ISRO के PSLV रॉकेट की लगातार दो विफलताओं से हड़कंप, जांच के लिए दिग्गज वैज्ञानिकों की विशेष समिति गठित
मई 2025 (C61) और जनवरी 2026 (C62) में 6 मिनट 20 सेकंड बाद विफलता, एस. सोमनाथ-विजय राघवन की समिति जांच करेगी
ISRO Update: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो के लिए यह समय बेहद चुनौतीपूर्ण है। देश के सबसे विश्वसनीय और कार्यकुशल रॉकेट के रूप में पहचाने जाने वाले PSLV की लगातार दो विफलताओं ने वैज्ञानिकों और सरकार दोनों की चिंता बढ़ा दी है।
32 वर्षों के गौरवशाली इतिहास में यह पहला अवसर है जब इसरो के इस ‘वर्क हॉर्स’ रॉकेट के दो मिशन एक के बाद एक विफल हुए हैं। इस गंभीर स्थिति से निपटने के लिए इसरो ने पहली बार आंतरिक टीम के साथ-साथ एक बाहरी विशेषज्ञ समिति भी गठित की है जो विफलता के हर पहलू की गहन जांच करेगी।
ISRO Update: कब-कब हुई विफलता?
इन विफलताओं ने इसरो के मिशनों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं:
-
18 मई 2025 (PSLV-C61): इस मिशन के जरिए सी-बैंड सिंथेटिक अपर्चर राडार उपग्रह EOS-09 का प्रक्षेपण किया गया था। यह उपग्रह देश की सीमाओं की निगरानी और शत्रु के ठिकानों का मानचित्रण करने के लिए विकसित किया गया था। लेकिन प्रक्षेपण के करीब 6 मिनट 20 सेकंड बाद रॉकेट अपने निर्धारित पथ से भटक गया और मिशन विफल हो गया।
-
12 जनवरी 2026 (PSLV-C62): इसके बाद PSLV-C62 भी ठीक उसी तरह प्रक्षेपण के करीब 6 मिनट 20 सेकंड बाद पथ से अलग हो गया। इस विफलता में DRDO का हाइपर स्पेक्ट्रल इमेजिंग उपग्रह EOS N-1 यानी ‘अन्वेष’ सहित 15 अन्य उपग्रह पृथ्वी की कक्षा में नहीं पहुंच सके।
विशेष अवलोकन: दोनों विफलताओं में प्रक्षेपण के बाद विफलता का समय (6 मिनट 20 सेकंड) लगभग एक जैसा होना इस बात का संकेत है कि समस्या किसी एक विशेष चरण या घटक में हो सकती है।
ISRO Update: किन वैज्ञानिकों को मिली जांच की जिम्मेदारी?
इसरो ने इस गंभीर मामले की जांच के लिए देश के दो दिग्गज वैज्ञानिकों की विशेष समिति गठित की है:
-
एस. सोमनाथ: इसरो के पूर्व अध्यक्ष।
-
के. विजय राघवन: प्रधानमंत्री के पूर्व वैज्ञानिक सलाहकार।
ये दोनों वैज्ञानिक PSLV की विफलता के विभिन्न पहलुओं की व्यवस्थित और चरणबद्ध तरीके से जांच करेंगे।
एस. सोमनाथ को क्यों चुना गया?
सोमनाथ का चयन एक सुविचारित और अनुभव-आधारित निर्णय है। उनका रॉकेट प्रणाली से दशकों पुराना गहरा जुड़ाव रहा है:
-
GSLV का सफल प्रबंधन: वे देश के सबसे भारी रॉकेट GSLV मार्क-3 के परियोजना निदेशक रह चुके हैं। एक समय जब GSLV रॉकेट की लगातार विफलताओं के कारण उसे ‘नॉटी ब्वॉय’ कहा जाता था, तब सोमनाथ को उसकी जिम्मेदारी सौंपी गई और उन्होंने उसे इसरो के सबसे भरोसेमंद रॉकेट में बदल दिया।
-
प्रारंभिक अनुभव: वे वर्ष 1985 में इसरो से जुड़े और विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र में PSLV के विकास से प्रारंभ से ही संबद्ध रहे। रॉकेट की सिस्टम इंजीनियरिंग, संरचनागत डिजाइनिंग, इंटीग्रेशन, मेकेनिज्म डिजाइन और पायरो तकनीक में उनका अनुभव इस जांच में बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा।
ISRO Update: क्या-क्या जांचेगी समिति?
इसरो के उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, विशेषज्ञ समिति केवल तकनीकी कारणों तक ही सीमित नहीं रहेगी, बल्कि इसके एजेंडे में निम्नलिखित बिंदु शामिल हैं:
-
प्रक्रियात्मक जांच: समिति रॉकेट के विभिन्न घटकों के निर्माण, खरीद और असेंबली की पूरी प्रक्रिया की जांच करेगी।
-
संगठनात्मक विश्लेषण: यह भी देखा जाएगा कि कहीं इन विफलताओं के पीछे संगठनात्मक कमियां तो नहीं हैं।
-
जवाबदेही व्यवस्था: जवाबदेही तय करने की व्यवस्था मौजूद है या नहीं और उसे कैसे मजबूत बनाया जा सकता है, यह भी समिति के मुख्य कार्यों में शामिल है।
-
व्यापक प्रभाव: देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम में अब कई निजी कंपनियां भी शामिल हैं और PSLV से मिलते-जुलते घटक अन्य रॉकेटों में भी उपयोग होते हैं, इसलिए यह जांच व्यापक प्रभाव डाल सकती है।
-
रिपोर्ट सबमिशन: समिति अप्रैल से पहले अपनी रिपोर्ट इसरो अध्यक्ष वी. नारायणन को सौंपेगी।
ISRO Update: आगे के प्रक्षेपणों पर क्या होगा असर?
-
मिशनों में देरी: विफलता विश्लेषण पूरा होने से पहले अगले प्रक्षेपण की तारीखें तय नहीं होंगी, इसलिए भविष्य के मिशनों में देरी तय मानी जा रही है।
-
साख का प्रश्न: हालांकि इसरो के लिए राहत की बात यह है कि अब तक भविष्य के प्रक्षेपण कार्यक्रम पर बहुत गंभीर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है। लेकिन यह भी स्पष्ट है कि एक और विफलता इसरो की साख और देश के अंतरिक्ष कार्यक्रम को बड़ा नुकसान पहुंचा सकती है।
यही कारण है कि पहली बार आंतरिक के साथ-साथ बाहरी समिति भी हर पहलू की बारीकी से जांच कर रही है ताकि PSLV की विश्वसनीयता को फिर से स्थापित किया जा सके।
read more here