सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, सेना की महिला अधिकारियों को मिला स्थायी कमीशन और पेंशन का अधिकार, अनुच्छेद 142 के तहत भेदभावपूर्ण व्यवस्था खत्म, वर्षों से चल रहे संघर्ष को मिली न्यायिक मान्यता
सुप्रीम कोर्ट ने महिला सैन्य अधिकारियों को स्थायी कमीशन और पेंशन का अधिकार दिया
Supreme Court: भारतीय सेना में वर्षों से सेवा देने वाली महिला अधिकारियों के संघर्ष को आज सर्वोच्च न्यायालय ने उचित सम्मान दिया। यह कोई साधारण अदालती आदेश नहीं है बल्कि यह उन सैकड़ों महिला अधिकारियों के जीवन में एक नया अध्याय लिखने वाला फैसला है जो वर्षों तक देश की रक्षा में योगदान देने के बाद भी स्थायी कमीशन और पेंशन के अधिकार से वंचित रह गई थीं।
Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला क्या है और किस बेंच ने सुनाया?
भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस उज्ज्वल भुयान और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की तीन सदस्यीय संविधान पीठ ने यह निर्णय सुनाया। बेंच ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत मिले विशेष अधिकार का उपयोग करते हुए आदेश दिया कि महिला अधिकारियों को दिए गए स्थायी कमीशन में कोई हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा।
अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार देता है कि वह किसी भी मामले में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक आदेश जारी कर सके। इस अनुच्छेद का उपयोग तब किया जाता है जब मौजूदा कानूनी प्रावधान न्याय दिलाने के लिए पर्याप्त न हों।
Supreme Court: यह मामला कब और कैसे शुरू हुआ?
यह विवाद 2019 में हुए नीति परिवर्तन और सशस्त्र बल न्यायाधिकरण यानी आर्म्ड फोर्सेज ट्रिब्यूनल के पहले के निर्णयों के विरुद्ध दायर कई याचिकाओं से उपजा था। विंग कमांडर सुचेता इदान और अन्य महिला अधिकारियों ने याचिकाएं दायर कर स्थायी कमीशन से इनकार को चुनौती दी थी।
इन अधिकारियों का कहना था कि उन्हें शॉर्ट सर्विस कमीशन यानी एसएससी के आधार पर सेना में लिया गया था लेकिन बाद में स्थायी कमीशन की पात्रता होने के बावजूद उन्हें नीतिगत आधार पर अयोग्य करार दिया गया। यह मामला थल सेना, वायु सेना और नौसेना तीनों में सेवारत महिला अधिकारियों से जुड़ा था।
Supreme Court: वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में पक्षपात का मुद्दा क्या था?
फैसला सुनाते हुए मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने एक बेहद अहम बिंदु उठाया। उन्होंने कहा कि महिला अधिकारियों की वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट यानी एसीआर को अक्सर इस पूर्वाग्रह के साथ तैयार किया जाता था कि वे करियर में आगे नहीं बढ़ेंगी और स्थायी कमीशन के लिए पात्र नहीं मानी जाएंगी।
इस पूर्वाग्रह का सीधा असर उनकी समग्र मेरिट रैंकिंग पर पड़ा। चूंकि स्थायी कमीशन के लिए मेरिट ही प्रमुख आधार होता है इसलिए जानबूझकर कम ग्रेड की गई एसीआर ने उनके स्थायी कमीशन के दावे को कमजोर कर दिया। यह न केवल प्रक्रियागत अन्याय था बल्कि संस्थागत भेदभाव का एक स्पष्ट उदाहरण भी था।
Supreme Court: पेंशन का अधिकार कैसे और किसे मिलेगा?
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जिन महिला एसएससी अधिकारियों और हस्तक्षेपकर्ताओं को कार्यवाही के किसी भी चरण में सेवा से मुक्त किया गया था उन्हें यह माना जाएगा कि उन्होंने पेंशन के लिए आवश्यक न्यूनतम 20 वर्ष की सेवा पूरी कर ली है।
इसका अर्थ यह है कि भले ही किसी अधिकारी ने वास्तव में 20 साल सेवा न की हो, लेकिन जिस कारण से उन्हें हटाया गया वह कारण अनुचित और पक्षपातपूर्ण था, इसलिए उन्हें पेंशन का पूरा लाभ मिलेगा। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि वेतन का बकाया नहीं दिया जाएगा।
Supreme Court: इस फैसले का महिला सैन्य अधिकारियों पर क्या असर पड़ेगा?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय भारतीय सेना में महिलाओं की स्थिति को मजबूत करने वाला एक दूरगामी आदेश है। यह पहली बार नहीं है जब सर्वोच्च न्यायालय ने सेना में महिला अधिकारियों के हक में फैसला सुनाया हो। 2020 में भी शीर्ष अदालत ने महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन देने का आदेश दिया था।
इस बार का फैसला उन अधिकारियों के लिए विशेष महत्व रखता है जो अब तक पेंशन और सेवा लाभों से वंचित थीं। इससे सशस्त्र बलों में कार्यरत महिला अधिकारियों की एक बड़ी संख्या को वित्तीय सुरक्षा और सामाजिक सम्मान दोनों मिलेंगे।
Supreme Court: सेना में महिलाओं की स्थिति को लेकर पहले क्या हुआ था?
भारतीय सेना में महिलाओं को लंबे समय तक केवल सहायक और चिकित्सा भूमिकाओं तक सीमित रखा गया था। 1992 में पहली बार महिलाओं को शॉर्ट सर्विस कमीशन के तहत सेना में शामिल किया गया। तब से लेकर आज तक स्थायी कमीशन को लेकर विवाद चलता रहा है।
2020 में सर्वोच्च न्यायालय ने ऐतिहासिक फैसला देते हुए कहा था कि महिला अधिकारियों को स्थायी कमीशन से वंचित करना संविधान के समानता के अधिकार का उल्लंघन है। उस फैसले के बाद भी कुछ अधिकारियों को प्रक्रियागत कारणों से लाभ नहीं मिल पाया था जिनके लिए आज का यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण है।
निष्कर्ष
सर्वोच्च न्यायालय का यह फैसला केवल एक कानूनी आदेश नहीं है बल्कि यह उन सभी महिला अधिकारियों के प्रति न्याय की स्वीकृति है जिन्होंने वर्षों तक देश की सेवा की और बदले में भेदभाव का सामना किया। वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट में पक्षपात की स्वीकृति और उसके आधार पर पेंशन का हक देना यह दर्शाता है कि न्यायपालिका संस्थागत असमानता को पहचानने और उसे सुधारने में सक्षम है। यह फैसला आने वाली पीढ़ियों की महिला सैन्य अधिकारियों के लिए एक मजबूत नजीर बनेगा।
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