व्हाट्सऐप पर भेजा 7 पेज का मैसेज और मच गया तूफान, सुप्रीम कोर्ट ने MP पुलिस को भेजा नोटिस

हिंदू धर्म पर कथित आपत्तिजनक 7 पेज मैसेज मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

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WhatsApp message controversy: एक व्हाट्सऐप मैसेज ने पूरे देश में हलचल मचा दी है। मध्य प्रदेश के एक शख्स द्वारा हिंदू धर्म को लेकर भेजे गए आपत्तिजनक संदेश का मामला अब सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंचा है। इस मैसेज में ऐसी बातें लिखी थीं जिन्हें पढ़कर धार्मिक भावनाएं आहत हो सकती थीं। मामला इतना गंभीर हो गया कि देश की सर्वोच्च अदालत ने गुरुवार को मध्य प्रदेश पुलिस को नोटिस जारी कर दिया और मामले की सुनवाई के लिए तैयारी जता दी।

WhatsApp message controversy: क्या था उस विवादित व्हाट्सऐप मैसेज में

पुलिस के मुताबिक बुद्ध प्रकाश बौद्ध नाम के शख्स ने व्हाट्सऐप पर एक सात पेज का लंबा संदेश पोस्ट और फॉरवर्ड किया था। इस संदेश में हिंदू धर्म और ब्राह्मण समुदाय के बारे में अपमानजनक और भ्रामक टिप्पणियां की गई थीं। शिकायत के अनुसार उस संदेश में दावा किया गया था कि अच्छा हिंदू बनने के लिए गोमांस का सेवन आवश्यक है और कुछ विशेष अवसरों पर बैलों की बलि तथा उनके मांस का सेवन अनिवार्य बताया गया था। इन दावों को धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं से जोड़कर पेश किया गया था जिसने हिंदू समाज की भावनाओं को गहरी ठेस पहुंचाई।

WhatsApp message controversy: पुलिस ने दर्ज की एफआईआर

मैसेज के वायरल होने के बाद पुलिस के पास शिकायत दर्ज हुई। शिकायत में आरोप लगाया गया कि यह संदेश जानबूझकर धार्मिक भावनाओं को आहत करने और समाज में वैमनस्य फैलाने के इरादे से तैयार किया गया था। इसके बाद मध्य प्रदेश पुलिस ने बुद्ध प्रकाश बौद्ध के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज कर ली। एफआईआर दर्ज होने के बाद बुद्ध प्रकाश बौद्ध ने यह केस रद्द कराने के लिए पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

WhatsApp message controversy: हाईकोर्ट ने क्या कहा

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने बुद्ध प्रकाश बौद्ध की याचिका को नामंजूर करते हुए अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि यह मामला ऐसी सामग्री के प्रकाशन और प्रसार से जुड़ा है जो धार्मिक भावनाओं को आहत कर सकती है और समाज में असहमति तथा वैमनस्य को बढ़ावा दे सकती है। हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि एफआईआर में लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया उन अपराधों के तत्वों को दर्शाते हैं जिनके तहत मामला दर्ज किया गया है। हाईकोर्ट से राहत न मिलने के बाद बुद्ध प्रकाश बौद्ध ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने का फैसला किया।

WhatsApp message controversy: सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

बुद्ध प्रकाश बौद्ध की याचिका गुरुवार 12 मार्च 2026 को जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की खंडपीठ के सामने लगी। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमति जताते हुए मध्य प्रदेश पुलिस और अन्य संबंधित पक्षों को नोटिस भेज दिया। सुप्रीम कोर्ट का इस याचिका पर नोटिस जारी करना इस बात का संकेत है कि देश की सर्वोच्च अदालत इस मामले को गंभीरता से ले रही है और यह जांचना चाहती है कि क्या एफआईआर दर्ज करने का कानूनी आधार पर्याप्त था या नहीं।

WhatsApp message controversy: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम धार्मिक भावनाएं

यह मामला एक बड़े और पुराने सवाल को फिर से केंद्र में ले आया है—अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और धार्मिक भावनाओं के सम्मान के बीच का संतुलन कहां होना चाहिए। संविधान हर नागरिक को विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है लेकिन यह स्वतंत्रता असीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट को इस मामले में यह तय करना होगा कि क्या बुद्ध प्रकाश बौद्ध द्वारा फॉरवर्ड किया गया वह मैसेज कानून की सीमाओं का उल्लंघन करता है या नहीं। यह फैसला सोशल मीडिया कंटेंट को लेकर एक अहम नजीर बन सकता है।

WhatsApp message controversy: सोशल मीडिया पर फैल रही सामग्री का खतरा

यह मामला एक बड़ी सच्चाई की तरफ भी ध्यान खींचता है। आज के दौर में व्हाट्सऐप और अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर सामग्री बिजली की रफ्तार से फैलती है। ऐसे में अगर वह सामग्री भड़काऊ या आपत्तिजनक हो तो उसके नतीजे बेहद गंभीर हो सकते हैं। कई बार लोग बिना सोचे-समझे किसी मैसेज को आगे फॉरवर्ड कर देते हैं और बाद में कानूनी परेशानी में फंस जाते हैं। यह मामला याद दिलाता है कि किसी भी सामग्री को शेयर करने से पहले उसकी सत्यता और कानूनी पहलुओं के बारे में जरूर सोचना चाहिए।

आगे क्या होगा

अब सबकी निगाहें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं। मध्य प्रदेश पुलिस को नोटिस का जवाब देना होगा और अदालत में यह साबित करना होगा कि एफआईआर दर्ज करने के पीछे पर्याप्त कानूनी आधार था। दूसरी तरफ बुद्ध प्रकाश बौद्ध के वकील यह तर्क देंगे कि उनके मुवक्किल ने कोई अपराध नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट का फैसला न केवल इस मामले की दिशा तय करेगा बल्कि भविष्य में सोशल मीडिया पर धार्मिक सामग्री के प्रसार को लेकर कानून की व्याख्या को भी प्रभावित कर सकता है।

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