Bangladesh Election 2026: भारत के लिए क्यों है यह चुनाव इतना अहम, जानिए पूरी अंदरूनी कहानी
ढाका में आज से मतदान शुरू, आवामी लीग बाहर; बीएनपी vs जमात-ए-इस्लामी करीबी मुकाबला, सीमा-हिंदू सुरक्षा पर दांव
Bangladesh Election: बांग्लादेश में गुरुवार सुबह से 13वीं संसदीय चुनाव प्रक्रिया शुरू हो गई है। यह चुनाव केवल बांग्लादेश के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया, खासकर भारत के लिए अत्यधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है। 2024 में शेख हसीना सरकार के पतन के बाद यह पहला लोकतांत्रिक चुनाव है, जिसमें उनकी आवामी लीग को चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी गई है।
Bangladesh Election: भारत-बांग्लादेश संबंधों का निर्णायक मोड़
बांग्लादेश के साथ भारत की 4,096 किलोमीटर लंबी साझा सीमा है, जो देश की सबसे लंबी अंतरराष्ट्रीय सीमा रेखा है। पश्चिम बंगाल, असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम – पांच राज्य इस सीमा को साझा करते हैं। ऐसी स्थिति में ढाका में होने वाला कोई भी राजनीतिक परिवर्तन सीधे तौर पर भारत की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को प्रभावित करता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चुनाव के बाद कट्टरपंथी विचारधारा वाली सरकार सत्ता में आती है, तो सीमा पार से घुसपैठ, तस्करी और आतंकी गतिविधियों में इजाफा हो सकता है। पिछले कुछ महीनों में ही भारत-बांग्लादेश सीमा पर तनाव के कई मामले सामने आ चुके हैं।
आर्थिक संबंधों पर पड़ा असर
शेख हसीना की सरकार के समय भारत और बांग्लादेश के बीच व्यापारिक संबंध मजबूत थे। दोनों देशों के बीच सालाना अरबों डॉलर का व्यापार होता है। हालांकि, हसीना के भारत में शरण लेने के बाद द्विपक्षीय रिश्तों में खटास आई है।
हाल ही में पेश किए गए बजट में भारत सरकार ने बांग्लादेश को दी जाने वाली आर्थिक सहायता में 50 प्रतिशत की कटौती कर दी है। यह कदम दोनों देशों के बीच बढ़ती दूरी को दर्शाता है।
Bangladesh Election: कौन किस पर भारी
इस चुनाव में मुख्य मुकाबला दो धड़ों के बीच है। एक तरफ पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) है, तो दूसरी तरफ जमात-ए-इस्लामी के नेतृत्व वाला 11 दलों का गठबंधन।
बीएनपी की कमान अब खालिदा जिया के पुत्र तारिक रहमान संभाल रहे हैं, जो 17 साल के निर्वासन के बाद बांग्लादेश लौटे हैं। उन्होंने देश में व्यापक सुधारों का वादा किया है और धर्मनिरपेक्षता की बात की है।
ओपिनियन पोल्स क्या कह रहे हैं?
विभिन्न सर्वेक्षणों में बीएनपी को 44.1 प्रतिशत और जमात गठबंधन को 43.9 प्रतिशत वोट शेयर मिलने की संभावना जताई गई है। मतदान परिणाम बेहद करीबी होने का अनुमान है, जिससे सरकार बनाने में छोटे दलों की भूमिका अहम हो सकती है।
कुल 299 संसदीय सीटों के लिए मतदान हो रहा है, जिसमें 12.77 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग कर रहे हैं। साथ ही, 84-पॉइंट सुधार जनमत संग्रह भी समानांतर रूप से चल रहा है।
जमात-ए-इस्लामी, भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा
जमात-ए-इस्लामी मुस्लिम ब्रदरहुड की विचारधारा से प्रेरित एक कट्टरपंथी इस्लामी दल है। शेख हसीना के शासन में इस पर प्रतिबंध था, लेकिन उनकी सरकार गिरने के बाद यह फिर से सक्रिय हो गया है। यह पार्टी रूढ़िवादी मुस्लिम युवाओं में खासी लोकप्रिय है।
राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मत है कि जमात-ए-इस्लामी की सत्ता में आना भारत के लिए सबसे खराब परिदृश्य होगा। यह दल खुलेआम भारत विरोधी बयानबाजी करता है और पाकिस्तान के साथ घनिष्ठ संबंध रखता है।
यदि यह पार्टी सत्ता में आती है, तो बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर हमले और तेज हो सकते हैं। पिछले कुछ महीनों में ही वहां हिंदुओं पर हिंसा के सैकड़ों मामले दर्ज किए गए हैं।
Bangladesh Election: बीएनपी के साथ भारत की रणनीति
भारत सरकार पिछले कुछ महीनों से बीएनपी के साथ संबंध सुधारने का प्रयास कर रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खालिदा जिया के निधन पर गहरी संवेदना व्यक्त की थी, जिसे बीएनपी ने सकारात्मक संकेत माना।
भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों ने तारिक रहमान से संपर्क बढ़ाया है। विश्लेषकों का मानना है कि बीएनपी सत्ता में आने पर भारत अपने रिश्तों को रीसेट कर सकता है, हालांकि यह आसान नहीं होगा।
भारतीय राज्यों के चुनावों पर असर
बांग्लादेश चुनाव के परिणाम पश्चिम बंगाल और असम में इस साल होने वाले विधानसभा चुनावों को सीधे प्रभावित करेंगे। इन राज्यों में बांग्लादेशी घुसपैठ, नागरिकता और सांप्रदायिक मुद्दे प्रमुख चुनावी एजेंडा हैं।
भाजपा बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ को मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ती है, जबकि तृणमूल कांग्रेस इसे क्षेत्रीय पहचान से जोड़ती है। बांग्लादेश में यदि कट्टरपंथी सरकार बनती है, तो भाजपा को चुनावी मुद्दा मिल जाएगा।
Bangladesh Election: भू-राजनीतिक समीकरण में बदलाव
मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने पहले ही चीन और पाकिस्तान के साथ करीबी बढ़ा ली है। बांग्लादेश में यदि भारत विरोधी सरकार सत्ता में आती है, तो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है।
चीन बांग्लादेश में भारी निवेश करने को तैयार है, जबकि पाकिस्तान सैन्य सहयोग बढ़ाने की बात कर रहा है। यह भारत के लिए रणनीतिक चुनौती खड़ी कर सकता है।
भारतीय कूटनीति की परीक्षा
विदेश नीति विशेषज्ञों का कहना है कि यह चुनाव भारतीय कूटनीति की असली परीक्षा है। आवामी लीग के बिना भारत को नए सहयोगी खोजने होंगे। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि बांग्लादेश की ज्यादातर राजनीतिक ताकतें या तो कट्टरपंथी हैं या भारत के प्रति उदासीन।
भारत को अब बहुदलीय संपर्क की रणनीति अपनानी होगी। केवल एक दल पर निर्भर रहने की नीति अब काम नहीं करेगी। साथ ही, बांग्लादेश की जनता से सीधे संवाद बढ़ाना होगा।
Bangladesh Election: दिल्ली के लिए क्या है दांव पर
बांग्लादेश का यह चुनाव भारत की विदेश नीति के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ है। एक स्थिर, धर्मनिरपेक्ष और विकासोन्मुखी सरकार ही भारत के हितों की रक्षा कर सकती है। हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, सीमा प्रबंधन, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता – सभी कुछ इस चुनाव के परिणाम पर निर्भर है।
भारत सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह बांग्लादेश की जनता की पसंद का सम्मान करेगी, लेकिन साथ ही अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा भी सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी। आने वाले घंटे और दिन दक्षिण एशिया की राजनीति की नई दिशा तय करेंगे।
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