हरीश राणा की इच्छामृत्यु और फिल्म ‘गुजारिश’, 13 साल कोमा में रहे युवक को सुप्रीम कोर्ट ने दी मुक्ति, ऋतिक-ऐश्वर्या की 2010 की फिल्म हो गई सच, जानें पूरी कहानी

13 साल वेजिटेटिव स्टेट में रहे हरीश राणा को सुप्रीम कोर्ट ने दी इच्छामृत्यु की अनुमति, गुजारिश फिल्म जैसा मामला

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Guzaarish Movie: कुछ खबरें ऐसी होती हैं जो दिल को झकझोर देती हैं। गाजियाबाद के हरीश राणा की कहानी ऐसी ही है एक होनहार युवक जो पल भर में सब कुछ खो बैठा और 13 साल तक न जीने की स्थिति में रहा न मरने की। इस दर्दनाक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अब एक ऐतिहासिक और मानवीय फैसला सुनाया है जिसने पूरे देश को भावुक कर दिया है। कोर्ट ने हरीश का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की अनुमति दे दी है ताकि उन्हें इस अंतहीन पीड़ा से मुक्ति मिल सके। यह मामला संजय लीला भंसाली की 2010 में आई बॉलीवुड फिल्म ‘गुजारिश’ की याद दिला रहा है जिसमें ऋतिक रोशन और ऐश्वर्या राय ने भी ठीक ऐसे ही एक संवेदनशील विषय को पर्दे पर जीवंत किया था।

हरीश राणा – 13 साल की अंतहीन पीड़ा

हरीश राणा गाजियाबाद के रहने वाले थे। अगस्त 2013 में वे चंडीगढ़ में बीटेक की पढ़ाई कर रहे थे। एक दिन वे अपने पीजी की चौथी मंजिल से गिर गए। इस हादसे में उनके सिर पर इतनी गंभीर चोट आई कि वे वेजिटेटिव स्टेट में चले गए यानी ऐसी अवस्था जिसमें शरीर जीवित तो रहता है लेकिन मस्तिष्क काम करना बंद कर देता है।

हादसे से पहले हरीश एक होनहार छात्र थे। उन्हें जिम जाना और प्रतियोगिताओं में भाग लेना पसंद था। लेकिन उस एक पल ने उनके सारे सपनों और उनके माता-पिता की उम्मीदों को चूर-चूर कर दिया। 13 साल तक उनके माता-पिता ने अपने लाडले को बेड पर पड़ा देखा, हर दिन उसके ठीक होने की दुआ की। लेकिन जब लंबे इलाज के बाद भी कोई सुधार नहीं आया तो थक-हारकर उन्हें वह कदम उठाना पड़ा जो शायद दुनिया का सबसे कठिन फैसला होता है अपने ही बेटे के लिए कोर्ट से इच्छामृत्यु की मांग करना।

Guzaarish Movie: सुप्रीम कोर्ट का मानवीय फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक अत्यंत संवेदनशील और मानवीय फैसला सुनाया। कोर्ट ने AIIMS दिल्ली को निर्देश दिया कि हरीश का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की प्रक्रिया बहुत सावधानी से और योजनाबद्ध तरीके से की जाए। कोर्ट ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि इस पूरी प्रक्रिया में मरीज की गरिमा और सम्मान का पूरा ध्यान रखा जाए।

यह फैसला उन माता-पिता के लिए बेहद भारी है जिन्होंने 13 साल अपने बेटे को इस हाल में देखा और अंततः उसकी असहनीय पीड़ा को खत्म करने के लिए मौत की गुहार लगाई।

फिल्म ‘गुजारिश’ – जब बॉलीवुड ने उठाया था यही मुद्दा

हरीश राणा के इस केस ने 16 साल पुरानी बॉलीवुड फिल्म ‘गुजारिश’ की याद ताजा कर दी है। साल 2010 में संजय लीला भंसाली ने इसी विषय पर यह भावुक फिल्म बनाई थी।

फिल्म की कहानी ईथन मस्करेन्हा की है जिसे ऋतिक रोशन ने पर्दे पर जीवंत किया। ईथन एक प्रतिभाशाली जादूगर था जो एक दुर्घटना के बाद पूरी तरह लकवाग्रस्त हो जाता है। 14 साल तक बिस्तर पर रहने के बाद जब उसे लगा कि जीवन में अब सिर्फ दर्द ही बचा है तो उसने अदालत से अपनी जान खत्म करने की अनुमति मांगी।

फिल्म में ऐश्वर्या राय ने ईथन की समर्पित नर्स सोफिया की भूमिका निभाई। अदालत ईथन को इजाजत दे देती है और वह एक विदाई पार्टी आयोजित करता है। फिल्म का क्लाइमेक्स देखकर दर्शकों की आंखें भर आती हैं।

Guzaarish Movie: ‘गुजारिश’ को लेकर हुआ था भारी विवाद

जब 2010 में ‘गुजारिश’ रिलीज हुई थी तब इसे लेकर समाज में जोरदार बहस छिड़ गई थी। एक वकील ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर फिल्म का विरोध किया था। उनका तर्क था कि भारत में इच्छामृत्यु कानूनी नहीं है इसलिए ऐसी फिल्म दिखाना समाज में गलत संदेश दे सकता है।

हालांकि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर उम्मीद के मुताबिक सफल नहीं रही लेकिन इसने समाज को एक जरूरी और नाजुक विषय पर गंभीरता से सोचने के लिए मजबूर किया। बाद में संजय लीला भंसाली ने बताया था कि उन्होंने यह फिल्म किसी करीबी इंसान के दर्द को देखकर बनाई थी। यह फिल्म उनके दिल के बेहद करीब थी।

इच्छामृत्यु – क्या है भारत में कानूनी स्थिति

भारत में इच्छामृत्यु का मामला हमेशा से संवेदनशील और विवादास्पद रहा है। साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पैसिव यूथेनेशिया यानी निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सीमित परिस्थितियों में मान्यता दी थी। इसके तहत असाध्य रोग से पीड़ित या स्थायी रूप से वेजिटेटिव स्टेट में रहने वाले व्यक्ति का लाइफ सपोर्ट सिस्टम हटाने की अनुमति कुछ शर्तों के साथ दी जा सकती है।

हरीश राणा का मामला इसी श्रेणी में आता है। 13 साल से वेजिटेटिव स्टेट में रहने के बाद चिकित्सकीय दृष्टिकोण से उनके ठीक होने की कोई संभावना नहीं थी। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला 2018 के उस ऐतिहासिक निर्णय के अनुरूप है।

Guzaarish Movie: दो कहानियां – एक जैसा दर्द

‘गुजारिश’ का ईथन मस्करेन्हा काल्पनिक था लेकिन उसका दर्द असली था। हरीश राणा की कहानी वास्तविक है और उसका दर्द उससे भी ज्यादा गहरा। दोनों मामलों में एक समानता है, वर्षों तक असहनीय पीड़ा के बाद मृत्यु से मुक्ति की गुहार।

‘गुजारिश’ ने 2010 में जो सवाल उठाया था क्या किसी इंसान को सम्मान के साथ जीने का अधिकार है तो क्या उसे सम्मान के साथ मरने का अधिकार भी होना चाहिए, वह सवाल आज 2026 में हरीश राणा के मामले में फिर से सामने है। और इस बार जवाब भी मिला है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कानूनी दृष्टि से ऐतिहासिक है और मानवीय दृष्टि से बेहद दर्दनाक भी। एक बेटे को खोने की पीड़ा से उबर पाना माता-पिता के लिए असंभव है लेकिन उन्होंने अपने बेटे की पीड़ा को खत्म करने के लिए जो साहस दिखाया वह भी किसी से कम नहीं।

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