विदेश में उच्च शिक्षा का बढ़ता क्रेज, 2020 से 2024 के बीच भारतीय छात्रों की संख्या तीन गुना बढ़ी, अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और जर्मनी बने टॉप पसंद, बेहतर करियर, रिसर्च और ग्लोबल एक्सपोजर मुख्य कारण

2020-24 में तीन गुना वृद्धि, अमेरिका-कनाडा टॉप पसंद

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Indian students: एक दशक पहले तक विदेश में पढ़ाई करना केवल संपन्न परिवारों का सपना माना जाता था। आज यह सपना लाखों सामान्य भारतीय परिवारों के बच्चे पूरा कर रहे हैं और हर साल यह संख्या नया रिकॉर्ड बना रही है। यह बदलाव केवल आंकड़ों की कहानी नहीं है बल्कि यह भारत के युवाओं की बदलती सोच और वैश्विक महत्वाकांक्षाओं का जीवंत प्रमाण है।

Indian students: पिछले पांच वर्षों में विदेश जाने वाले भारतीय छात्रों के आंकड़े क्या कहते हैं?

सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 में केवल 2.6 लाख भारतीय छात्रों ने विदेश में उच्च शिक्षा के लिए प्रस्थान किया था। अगले ही वर्ष 2021 में यह संख्या बढ़कर 4.45 लाख हो गई।

2022 में यह आंकड़ा लगभग दोगुना होकर 7.52 लाख तक पहुंचा और 2023 में अब तक का सर्वाधिक 8.95 लाख का रिकॉर्ड बना। 2024 में यह संख्या 7.6 लाख रही जो 2023 की तुलना में थोड़ी कम है लेकिन वैश्विक स्तर पर वीजा नीतियों में बदलाव और आर्थिक कारणों को देखते हुए यह आंकड़ा भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

Indian students: भारतीय छात्र विदेश में पढ़ने क्यों जा रहे हैं?

शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार विदेशी विश्वविद्यालयों में शिक्षा की गुणवत्ता, अनुसंधान के अवसर और वैश्विक स्तर पर मान्यता प्राप्त डिग्री भारतीय छात्रों को सबसे अधिक आकर्षित करती है।

इसके अलावा विदेश में पढ़ाई के दौरान मिलने वाले कार्य अनुभव के अवसर, अंतरराष्ट्रीय पेशेवर नेटवर्क बनाने की संभावना और बेहतर वेतन वाली नौकरियां भी इस प्रवृत्ति को बढ़ावा दे रही हैं। भारत में प्रतिष्ठित संस्थानों में सीमित सीटें और बढ़ती प्रतिस्पर्धा भी कई छात्रों को विदेश की ओर धकेलती है।

Indian students: भारतीय छात्रों के लिए सबसे लोकप्रिय देश कौन से हैं?

अमेरिका और कनाडा पारंपरिक रूप से भारतीय छात्रों की पहली पसंद रहे हैं। इन देशों में विश्व स्तरीय विश्वविद्यालय, उन्नत अनुसंधान सुविधाएं और पढ़ाई के साथ काम करने के भरपूर अवसर उपलब्ध हैं।

ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड और कैम्ब्रिज जैसे प्रतिष्ठित संस्थान और अनेक छात्रवृत्ति योजनाएं छात्रों को आकर्षित करती हैं। वहीं ऑस्ट्रेलिया में भी बड़ी संख्या में भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए जाते हैं। इन चारों देशों के अलावा जर्मनी, रूस और उज्बेकिस्तान जैसे नए गंतव्य भी तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं।

Indian students: जर्मनी और अन्य यूरोपीय देश नई पसंद क्यों बन रहे हैं?

जर्मनी विशेष रूप से उन छात्रों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रहा है जो इंजीनियरिंग और तकनीकी क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करना चाहते हैं। जर्मनी के अधिकांश सरकारी विश्वविद्यालयों में ट्यूशन फीस नाममात्र है या बिल्कुल नहीं है जो इसे आर्थिक दृष्टि से बेहद आकर्षक बनाता है।

रूस में medical शिक्षा के लिए भारतीय छात्रों की लंबे समय से रुचि रही है जबकि उज्बेकिस्तान भी सस्ती मेडिकल शिक्षा के कारण भारतीय परिवारों में एक व्यावहारिक विकल्प के तौर पर उभरा है। यह विविधता दर्शाती है कि भारतीय छात्र अब केवल एक या दो देशों तक सीमित नहीं रहे बल्कि पूरी दुनिया उनके लिए अध्ययन का मैदान बन चुकी है।

Indian students: विदेश में पढ़ाई करना भारतीय परिवारों पर आर्थिक दृष्टि से कैसा असर डालता है?

विदेश में उच्च शिक्षा की लागत भारत की तुलना में काफी अधिक होती है। अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में प्रति वर्ष ट्यूशन फीस और रहने का खर्च मिलाकर कई लाख रुपये तक पहुंच सकता है।

हालांकि छात्रवृत्तियां, एजुकेशन लोन और पढ़ाई के दौरान अंशकालिक रोजगार इस बोझ को कुछ हद तक कम करते हैं। शिक्षा वित्त विशेषज्ञों के अनुसार विदेश से डिग्री प्राप्त करने के बाद मिलने वाले करियर अवसर और वेतन इस निवेश को दीर्घकाल में फायदेमंद साबित करते हैं जिस कारण परिवार यह जोखिम उठाने को तैयार रहते हैं।

Indian students: 2024 में संख्या घटी तो क्या यह रुझान कमजोर हो रहा है?

2024 में विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या 2023 के मुकाबले कम हुई लेकिन विशेषज्ञ इसे रुझान में गिरावट नहीं मानते। कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए वीजा नीतियों में सख्ती इसका प्रमुख कारण रही।

इसके अलावा कुछ देशों में छात्र वीजा के बाद काम करने के अधिकारों में बदलाव और बढ़ती रहने की लागत ने भी छात्रों को पुनर्विचार करने पर मजबूर किया। लेकिन समग्र दृष्टि से देखें तो 2020 की तुलना में 2024 की संख्या लगभग तीन गुना है जो इस रुझान की दीर्घकालिक मजबूती को स्पष्ट रूप से दर्शाती है।

निष्कर्ष

भारतीय छात्रों का विदेशी शिक्षा की ओर बढ़ता रुझान एक ऐसी सामाजिक और शैक्षणिक क्रांति का संकेत है जो देश के भविष्य को वैश्विक संदर्भ में नई पहचान दे रही है। 2020 से 2024 के बीच विदेश जाने वाले छात्रों की संख्या में तीन गुना वृद्धि यह बताती है कि भारत का युवा वर्ग अब सीमाओं से परे सोचता है।

यह प्रवृत्ति तब और भी अर्थपूर्ण हो जाती है जब हम देखते हैं कि छात्र केवल अमेरिका और ब्रिटेन तक सीमित नहीं हैं बल्कि जर्मनी, उज्बेकिस्तान और रूस जैसे नए विकल्प तलाश रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि भारत सरकार और शिक्षा संस्थान भी देश के भीतर ऐसा वातावरण तैयार करें जो विश्वस्तरीय प्रतिभाओं को यहीं रोक सके।

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