एकनाथ शिंदे के दिल्ली दौरे के बाद महाराष्ट्र में ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा तेज, उद्धव ठाकरे गुट के सांसदों पर नजर, राज्य की सियासत में फिर बढ़ी हलचल

दिल्ली दौरे के बाद शिंदे गुट सक्रिय, उद्धव खेमे में बढ़ी सियासी चिंता

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Operation Tiger Maharashtra: महाराष्ट्र की राजनीति में जब भी एकनाथ शिंदे दिल्ली जाते हैं तो मुंबई में हलचल मच जाती है। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ। शिंदे के दिल्ली दौरे के बाद से ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा इतनी तेज हो गई है कि उद्धव ठाकरे खेमे में सन्नाटे के पीछे छटपटाहट साफ महसूस होने लगी है।

Operation Tiger Maharashtra: ऑपरेशन टाइगर क्या है और यह चर्चा क्यों शुरू हुई?

राजनीतिक सूत्रों के अनुसार ‘ऑपरेशन टाइगर’ शिंदे गुट की वह कथित रणनीति है जिसके तहत उद्धव ठाकरे की पार्टी के लोकसभा और विधानसभा में मौजूद जनप्रतिनिधियों को शिंदे गुट में शामिल कराया जाएगा। यह नाम इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि शिव सेना का चुनाव चिह्न धनुषबाण है और शिंदे खुद को असली शिव सेना का प्रतिनिधि बताते हैं।

इस ऑपरेशन की चर्चा शिंदे के दिल्ली दौरे के बाद तब और तेज हो गई जब यह बात सामने आई कि उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व से महत्वपूर्ण बैठकें कीं। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार इस तरह के दौरे आमतौर पर किसी बड़े राजनीतिक कदम की पूर्व तैयारी होते हैं।

Operation Tiger Maharashtra: एकनाथ शिंदे कौन हैं और उनका राजनीतिक सफर कैसा रहा?

एकनाथ शिंदे महाराष्ट्र के ठाणे जिले से निकले एक प्रभावशाली नेता हैं जो पहले उद्धव ठाकरे की शिव सेना के वरिष्ठ नेता थे। जून 2022 में उन्होंने बड़े पैमाने पर बगावत करते हुए शिव सेना के अधिकांश विधायकों को अपने साथ लेकर उद्धव सरकार गिरा दी थी।

इसके बाद शिंदे ने भाजपा के समर्थन से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। नवंबर 2024 के विधानसभा चुनाव में महायुति गठबंधन की भारी जीत के बाद वे अब उपमुख्यमंत्री के पद पर हैं। शिंदे को उनकी गुट में शामिल करने की क्षमता के लिए महाराष्ट्र में एक चतुर संगठक माना जाता है।

Operation Tiger Maharashtra: उद्धव ठाकरे की राजनीतिक स्थिति अभी कैसी है?

उद्धव ठाकरे 2022 में सरकार गंवाने के बाद से लगातार कठिन दौर से गुजर रहे हैं। पार्टी के विभाजन के बाद उन्हें न केवल सत्ता से हाथ धोना पड़ा बल्कि शिव सेना का नाम और चुनाव चिह्न भी चुनाव आयोग के फैसले में शिंदे गुट को मिल गया।

2024 के लोकसभा चुनाव में उद्धव गुट ने कुछ सीटें जीती थीं लेकिन उसी साल के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। लगातार दो बड़े चुनावी झटकों के बाद अब उनके सांसदों के शिंदे गुट में जाने की अटकलें उनकी मुश्किलें और बढ़ा रही हैं।

Operation Tiger Maharashtra: शिंदे गुट के पास उद्धव के सांसदों को आकर्षित करने की क्या वजहें हैं?

राजनीतिक जानकारों के अनुसार शिंदे गुट के पास कई ऐसे कारण हैं जो उद्धव खेमे के नेताओं को आकर्षित कर सकते हैं। सत्ता में होना, केंद्र सरकार के साथ संबंध और महाराष्ट्र में प्रशासनिक पहुंच इसमें सबसे बड़े कारक हैं।

इसके अलावा लगातार विपक्ष में रहने से उद्धव गुट के नेताओं को विकास कार्यों और अपने क्षेत्र की मांगों को पूरा करने में कठिनाई आ रही है। राजनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार जब कोई दल लंबे समय तक सत्ता से बाहर रहता है तो उसके जनप्रतिनिधियों में टूट का खतरा स्वाभाविक रूप से बढ़ता है।

Operation Tiger Maharashtra: उद्धव गुट में क्यों बढ़ रही है बेचैनी?

उद्धव गुट की बेचैनी का सबसे बड़ा कारण यह है कि उनके पास अभी जितने सांसद और विधायक हैं, उनमें से कई की निष्ठा को लेकर पहले से ही सवाल उठते रहे हैं। 2022 की बगावत के बाद से उद्धव खेमे के नेता हर राजनीतिक हलचल पर सतर्क नजर रखते हैं।

सूत्रों के अनुसार इस बार की हलचल पिछले कुछ महीनों में उद्धव गुट के कुछ नेताओं के शिंदे खेमे के साथ कथित संपर्क की खबरों के बाद और गंभीर हो गई है। हालांकि उद्धव गुट की ओर से इन अटकलों को खारिज किया जा रहा है।

Operation Tiger Maharashtra: महाराष्ट्र की राजनीति में इस घटनाक्रम का क्या असर होगा?

यदि उद्धव ठाकरे के कुछ सांसद सच में शिंदे गुट में शामिल होते हैं तो इससे उद्धव की पार्टी की संसद में उपस्थिति और कमजोर हो जाएगी। इससे महाविकास आघाड़ी गठबंधन पर भी असर पड़ सकता है जिसमें उद्धव की पार्टी एक महत्वपूर्ण घटक है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि महाराष्ट्र में आने वाले महीनों में सियासी तस्वीर और भी बदल सकती है। राज्य में अगले स्थानीय निकाय चुनावों से पहले इस तरह की राजनीतिक पुनर्गठन की कोशिशें और तेज होने की संभावना है।

निष्कर्ष

2022 से लेकर अब तक महाराष्ट्र की राजनीति ने कई ऐसे मोड़ देखे हैं जिन्होंने पूरे देश को चौंकाया। शिव सेना का विभाजन, सरकार का गिरना, चुनाव चिह्न का विवाद और लगातार चुनावी उलटफेर, यह सब मिलकर राज्य की राजनीति को लगातार अप्रत्याशित बनाए हुए हैं। अब ‘ऑपरेशन टाइगर’ की चर्चा ने फिर से यह सवाल खड़ा कर दिया है कि उद्धव ठाकरे की पार्टी इस बार की चुनौती को कितनी मजबूती से झेल पाएगी। आने वाले सप्ताह इस राजनीतिक समीकरण की दिशा तय करेंगे।

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