी पहलू शामिल हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ED को कानून के तहत तलाशी और जब्ती के अधिकार हैं। अगर उसकी कार्रवाई में बाधा डाली गई है तो यह गंभीर मामला है। जांच एजेंसियों को बिना किसी दबाव के काम करने का हक है।

मुख्यमंत्री की भूमिका पर सवाल

कुछ विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि मुख्यमंत्री का खुद तलाशी स्थल पर पहुंचना असामान्य है। आमतौर पर ऐसे मामलों में प्रशासनिक अधिकारी ही मौजूद रहते हैं। मुख्यमंत्री की उपस्थिति से कई सवाल खड़े होते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में क्या होगा?

अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में है। देश की सर्वोच्च अदालत दोनों पक्षों को सुनेगी और फिर फैसला देगी। यह प्रक्रिया में समय लग सकता है। सुप्रीम कोर्ट जल्द ही इस मामले की सुनवाई करेगा। ED और पश्चिम बंगाल सरकार दोनों अपना-अपना पक्ष रखेंगे। अदालत सभी तथ्यों और साक्ष्यों का अध्ययन करेगी। फिर कानून के अनुसार फैसला सुनाएगी।

संभावित परिणाम

अगर सुप्रीम कोर्ट ED के पक्ष में फैसला देता है तो ममता बनर्जी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। CBI जांच का आदेश हो सकता है। वहीं अगर कोर्ट पश्चिम बंगाल सरकार के पक्ष में फैसला देता है तो यह ED के लिए झटका होगा। फिलहाल दोनों पक्ष अदालत के फैसले का इंतजार कर रहे हैं।

जनता की प्रतिक्रिया

आम लोगों में भी इस मामले को लेकर अलग-अलग राय है। कुछ लोगों का मानना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। दूसरे लोगों को लगता है कि यह राजनीतिक खेल है।

सोशल मीडिया पर बहस

सोशल मीडिया पर इस मुद्दे पर जमकर बहस हो रही है। लोग अपनी-अपनी राय रख रहे हैं। कुछ लोग ममता बनर्जी का समर्थन कर रहे हैं तो कुछ ED की कार्रवाई को सही बता रहे हैं। यह विवाद लगातार चर्चा में बना हुआ है।

निष्कर्ष:  ED द्वारा ममता बनर्जी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करना एक बड़ा कदम है। यह मामला केवल कानूनी नहीं बल्कि राजनीतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। तीन ED अधिकारियों के साथ कथित दुर्व्यवहार और तलाशी में बाधा के आरोप गंभीर हैं।

कोयला घोटाले की जांच अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस मामले की दिशा तय करेगा। दोनों पक्ष अपने-अपने दावे मजबूती से रख रहे हैं। अब देखना यह है कि देश की सर्वोच्च अदालत इस मामले में क्या फैसला सुनाती है। यह मामला जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता और राज्य सरकार के अधिकारों के बीच संतुलन का सवाल भी उठाता है। आने वाले दिनों में इस मामले में और भी घटनाक्रम देखने को मिल सकते हैं। फिलहाल पूरी नजर सुप्रीम कोर्ट पर टिकी है।

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