AIMIM दिल्ली अध्यक्ष का विवादित बयान “वंदे मातरम न राष्ट्रगान है न संविधान का हिस्सा, गर्दन पर छुरी रखो तब भी नहीं गाएंगे”
डॉ. शोएब जमाई ने X पर पोस्ट कर कहा- BJP-RSS ने इसे प्रोपेगेंडा बनाया, जबरन थोपना चाहते हैं, AIMIM नेताओं के लगातार विवादित बयान
Delhi: ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन (AIMIM) के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष डॉक्टर शोएब जमाई ने बुधवार को वंदे मातरम को लेकर एक विवादित बयान दिया है जिससे एक बार फिर राजनीतिक बवाल खड़ा हो गया है। डॉ. जमाई ने अपने सोशल मीडिया हैंडल X (पूर्व में ट्विटर) पर एक पोस्ट के माध्यम से यह बयान दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि “वंदे मातरम न राष्ट्रगान है और न ही संविधान का हिस्सा।” इतना ही नहीं, उन्होंने आगे कहा कि लोग पहले अपनी आस्था के अनुसार इसे अपनी मर्जी से गाते थे। लेकिन अब भारतीय जनता पार्टी (BJP) और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने इस गीत को प्रोपेगेंडा (प्रचार उपकरण) बना दिया है।
डॉ. जमाई ने आरोप लगाया कि BJP और RSS इस गीत को जबरन मुसलमानों पर थोपना चाहते हैं। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा, “तो फिर सुनो, हमारी गर्दन पर छुरी भी रख दोगे तब भी हम नहीं गाएंगे।” यह बयान तत्काल विवाद में घिर गया है और विभिन्न राजनीतिक दलों से प्रतिक्रियाएं आने की संभावना है। यह पहली बार नहीं है जब AIMIM के किसी नेता ने विवादास्पद बयान दिया हो। हाल के महीनों में पार्टी के कई बड़े नेताओं ने ऐसे बयान दिए हैं जो सुर्खियों में रहे हैं। गौरतलब है कि ‘वंदे मातरम’ भारत का राष्ट्रीय गीत है, हालांकि राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ है। दोनों में अंतर है लेकिन दोनों को ही राष्ट्रीय सम्मान प्राप्त है। आइए विस्तार से जानते हैं इस विवाद के सभी पहलुओं के बारे में।
डॉ. शोएब जमाई का पूरा बयान
AIMIM के दिल्ली अध्यक्ष डॉक्टर शोएब जमाई ने अपने X हैंडल पर एक विस्तृत पोस्ट करते हुए अपनी स्थिति स्पष्ट की।
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उन्होंने लिखा, “वंदे मातरम न राष्ट्रगान है और न ही संविधान का हिस्सा।” यह उनका पहला और मुख्य तर्क था।
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उन्होंने आगे कहा कि पहले लोग अपनी आस्था के अनुसार इसे अपनी मर्जी से गाते थे। यानी किसी पर कोई दबाव नहीं था।
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लेकिन अब स्थिति बदल गई है। डॉ. जमाई ने आरोप लगाया, “मगर भाजपा, RSS ने इस गीत को प्रोपेगेंडा बना दिया।”
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उनका कहना है कि भाजपा और RSS इस गीत का उपयोग राजनीतिक और वैचारिक प्रचार के लिए कर रहे हैं।
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सबसे विवादास्पद हिस्सा यह था: “वह हम पर जबरन इसे थोपना चाहते हैं। तो फिर सुनो, हमारी गर्दन पर छुरी भी रख दोगे तब भी हम नहीं गाएंगे।”
Delhi: वंदे मातरम “राष्ट्रगान या राष्ट्रीय गीत?”
इस विवाद को समझने के लिए ‘वंदे मातरम’ और ‘जन गण मन’ के बीच का अंतर समझना जरूरी है।
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जन गण मन: यह भारत का राष्ट्रगान है। इसे रवींद्रनाथ टैगोर ने लिखा था। संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को इसे भारत के राष्ट्रगान के रूप में अपनाया।
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वंदे मातरम: यह भारत का राष्ट्रीय गीत है। इसे बंकिम चंद्र चटर्जी ने लिखा था और यह उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा है।
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संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को ही ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया। हालांकि, इसके केवल पहले दो छंदों को ही आधिकारिक मान्यता दी गई।
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तकनीकी रूप से डॉ. जमाई का यह कहना सही है कि ‘वंदे मातरम’ राष्ट्रगान नहीं है। लेकिन यह कहना कि यह संविधान का हिस्सा नहीं है, विवादास्पद है। हालांकि संविधान के मूल पाठ में इसका उल्लेख नहीं है, लेकिन संविधान सभा ने इसे आधिकारिक मान्यता दी थी।
AIMIM नेताओं के हालिया विवादित बयान
यह केवल डॉ. शोएब जमाई का ही विवादित बयान नहीं है। हाल के महीनों में AIMIM के कई नेताओं ने ऐसे बयान दिए हैं।
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उत्तर प्रदेश AIMIM अध्यक्ष शौकत अली: उन्होंने मुरादाबाद में “हम दो, हमारे दो दर्जन” का नारा दिया था और मुसलमानों से अपील की थी कि वे अधिक बच्चे पैदा करें।
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विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी: उन्होंने यूपी में पार्टी का विस्तार करने का ऐलान करते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को चुनौती दी थी और कहा था, “मिस्टर योगी, तैयार हो जाओ, यूपी भी आ रहे हैं।”
Delhi: विवादित बयानों का प्रभाव
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राजनीतिक प्रभाव: इन बयानों से राजनीतिक ध्रुवीकरण बढ़ता है। विपक्षी दल इन्हें राजनीतिक लाभ के लिए उपयोग करते हैं।
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सामाजिक प्रभाव: ऐसे बयान समाज में विभाजन पैदा कर सकते हैं। धार्मिक और सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता है।
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मीडिया कवरेज: इन विवादास्पद बयानों को मीडिया में व्यापक कवरेज मिलती है। यह पार्टी को प्रचार तो देता है लेकिन नकारात्मक छवि भी बनाता है।
निष्कर्ष
AIMIM के दिल्ली अध्यक्ष डॉ. शोएब जमाई ने वंदे मातरम को लेकर विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा कि यह न राष्ट्रगान है न संविधान का हिस्सा और गर्दन पर छुरी रखने पर भी नहीं गाएंगे। यह AIMIM नेताओं की ओर से हालिया विवादित बयानों की श्रृंखला में नवीनतम है। ऐसे बयान राजनीतिक सुर्खियां तो बटोरते हैं लेकिन सामाजिक सद्भाव को नुकसान पहुंचाते हैं।
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