बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले वामपंथी मोर्चे में सीट बंटवारे पर गहराया संकट, माकपा चाहती है 200 सीटें

माकपा ने 200 सीटें मांगीं, ISF-भाकपा-फारवर्ड ब्लॉक नाराज, गठबंधन टूटने का खतरा बढ़ा

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Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है, वैसे-वैसे वामपंथी खेमे के भीतर की अंदरूनी खींचतान भी सतह पर आने लगी है। वाम मोर्चे में शामिल दलों के बीच सीटों के बंटवारे को लेकर अभी तक कोई सहमति नहीं बन पाई है।

Bengal Election 2026: माकपा का दावा और सहयोगियों की नाराजगी

सूत्रों के मुताबिक माकपा ने 294 सीटों वाली विधानसभा में 200 सीटें अपने पास रखने का प्रस्ताव रखा है। बाकी सीटें गठबंधन सहयोगियों के बीच बांटे जाने की बात कही गई है।

प्रस्तावित सीट बंटवारा:

  • माकपा: 200 सीटें

  • इंडियन सेक्युलर फ्रंट (ISF): 31 सीटें

  • फारवर्ड ब्लॉक: 18 सीटें

  • भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा): 13 सीटें

  • रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी): 12 सीटें

  • भाकपा (माले) लिबरेशन: 04 सीटें

सहयोगी पार्टियां इस बंटवारे से नाखुश हैं और अधिक सीटों की मांग कर रही हैं। खासकर आईएसएफ नेतृत्व इस संख्या से संतुष्ट नहीं है और ज्यादा सीटों पर अड़ा हुआ है।

Bengal Election 2026: माकपा ने अपनी पारंपरिक सीटों पर शुरू की तैयारी

गठबंधन में सहमति न बन पाने की स्थिति को देखते हुए माकपा ने व्यावहारिक रणनीति अपनाने का फैसला किया है:

  • तैयारी: पार्टी ने अपनी उन पारंपरिक सीटों पर काम शुरू कर दिया है जिन पर किसी अन्य सहयोगी दल का दावा नहीं है।

  • उद्देश्य: पार्टी चाहती है कि जब तक बाकी सीटों पर समझौता हो, तब तक अपने मजबूत गढ़ों में उम्मीदवार उतारने की प्रक्रिया पूरी हो जाए।

Bengal Election 2026: दीप्शिता धर की सदस्यता पर उठे सवाल

पार्टी के भीतर एक और चर्चा ने जन्म ले लिया है:

  • सदस्यता नवीकरण: पार्टी की युवा चेहरा और चर्चित नेत्री दीप्शिता धर ने अभी तक अपनी प्राथमिक सदस्यता का नवीकरण नहीं कराया है।

  • समय सीमा: माकपा में सदस्यता नवीकरण की प्रक्रिया हर साल 1 जनवरी से 31 मार्च के बीच होती है।

  • अटकलें: दीप्शिता का सदस्यता नवीकरण न कराना राजनीतिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है कि क्या वे कोई नया राजनीतिक फैसला लेने वाली हैं।

Bengal Election 2026: बंगाल में वाम की वापसी की चुनौती

पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे के लिए राह आसान नहीं है:

  • ऐतिहासिक संदर्भ: 2011 में सत्ता से बाहर होने के बाद से प्रदर्शन निराशाजनक रहा है।

  • 2021 का परिणाम: पिछले चुनाव में वाम मोर्चा विधानसभा में एक भी सीट नहीं जीत सका था।

  • प्रासंगिकता: 2026 के चुनाव में खुद को प्रासंगिक साबित करना एक बड़ी चुनौती है और एकजुटता के अभाव में यह राह और कठिन हो जाती है।

Bengal Election 2026: समय की कमी और संभावित परिणाम

विधानसभा का मौजूदा कार्यकाल मई 2026 में समाप्त हो रहा है।

  • जोखिम: यदि जल्द सहमति नहीं बनी तो गठबंधन में बिखराव का खतरा बढ़ सकता है।

  • लाभार्थी: इस खींचतान का सीधा फायदा सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और भाजपा दोनों को मिल सकता है।

निष्कर्ष: बंगाल की राजनीति में वाम मोर्चे की वापसी की कोशिश फिलहाल आंतरिक मतभेदों की दीवार से टकराती दिख रही है। आने वाले कुछ हफ्ते तय करेंगे कि वाम दल एकजुट होकर चुनौती दे पाते हैं या नहीं।

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