भारत ने चीन समेत सभी सीमावर्ती देशों के लिए FDI नियम किए आसान, 2020 का प्रेस नोट-3 बदला, गलवान के बाद से जमी बर्फ पिघलने के संकेत; जानें क्या होगा असर
प्रेस नोट-3 में बदलाव, चीन समेत पड़ोसी देशों को भारत में निवेश की नई छूट
FDI Policy: भारत सरकार ने मंगलवार को एक बड़ा आर्थिक फैसला लेते हुए चीन समेत उन सभी देशों के लिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी FDI के नियमों को आसान बना दिया है जो भारत के साथ भूमि सीमा साझा करते हैं। यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में लिया गया। इसके तहत 2020 में जारी प्रेस नोट-3 में संशोधन किया गया है। यह वही प्रेस नोट था जो जून 2020 में गलवान घाटी में भारत और चीन के सैनिकों के बीच हुई भीषण झड़प के बाद जारी किया गया था। उस समय चीनी निवेश पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने यह कदम उठाया था। अब करीब छह साल बाद इन नियमों में ढील देकर सरकार ने एक नई दिशा में कदम बढ़ाया है।
FDI Policy: क्या था प्रेस नोट-3 और क्यों लाया गया था?
साल 2020 में गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई हिंसक झड़प के बाद दोनों देशों के संबंधों में गहरी खटास आ गई थी। भारत ने उस समय कड़े कदम उठाते हुए टिकटॉक, वीचैट, अलीबाबा का यूसी ब्राउजर समेत 200 से ज्यादा चीनी मोबाइल ऐप पर प्रतिबंध लगा दिया था। इसी दौर में अप्रैल 2020 में प्रेस नोट-3 जारी किया गया था जिसके तहत भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों की कंपनियों या उनके शेयरधारकों वाली विदेशी कंपनियों को भारत में किसी भी क्षेत्र में निवेश करने से पहले सरकार से अनिवार्य रूप से पूर्व अनुमति लेनी होती थी। यह नियम मुख्य रूप से चीनी निवेश को नियंत्रित करने के लिए बनाया गया था लेकिन इसके दायरे में बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, म्यांमार और अफगानिस्तान भी आ गए थे।
अब उसी प्रेस नोट में बदलाव करके सरकार ने इन देशों के लिए निवेश की शर्तें आसान कर दी हैं।
किन देशों को मिलेगा फायदा?
भारत के साथ भूमि सीमा साझा करने वाले देशों में चीन, बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, म्यांमार और अफगानिस्तान शामिल हैं। नए नियमों के तहत इन सभी देशों के निवेशकों के लिए भारत में FDI लाना पहले से आसान हो जाएगा। हालांकि यह ध्यान देने वाली बात है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे देशों के साथ भारत के संबंध बेहद तनावपूर्ण हैं इसलिए व्यावहारिक रूप से इस फैसले का सबसे ज्यादा असर चीन, बांग्लादेश और नेपाल के संदर्भ में देखा जा रहा है।
FDI Policy: भारत में चीन का FDI – अब तक की स्थिति
अप्रैल 2000 से दिसंबर 2025 तक भारत में आए कुल FDI इक्विटी प्रवाह में चीन की हिस्सेदारी मात्र 0.32 फीसदी यानी 2.51 अरब अमेरिकी डॉलर रही है और FDI स्रोत देशों की सूची में चीन 23वें स्थान पर है। यह आंकड़ा बताता है कि 2020 के प्रतिबंधों के बाद चीन से सीधा निवेश बेहद सीमित रहा है। अब नियम आसान होने से यह स्थिति बदल सकती है।
भारत-चीन व्यापार का बड़ा असंतुलन
भले ही FDI में चीन की हिस्सेदारी बेहद कम रही हो लेकिन द्विपक्षीय व्यापार में चीन भारत का दूसरा सबसे बड़ा साझेदार बन चुका है। नीचे दी गई तालिका इस व्यापार की पूरी तस्वीर सामने रखती है।
| वित्त वर्ष | भारत का चीन को निर्यात | भारत का चीन से आयात | व्यापार घाटा |
|---|---|---|---|
| 2023-24 | 16.66 अरब डॉलर | 101.73 अरब डॉलर | 85 अरब डॉलर |
| 2024-25 | 14.25 अरब डॉलर (-14.5%) | 113.45 अरब डॉलर (+11.52%) | 99.2 अरब डॉलर |
| 2025-26 (अप्रैल-जनवरी) | 15.88 अरब डॉलर (+38.37%) | 108.18 अरब डॉलर (+13.82%) | 92.3 अरब डॉलर |
इस तालिका से साफ है कि भारत और चीन के बीच व्यापार घाटा बढ़ता जा रहा है। 2024-25 में यह घाटा 99.2 अरब डॉलर तक पहुंच गया जो 2023-24 के 85 अरब डॉलर से काफी ज्यादा है। चालू वित्त वर्ष के पहले दस महीनों में निर्यात में तेजी आई है लेकिन आयात उससे कहीं ज्यादा तेज रफ्तार से बढ़ रहा है। यह असंतुलन भारत के लिए एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
FDI Policy: FDI नियम आसान करने के पीछे क्या है सोच?
इस फैसले को कई कोणों से देखा जा रहा है। पहला कोण यह है कि भारत-चीन संबंधों में पिछले एक-डेढ़ साल में सुधार के संकेत दिखे हैं। सीमा पर तनाव कुछ हद तक कम हुआ है और दोनों देशों के बीच राजनयिक संवाद बढ़ा है। ऐसे में FDI नियमों को आसान बनाना इसी सुधरते माहौल का अगला कदम माना जा सकता है।
दूसरा कोण आर्थिक है। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है और उसे बुनियादी ढांचे, विनिर्माण और प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में भारी निवेश की जरूरत है। चीन की कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहन, सोलर पैनल, बैटरी और इलेक्ट्रॉनिक्स जैसे क्षेत्रों में दुनिया में सबसे आगे हैं। अगर ये कंपनियां भारत में निवेश करती हैं तो रोजगार बढ़ेगा और तकनीकी हस्तांतरण भी होगा।
तीसरा कोण वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला का है। दुनियाभर में अमेरिका-चीन तनाव के कारण कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां चीन से अपना उत्पादन हटाकर दूसरी जगह ले जाना चाहती हैं। भारत इस अवसर का फायदा उठाना चाहता है। FDI नियम आसान होने से ऐसी कंपनियां जिनमें चीनी शेयरधारक हैं वे भी भारत में निवेश कर सकेंगी।
आलोचना और चिंताएं भी हैं
इस फैसले पर कुछ आलोचनाएं भी आ रही हैं। विपक्षी दलों का कहना है कि जब चीन के साथ व्यापार घाटा पहले से ही 99 अरब डॉलर से ज्यादा है तो निवेश के दरवाजे और खोलने से घाटा और बढ़ेगा। देश के छोटे और मध्यम उद्योगों को भी चिंता है कि सस्ते चीनी निवेश और उत्पादों की आमद से उन पर प्रतिस्पर्धा का दबाव और बढ़ जाएगा। कुछ रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि संवेदनशील तकनीकी क्षेत्रों में चीनी निवेश राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है।
सरकार का कहना है कि संवेदनशील क्षेत्रों में निवेश के लिए अभी भी कड़ी जांच होगी और राष्ट्रीय सुरक्षा से समझौता नहीं किया जाएगा।
FDI Policy: आगे क्या होगा?
यह फैसला भारत-चीन संबंधों में एक नए अध्याय की शुरुआत का संकेत दे सकता है। लेकिन असली परीक्षा इस बात में होगी कि चीनी कंपनियां भारत में किन क्षेत्रों में और कितना निवेश लाती हैं। भारत सरकार की कोशिश होगी कि चीनी पूंजी का उपयोग देश के विनिर्माण और तकनीकी विकास के लिए हो जबकि राष्ट्रीय सुरक्षा और घरेलू उद्योगों के हितों की रक्षा भी सुनिश्चित की जाए। यह संतुलन बनाना एक बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक चुनौती होगी।
Read More Here
- LPG Cylinder Crisis: सरकार का जवाब घरेलू गैस की कोई कमी नहीं उत्पादन 10% बढ़ाया, दिल्ली के 70% होटलों में सिर्फ 2 दिन का स्टॉक, बुकिंग अवधि 21 से 25 दिन की
- Iran-US War: होर्मुज जलडमरूमध्य पर भीषण समुद्री जंग, अमेरिका ने ईरान की 10 से ज्यादा माइन-बोट डुबाईं, ट्रंप की कड़ी चेतावनी
- आज का मौसम 11 मार्च 2026 (बुधवार): राजस्थान-गुजरात में हीटवेव का कहर, पहाड़ों पर बर्फबारी और बारिश, दिल्ली-NCR में तेज गर्मी, जानें अपने शहर का हाल
- आज का राशिफल 11 मार्च 2026 (बुधवार) – जानें मेष से मीन तक सभी 12 राशियों का दैनिक भविष्यफल, शुभ अंक और शुभ रंग