होर्मुज संकट के बीच अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट का बड़ा बयान, ईरानी तेल प्रतिबंध हटने पर 3-4 दिन में एशिया पहुंचेगी सप्लाई, वैश्विक ऊर्जा बाजार में लौट सकती है स्थिरता
ईरानी तेल पर प्रतिबंध हटे तो 3-4 दिन में एशिया पहुंचेगी सप्लाई, अमेरिकी ऊर्जा सचिव का दावा
Hormuz crisis: जब दुनिया के सबसे व्यस्त तेल मार्ग पर ताला लग जाए और करोड़ों लोगों की रसोई से लेकर कारखानों तक की ऊर्जा आपूर्ति खतरे में पड़ जाए, तो हर घोषणा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट के ताजा बयान ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में उम्मीद की एक नई किरण जगाई है।
Hormuz crisis: अमेरिकी ऊर्जा सचिव ने होर्मुज पर क्या कहा
अमेरिकी ऊर्जा सचिव क्रिस राइट ने कहा है कि अमेरिका ईरान पर लगे तेल प्रतिबंधों को हटाने पर सक्रिय रूप से विचार कर रहा है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि यह प्रतिबंध हटाए जाते हैं तो समुद्र में अटकी ईरानी तेल खेप महज तीन से चार दिनों में एशियाई बंदरगाहों तक पहुंच सकती है। क्रिस राइट अमेरिका के ऊर्जा मामलों के सर्वोच्च अधिकारी हैं और उनका यह बयान ऐसे समय में आया है जब होर्मुज स्ट्रेट की ईरानी नाकाबंदी के कारण वैश्विक तेल और गैस की आपूर्ति बुरी तरह बाधित हो चुकी है।
Hormuz crisis: होर्मुज स्ट्रेट की नाकाबंदी से दुनिया को क्यों हो रही है इतनी परेशानी
होर्मुज स्ट्रेट फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी को जोड़ने वाला एक संकरा जलमार्ग है। दुनिया के कुल कच्चे तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। ईरान ने इस जलमार्ग पर नाकाबंदी लगाकर सऊदी अरब, यूएई, कुवैत और इराक से निकलने वाले तेल और गैस की आपूर्ति को अवरुद्ध कर दिया है। इसका सीधा असर एशिया के उन देशों पर पड़ा है जो अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा इसी मार्ग से आने वाले तेल से पूरा करते हैं।
Hormuz crisis: भारत पर होर्मुज संकट का क्या है असर
भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 60 प्रतिशत से अधिक हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करता है। होर्मुज की नाकाबंदी ने इस आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है। घरेलू बाजार में एलपीजी सिलेंडर की किल्लत की खबरें आने लगी हैं और कच्चे तेल की कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी से बढ़ी हैं। ऊर्जा विश्लेषकों के अनुसार यदि यह नाकाबंदी और लंबे समय तक जारी रही तो भारत में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में तेज उछाल अपरिहार्य हो जाएगा।
Hormuz crisis: प्रतिबंध हटाने पर अमेरिका क्यों कर रहा है विचार
अमेरिका इस युद्ध में इजरायल का सहयोगी है लेकिन वैश्विक ऊर्जा संकट और घरेलू महंगाई के बढ़ते दबाव ने वाशिंगटन को एक व्यावहारिक रास्ता तलाशने पर मजबूर कर दिया है। ऊर्जा नीति विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका जानता है कि होर्मुज संकट के लंबा खिंचने से न केवल एशियाई सहयोगी देश प्रभावित होंगे बल्कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर भी इसके दुष्प्रभाव दिखने लगेंगे। इसीलिए प्रतिबंध हटाने का विकल्प एक कूटनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टियों से समझदारी भरा कदम माना जा रहा है।
Hormuz crisis: तीन से चार दिन में तेल पहुंचने का दावा कितना व्यावहारिक है
क्रिस राइट का दावा है कि प्रतिबंध हटते ही तीन से चार दिनों में तेल बंदरगाहों तक पहुंच जाएगा। यह इसलिए संभव है क्योंकि बड़ी संख्या में ईरानी तेल टैंकर पहले से ही भरे हुए समुद्र में खड़े हैं और खरीदारों का इंतजार कर रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा व्यापार से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक होर्मुज से एशियाई बंदरगाहों तक की दूरी और मौजूदा जहाजरानी की गति को देखते हुए यह समयसीमा व्यावहारिक रूप से संभव है। हालांकि असली सवाल यह है कि राजनीतिक स्तर पर यह निर्णय कब और कैसे लिया जाएगा।
Hormuz crisis: वैश्विक तेल बाजार पर क्या पड़ेगा असर
ईरानी तेल प्रतिबंध हटने की खबर से अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में तत्काल नरमी आने की उम्मीद है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि अगर आपूर्ति बहाल होती है तो ब्रेंट क्रूड में उल्लेखनीय गिरावट देखने को मिल सकती है। भारत जैसे देशों के लिए यह खबर राहत देने वाली है क्योंकि सस्ते कच्चे तेल का सीधा फायदा घरेलू ईंधन कीमतों और महंगाई दर पर पड़ता है। सरकारी तेल कंपनियों पर मौजूदा दबाव भी कम हो सकता है।
Hormuz crisis: ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत की क्या है स्थिति
युद्ध के 22वें दिन संकेत मिल रहे हैं कि दोनों पक्षों के बीच परोक्ष रूप से संपर्क की कोशिशें जारी हैं। ट्रंप प्रशासन ने युद्ध समाप्ति के संकेत दिए हैं और अब ऊर्जा प्रतिबंध हटाने की चर्चा इस दिशा में एक अहम कदम के रूप में देखी जा रही है। कूटनीतिक विश्लेषकों के अनुसार ऊर्जा प्रतिबंध आमतौर पर किसी व्यापक राजनीतिक समझौते का हिस्सा होते हैं। इसलिए यह संभव है कि अमेरिका बातचीत की मेज पर वापसी के बदले ईरान को यह राहत देने की पेशकश कर रहा हो।
निष्कर्ष
होर्मुज संकट ने यह साबित कर दिया है कि ऊर्जा आपूर्ति और वैश्विक राजनीति एक दूसरे से कितनी गहराई से जुड़ी हैं। अमेरिकी ऊर्जा सचिव का यह बयान एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक संकेत है। यदि ईरानी तेल प्रतिबंध सचमुच हटाए जाते हैं तो इससे न केवल वैश्विक ऊर्जा बाजार को राहत मिलेगी बल्कि भारत जैसे देशों में भी महंगाई का दबाव कम होगा। अब सबकी नजरें इस बात पर हैं कि यह घोषणा कब जमीनी हकीकत बनती है।
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